शुक्रवार, 10 मई 2019

लोकगीत का महत्व मोहनजोदड़ो से कहीं अधिक है : हजारीप्रसाद द्विवेदी

ग्राम गीत का समस्त महत्व उसके काव्य-सौंदर्य तक ही सीमित नहीं है. इनका एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है एक विशाल सभ्यता का उद्घाटन जो अब तक या तो विस्मृति के गर्भ में डूबी हुई है या गलत समझ ली गई है.

आर्य आगमन के पूर्व ही समृद्ध आर्येतर सभ्यता भारतवर्ष में फैली हुई थी. उसके साथ ही और भी छोटी-छोटी सभ्यताएं इस विशाल भूभाग में फैली हुई थीं. आर्यों ने राजनीतिक रूप में तो भारतवर्ष को जीत लिया था पर वे सांस्कृतिक रूप में पूर्ण रूप से यहां के मूल निवासियों के द्वारा प्रभावित हो गए थे.

यहां की मूल सभ्यता वैदिक सभ्यता से एकदम भिन्न थी और आज भी लोकाचार स्त्री-आधार-पौराणिक परंपरा आदि के रूप में वह विद्यमान है. ग्राम गीत इस सभ्यता के वेद हैं. वेद भी तो अपने आरंभिक युग में श्रुति कहलाते थे. वेद भी आर्यों की महान जाति के गीत ही थे और ग्राम गीतों की भाँति ही सुनकर याद किए जाते थे.

सौभाग्यवश वेद ने श्रुति से उतरकर लिपि का रूप धारण कर लिया पर हमारे ग्राम गीत अब भी श्रुति ही कहलाते हैं. …लोकगीत का महत्व मोहनजोदड़ो से कहीं अधिक है. मोहनजोदड़ो सरीखे भग्न स्तूप ग्राम गीतों के भाष्य का काम दे सकते हैं.

(स्रोत – हिन्दी साहित्य की भूमिका)

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1 टिप्पणी:

  1. बदलते माहौल में कई बार छोटी-छोटी बातें भी बड़ी प्रेरक सी बन जाती हैं। मेरा ब्लॉग कुछ यादों को सहेजने का ही जतन है। अन्य चीजों को भी साझा करता हूं। समय मिलने पर नजर डालिएगा
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