गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

जीता रहे यह साहस!

तीन-चार दिन पहले पाकिस्तान के जाने माने पत्रकार हामिद मीर पर हुए जानलेवा हमले की खबर मैंने सुनी। इस समय थोड़ा सुकून इस बात का है कि उन पर हुए प्राणघातक हमले के बाद भी उनकी जान सुरक्षित है और खुद पर हुए इस हमले को बहादुराना ढंग से जीतते हुए वे पुनः ऊर्जावान होंगे; इससे एक किस्म की आश्वस्ति या ढ़ाँढस भी मन में है। उस कार चलाने वाले ड्राइवर का शुक्रगुजार होना होगा जिसने हामिद साहब को बचाने के लिए कार की ड्राइविंग ऐसी की कि गोलियाँ सटीक प्राणघातक स्थलों से अलग जा लगीं। उम्मीद है कि आँत में लगी इन गोलियों से हुई क्षति की भरपाई के बाद पाकिस्तानी जियो-न्यूज के संपादक हामिद मीर पूर्ववत सक्रिय होंगे। आमीन! 

अजीब इत्तेफाक है हामिद मीर से परिचित होने का! मैं जगन्नाथ आजाद की शायरी खोज रहा था यू-ट्यूब पर, तभी एक किनारे की तरफ मैने देखा कि प्रस्तावित वीडियो प्रस्तुतियों में एक ऐसी है जिसमें पाकिस्तान के पहले कौमी तराने के ताल्लुक किन्हीं हामिद मीर की तकरीर है। क्लिक करके मैंने पूरी प्रस्तुति देखी, और जिस पहली चीज ने मन पर गहरा प्रभाव डाला वह यह थी कि पाकिस्तान में तकलीफों की बगैर परवाह किए सच बोलने वालों का जुनून क्या खूब है! इस प्रस्तुति में हामिद मीर एक तरफ थे और दूसरी तरफ वह भीड़ थी जो यह सच मानने के लिए तैयार नहीं थी कि पाकिस्तान का पहला कौमी तराना  कोई जगन्नाथ आजाद लिख सकता है। एक ओर हामिद मीर थे दूसरी ओर राष्ट्रवाद, जो कि प्रायः बदमाशों का झूठ हुआ करता है। सरहद के उस पार हो या इस पार। 

और इस तरह दोस्ती हुई एक दिलेर पत्रकार से। आगे फिर हामिद मीर की कई प्रस्तुतियों को सुनता और सराहता रहा। धीरे धीरे पाकिस्तान के ऐसे कई पत्रकारों को मैंने जाना जो संकट की खांईं में भी सच बोलने के लिए प्रतिबद्ध हैं, बगैर इस बात की चिन्ता किए कि इसकी क्या कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी। ऐसे पत्रकारों से परिचित होना पाकिस्तान के बारे में इस गलत राय को दुरुस्त करता है कि वहाँ मुल्लाइयत/तालिबानियत का ही राज है और उसके खिलाफ बोलने वाला कोई नहीं। सच तो यह है कि वहाँ के बहुत से पत्रकार जीवन की बाजी लगाकर मजहबी रूढियों का विरोध कर रहे हैं और शिकार हो रहे हैं। इसी का प्रमाण है कि वर्ष २०१३ में पाँच पत्रकार और वर्ष १९९० के बाद अब तक पचास से अधिक महत्वपूर्ण पत्रकार शहीद हो चुके हैं। क्या भारत में पाकिस्तान की एक रूढ़ छवि बनाए हुए लोग पाकिस्तान की इस समृद्ध प्रतिरोधी धारा, जिसे अपने जान-माल की कोई परवाह नहीं है, का सम्मान कर सकेंगे। यदि हाँ, तो वे पाकिस्तान को किसी स्टीरियो टाइप इमेज से अलग देख सकेंगे और भारतीय पत्रकारिता के लिए साहस के एक प्रेरणा-स्रोत को देख सकेंगे। इस दृष्टि से सरकार के सत्ता में आने की संभावना देख कर कभी कांग्रेसी तो कभी भाजपाई हो जाने वाली हमारी मौका-परस्त हिन्दुस्तानी मीडिया इन पाकिस्तानी पत्रकारों से कुछ रीढ़-सा पा सके तो यह कम बड़ी बात नहीं होगी। 

