बुधवार, 26 सितंबर 2018

डॉ. कफील प्रसंग : सत्य के बजाय पक्ष चुनने की जल्दबाजी का अच्छा प्रमाण


डॉक्टर कफील का नाम तो आप लोगों के जेहन में अभी पुराना नहीं पड़ा होगा! 

ये वही डॉक्टर हैं जो बाबा राघव दास मेडिकल कालेज में डॉक्टर थे। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में स्थित यह मेडिकल कालेज वही है जहाँ पिछले साल अगस्त के दूसरे सप्ताह में लगभग साठ बच्चों की मौत हो गयी थी। वजह थी आक्सीजन की कमी। 

यह मुद्दा बड़ा था। सरकार को हरकत में आना ही था। इससे डॉक्टर कफील को गिरफ्तार किया गया और बाद में उस मेडिकल कालेज से हटा दिया गया। न्यायालय के आदेश से कई महीनों बाद वे गिरफ्तारी से बाहर आ सके। 

जब डॉक्टर कफील गिरफ्तार हुए तो पूरा मुद्दा कफील बनाम योगी हो गया। भाजपा बनाम मुसलमान की लड़ाई वाला मसला हो गया। या कहिये बना दिया गया। ऐसे में पक्ष लेना आसान हो जाता है। दिमाग की चुनौती होती है, सत्य पाने की। सत्य की जगह पक्ष पाने की सुविधा से समस्या तुरत हल हो जाती है। चुनौती खत्म। माहौल ऐसा कि यदि आप डॉक्टर कफील पर सवाल करें तो भाजपा की तरफ से बोलने वाले साबित हो उठें। इसलिये ‘करेक्टनेस’ के चलते कोई, मध्यमार्गी, यह भी नहीं बोलना चाह रहा था कि कफील के साथ कई हिन्दू डॉक्टर भी गिरफ्तार हुए हैं। वैसी ही सजा उनके साथ भी रही। इसलिए मुद्दे को जाँच तक जाना चाहिए। तब तक पक्ष चुनने की जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए। लेकिन याद कीजिये, कफील के गिरफ्तार होते ही, सोशल मीडिया पर कितनी तेजी से ‘जस्टिस फॊर कफील’ शुरू हो गया था! 

अब फिर डॉक्टर कफील चर्चा में कम हैं। लेकिन गिरफ्तारी में हैं। इसी सप्ताह वे दो बार गिरफ्तार हुए। ‘जस्टिस फॊर कफील’ लिखने वाले शान्त क्यों हैं, यह मुझे हैरान कर रहा है! उस गिरफ्तारी में और इस गिरफ्तारी में क्या बदल गया है? सरकार भी वही है। डॉक्टर भी वही है। न तो डॉक्टर की पहचान बदली है, न सरकार की। फिर लोग डॉक्टर कफील के लिए क्यों नहीं उग्र होकर बोल रहे? एक सप्ताह के भीतर दो-दो बार गिरफ्तार होने पर भी! 

इसी सप्ताह डॉक्टर कफील पहले बहराइच में गिरफ्तार हुए। यहाँ पिछले दो महीनों में साठ से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। डॉक्टर कफील बिना किसी सांस्थानिक, सरकारी, आदेश के यहाँ जिला चिकित्सालय आये, देखा-परखा और बयान दिया कि यहाँ के डॉक्टरों और व्यवस्था का दोष है। इस पर अस्पताल के डॉक्टरों से उनकी बहस-झड़प हो गयी। डॉक्टरों ने पुलिस की सहायता से गिरफ्तार कराया। जहाँ जिलाधिकारी के सामने पेश होने के बाद वे छूटे। 

फिर दूसरी बार वे गोरखपुर में गिरफ्तार हुए हैं। अपने बड़े भाई आदिल के साथ। आरोप है कि झूठ की बुनियाद पर बैंक में खाता खुलाया और लगभग दो करोड़ आदान-प्रदान किया। आरोप लगाने वाला बंदा है मुजफ्फर आलम। उसके पहचान पत्रों का इस्तेमाल करके बैंक खाता खुलाया गया और फर्जीवाड़ा किया गया। इसी बैंक खाते का इस्तेमाल दोनों भाई करते थे। 

डॉक्टर के लिए न्याय मांगने वाले अब इतने ठंडे क्यों पड़े हैं? अगर वे पहले ठीक कर रहे थे तो अब गलत कर रहे हैं। अगर अब ठीक कर रहे हैं तो तब गलत रहे होंगे! 

मेरा अपना सोचना है कि डॉक्टर कफील के इस पूरे मुद्दे में ‘पक्ष’ लेने की जल्दबाजी में सच जानने की कोशिश नहीं की गयी। सरकार, डॉक्टर और मीडिया के बीच जैसा संवाद रहा, उसे देखकर लगा कि ‘कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है’। किसी भी बहस या लड़ाई या खोज को ध्रुवीकृत करने की जो दिक्कतें हैं, यहाँ भी उसका असर दिखा। जब-जब सोच और खोज का ध्रुवीकरण हिन्दू बनाम मुस्लिम, मोदी बनाम राहुल, एक्स बनाम वाई की तरह निर्णायक होगा तब-तब सत्य के बजाय पक्ष चुनने में लोगों की प्रवृत्ति होगी। इसमें लोकतंत्र का कभी भी वह मतलब नहीं निकलेगा जिसमें कोई अकेली आवाज भी अपना सच रख पाने समर्थ हो। 

‘भक्तों’ का विरोध किया जाय, जरूर किया जाय, लेकिन हमें अपनी बौद्धिक कार्रवाइयों में ढिलाहट नहीं आने देनी चाहिए। पक्ष लेने की जल्दी या होड़ में ‘सत्य’ को देखने की चुनौती खारिज नहीं कर देनी चाहिए। यह हमारी ही लड़ाई को कमजोर करता है। जनता की निगाह में हमें अविश्वसनीय बनाता है। इसका लाभ अनेक बार वे ही लेते हैं जिन्हें हम ‘भक्त’ कहते हैं!

हाँ, यह सच है कि हम जिस समाज में रह रहे हैं वहाँ अल्पसंख्यकों के साथ जुल्म हो रहा है। एक अफराजुल को मुसलमान होने के कारण ही काट-काट कर जलाया जाता है। गाय के लिए मुसलमानों की लिंचिंग की जाती है। यही सरकार होने पर। यह जुल्म धार्मिक ‘पहचान’ के ही कारण हो रहा है। इसके खिलाफ निरंतर और उग्रतर बोलते रहने की जरूरत है। लेकिन इससे यह तय नहीं होता उस धार्मिक पहचान से ताल्लुक रखने वाला हर व्यक्ति निर्दोष हो और जाँच से परे हो। पहले ही उसके पक्ष में आ जाया जाय। नहीं तो आपके इस ‘एप्रोच’ का लाभ उस धार्मिक पहचान से संबद्ध ‘दोषी’ व्यक्ति उठाता है और नुकसान उसी पहचान से संबद्ध किसी ‘निर्दोष’ का होता है!

आखिरी बात यह कि आक्सीजन की कमी और पूर्वांचल के इस टुकड़े में बच्चों की लगातार होती मौत के प्रति मीडिया सरकार पर कोई दबाव बना सकी? लिखने-पढ़ने वाला समाज कोई दबाव बना सका? कोई ठोस पहल हो सकी? पक्ष चुनने की होड़ में क्या इन सवालों के साथ न्याय हुआ! इस सवाल से दोनों पक्ष पल्ला झाड़ लेंगे। मुद्दों-दुर्घटनाओं का क्या यही हासिल है! ~ अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी / 24-09-2018

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