बुधवार, 24 अप्रैल 2013

भाषा तिजारती हो गई और लेखक दुकानदार! (LLF'13-Report)

[लखनऊ लिटरेरी फेस्टिवल-१३ के अंतर्गत दिनांक २३ मार्च को ‘समकालीन हिन्दी कविता: लोकप्रियता की चुनौती’ पर एक सत्र रखा गया था। इस कार्यक्रम की रपट यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। इसे जागरूक पत्रकार  और प्रिय मित्र अटल तिवारी ने लिखा है, अस्तु हम आपके आभारी हैं। : संपादक]
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भाषा तिजारती हो गई और लेखक दुकानदार!
*अटल तिवारी

खनऊ के कुछ उत्साही लोगों ने दो दिवसीय लखनऊ लिटरेरी फेस्टिवल का आयोजन किया। इसमें विभिन्न विषयों पर अनेक सत्र रखे। फिल्मी हस्तियों से लेकर हिन्दी, उर्दू, अवधी भाषा के अनेक रचनाकारों ने शिरकत की। इसी में एक सत्र था ‘समकालीन हिन्दी कविता: लोकप्रियता की चुनौती’। इस सत्र में पद्मश्री बेकल उत्साही, कवि नरेश सक्सेना, पंकज श्रीवास्तव, डॊ. अमरेन्द्र त्रिपाठी को वक्ता के रूप में हिस्सा लेना था, लेकिन शायद कवि नरेश सक्सेना ने फेस्टिवल में शिरकत करने से मना कर दिया। वैसे बाहर की छोडि़ए शहर में रहने वाले हिन्दी के बड़े रचनाकार भी फेस्टिवल से दूर रहे। आयोजक उन्हें जोड़ नहीं सके। रही बात पंकज श्रीवास्तव की तो उन्हें उसी समय पर होने वाले दूसरे सत्र में हिस्सा लेना था। ऐसे में कविता वाले सत्र में बेकल उत्साही व जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से आए . अमरेन्द्र त्रिपाठी बतौर वक्ता मौजूद रहे। डाॅ. रामशंकर त्रिपाठी को आरक्षण में खाली रह जाने वाली सीट का लाभ मिला। वह वक्ताओं में शामिल किए गए। बतौर संचालक कथाकार दयानंद पांडेय मंच पर थे। 

दयानंद पांडेय ने कुंवर नारायण को उद्धृत करते हुए इस चिंता के साथ बात शुरू की कि ‘कविता अब उत्पाद बनती जा रही है। सारे सरोकार सोने के निवाले में समाहित हो गए हैं। इसलिए कविता हाशिए पर है। कविता लतीफा हो चुकी है। कवि लतीफेबाज हो गए हैं। लोग हिन्दी कविता और फिल्मी गानों में अंतर तक भूलने लगे हैं।’ उन्होंने हिन्दी को रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही विषय की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए पहले बेकल उत्साही को बोलने के लिए आमंत्रित किया। बेकल साहब ने माइक संभाला तो लोगों ने तालियों से स्वागत किया। उन्होंने कहा कि ‘पहले आप लोग मेरे बारे में जान लीजिए। मैं अपना परिचय दे दूं। मैं एक उजड्ड घराने का हूं। मेरे बाप दस-बारह गांवों के जमींदार थे। बाप मेरे शायरी के शौक से नाखुश रहते थे। कहते थे कि हरामजादा नाचता-गाता फिरता है। हमारा नाम मिटा दिया। शायरी करने की बदौलत अपनी पुश्तैनी जायदाद से मरहूम कर दिया गया। जहां तक शायरी की बात है तो हम सभी को स्कूली दिनों में विषय दिए जाते थे। हम उस पर शायरी-कविता करते थे। पहली बार वसन्त विषय मिला था। इस पर कविता लिखी।’ कविता के जमीनी सरोकार के साथ बात करते हुए बेकल जी ने कहा-‘किसी कविता में जब तक अपनी जमीन नहीं होगी। आसपास के माहौल का तस्करा नहीं होगा। ऐसे में वह जिंदा नहीं रह पाएगी। वह लोकप्रिय तो क्या उसकी चन्द लाइनें तक याद नहीं होंगी। इसलिए भारी-भरकम शब्द लिखने से बात नहीं बनने वाली। हम रोज जो शब्द बोलते हैं। जो सब्जी मंडी और गली कूचे में बोली जाती है। वही हिन्दी है। उसी में लिखना होगा।’ खांचे में बंटे साहित्य पर भी बेकल साहब ने तीर चलाते हुए कहा कि ‘यह प्रगतिशील, रवायत, परंपरावादी नहीं चलेगा। जो लिखना है लिखो। फैसला पाठक पर छोड़ दो। हम अब भी इसी में उलझे हैं कि लिपि बाएं से लिखें कि दाएं से।’ इसी बीच वह अपने कुछ दोहे सुनाते हैं यह बताने के लिए कि इसमें ऐसा कौन सा ऐसा शब्द है जो कठिन है या हम सबके आसपास का नहीं है। उन्होंने पढ़ा-‘धर्म मेरा इस्लाम है, भारत जन्म स्थान, वुजू करूं अजमेर में, काशी में स्नान...।’ लाइन पूरी होती कि हाल तालियों से गूंज उठा। बेकल जी ने कहा कि बात इतनी ही नहीं है। अगला दोहा लिखा तो फतवा जारी हो गया था। दोहा सुनिए-‘मैं तुलसी का वंशधर, अवधपुरी है धाम, सांस-सांस में सीता बसीं, रोम-रोम में राम...।’ कविता की बात करते-करते वह फिल्मी गीत व लेखन पर बात करने लगे। उन्होंने कहा कि ‘शब्दावली हम दे रहे हैं। डाॅयलाग हमारे हैं। गीत हमारे हैं। एक तरह से गद्य व पद्य सब हमारा। गीत हम लिखें तो पांच रुपया...गाने वाले को पांच लाख। यह कौन सा इन्साफ है? अरे, इब्दिता हम करते। मेहनत हम करते। शब्द हम गढ़ते। माल वह काटते।’ 
   