खतरों से खौफ न खाने वाले पत्रकार हामिद मीर पर यह कोई पहला कायराना कट्टर-पंथी हमला नहीं है। कुछ ही साल पहले उनकी कार में तालिबानियों ने बम फिट कर दिया था, जिसे संयोगवश देख कर निष्क्रिय कर दिया गया। लेकिन ऐसी घटनाओं के बावजूद, तब से लेकर अब तक हामिद मीर सच को निर्भीक ढंग से रखते हुए तालिबानियों और तालिबानियत-पसंद हुकूमती शक्तियों की आँख की किरकिरी बने हुए हैं। गौर-तलब है कि इस हमले के होने के पहले हामिद मीर ने यह बात कह दी थी कि उन पर हमला होगा और उस हमले की जिम्मेदार आई.एस.आई. होगी। इस बात का उल्लेख उनके परिवार के लोग और जियो-न्यूज के प्रेसीडेंट इमरान असलम भी करते आ रहे हैं। इन बातों के मद्देनजर मौजूदा सरकार की काबिलियत और सामर्थ्य का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह आई.एस.आई पर कुछ नहीं बोल पा रही उल्टे पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय की तरफ से इसकी कड़ी प्रतिक्रिया आई है और चैनल का लाइसेंस रद्द करने की सिफारिस की गई है। इससे पहले भी आई.एस.आई. की तरफ से अपने ऊपर हमले की स्थितियों/संभावनाओं को लेकर वहाँ के कई और विद्वानों-पत्रकारों ने ऐसी बातें कही हैं। चाहे वह आसमां जहाँगीर हों या मारवी सिरमद। या नजम सेठी। पर क्या नवाज सरकार में इतनी कुव्वत है कि वह आई.एस.आई. से लोहा ले सके। बिल्कुल नहीं। और ऐसी स्थिति में पाकिस्तान से तमाम यातनाएँ सहने के बाद अब कनाडा में रह रहे पत्रकार तारेक फतेह का यह कहना सही है कि ‘या तो आप पाकिस्तानी सेना-आई.एस.आई. को बचा लें या फिर पाकिस्तान को! दोनों एक साथ नहीं बच पाएँगे।’ जाहिर सी बात है कि इन कठिन स्थितियों में जो पत्रकार वहाँ रह कर सच बोलने का साहस कर रहे हैं, वे तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन काम कर रहे हैं। 

फिलहाल, हम हामिद मीर की सलामती की दुआ करते हैं। पाकिस्तान के वर्तमान माहौल में हामिद मीर जैसे पत्रकारों का सक्रिय और बुलंद रहना वहाँ की तमाम उपेक्षित और शोषित तबकों की आवा्जों को मजबूत करना है जो अपने हक के लिए जूझ रही हैं और जो ऐसे पत्रकारों के अभाव में बे-आसरा हो जाएँगी। हामिद मीर का रहना पत्रकारिता के उस साहस का जिन्दा रहना है जो बलोचिस्तान के साथ न्याय की गुहार करते हुए सीने में गोलियाँ खाने के लिए तैयार है, जो ‘नाइन इलेवन’ के बाद ओसामा का साक्षात्कार लेने से पीछे नहीं हटता, जो मलाला यूसुफजई के हक में आवाज बुलंद करने से नहीं कतराता जबकि उस समय तमाम पत्रकार तालिबानी धमकी के सामने डरे हुए मलाला को अमेरिकी/अंग्रेजी एजेंट बोल रहे हों! जीते रहें हामिद मीर और जीता रहे उनके संपादन में जारी जियो-न्यूज! जागे पाकिस्तानी आवाम और इस साहस से प्रेरणा ले हिन्दुस्तानी मीडिया! विकराल रात में इन चिरागों की बड़ी अहमियत है:

“इसी खंडहर में कहीं कुछ दिये हैं टूटे हुए,
इन्हीं से काम चलाओ बड़ी उदास है रात!”(फिराक़)
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अपडेट: इस आलेख का जिक्र ‘हिन्दुस्तान’ और ‘जनसत्ता’ दोनों अखबारों में हुआ था। दोनों का आभार!

हिन्दुस्तान में  २९-अप्रैल’२०१४ को:

जनसत्ता में ५ मई-२०१४ को: 



3 टिप्‍पणियां:

  1. "एक ओर हामिद मीर थे दूसरी ओर राष्ट्रवाद, जो कि प्रायः बदमाशों का झूठ हुआ करता है। सरहद के उस पार हो या इस पार। "

    बहुत अच्छा लिखा।

    हामिद मीर के जज्बे को सलाम। उनकी सलामती की दुआ करते हैं।

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