इस सत्र में मौजूद वक्तागण: (बाएं से) डॊ. रामशंकर त्रिपाठी, संचालक दयानंद पाण्डेय, पद्मश्री बेकल उत्साही और  अमरेन्द्र
समकालीन कविता पर बात करने के दौरान बेकल साहब भाषा की उपेक्षा पर नाराज दिखे। कहा-‘हिन्दी की अपनी तहजीब थी। अपनी संस्कृति थी। हमने उसे बेच दिया। हमारे हिन्दी लेखक खुद को बेचने में लगे हैं। यानी भाषा तिजारती हो चुकी है और लेखक दुकानदार। ऐसे में क्वांटिटी ही मिलेगी क्वालिटी नहीं। दो दिन का पूरा सत्र अंग्रेजी में हो रहा है। बातें अंग्रेजी में हो रही हैं। मुजफ्फर अली से भी हमने कहा कि आप सूफी पर अच्छा काम कर रहे हैं। अंग्रेजी में लिख रहे हैं। इस किताब का हिन्दी और उर्दू में अनुवाद कर देते तो हम जैसे गंवार भी पढ़ लेते।’ कविता व शायरी की बात करते हुए कहा कि ‘पहले लिखने वाले जमींदारों और नवाबों की तारीफ करते थे। उसी को शायरी व कविता माना जाता था। एक किस्सा सुनिए, एक बार पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने मुझे कुछ सुनाने के लिए बुलाया गया। मैंने कविता पढ़नी शुरू की। वह जमींदार के खिलाफ थी। उस समय जमींदारों के जुड़ा कुछ मामला चरचा में था। कुछ लोगों ने ऐसी कविता न पढ़ने के लिए रोका। यह बात नेहरू जी ने देख ली। उन्होंने मना करते हुए कहा कि पढ़ने दो। इसके बाद गांव आया तो किसी ने उत्साही कहा। बस...यहीं से नाम पड़ गया बेकल उत्साही।’ हाल में जमा लोग बेकल साहब को सुनने के लिए उतावले थे। यही वजह थी कि संचालक ने अगले वक्ता को मौका देने की कोशिश की तो लोगों ने कहा कि बोलने दीजिए, लेकिन समयाभाव को देखते हुए दयानंद पांडेय ने अपना दायित्व निभाया। कहा-‘उदारीकरण के दौर में सांस्कृतिक संस्थाएं हाशिए पर जा चुकी हैं। वेब मीडिया ने मठों को तोड़ा है, लेकिन बाजार के हवाले हो जाना क्या ठीक है? यह सवाल उठाते हुए उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से आए डाॅ. अमरेन्द्र त्रिपाठी को आमंत्रित किया। 

अमरेन्द्र त्रिपाठी ने बाजार व उसका इस्तेमाल करने वाले एवं उससे दूर रहने वाले रचनाकारों पर विस्तार से बात रखी। एक तरह से उन्होंने बाजार और गुणवत्ता का विरोधाभास बयां किया। कहा-‘अच्छे लेखक बाजार को लेकर उदासीन हैं। बाजार में जो लेखक जा रहे हैं उनका उद्देश्य केवल बिकना है या यूं कहिए कि वह बाजारू हो जाते हैं। वह बैंड भी बजाते हैं। पाठकों के साथ अन्याय करते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि जब आप (अच्छे लेखक) बाजार से परहेज करेंगे तो लोगों तक पहुंचेंगे कैसे? बाजार तो लोकप्रियता का एक माध्यम है। बड़े लेखकों की यह उदासीनता भी अच्छे लेखन को आम लोगों से दूर कर रही है। अच्छे लेखक केवल किताबों व पत्रिकाओं तक सीमित रहते हैं। यही एक प्रमाण है कि वह इस नए बाजार से कटे रहते हैं। ऐसे में सबसे अधिक नुकसान रचना व पाठकों को होता है। इसलिए जरूरी यह है कि प्रमुख रचनाकारों को इस माध्यम को पाॅजिटिव तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए। इससे पाठकों को अच्छी रचनाएं मिलेंगी। साथ ही बाजारू व स्तरहीन लोगों को बढ़ने का मौका नहीं मिलेगा। अगर ऐसा हो जाए तो अच्छी कविता इस माध्यम का इस्तेमाल करने वालों तक पहुंच सकेगी।’ अमरेन्द्र त्रिपाठी के बाद संचालक ने रामशंकर त्रिपाठी को बोलने के लिए आमंत्रित किया। रामशंकर ने कहा-‘हिन्दी मामूली लोगों की भाषा है। देश में जब तक गरीबी थी बाबू घूस नहीं लेता था। नेता ईमानदार थे उस समय तक सब हिन्दी पढ़ते थे। अब अफसरों, नेताओं की पत्नियां और संभ्रान्त घरों की महिलाएं बच्चों को नाश्ता नहीं ब्रेकफास्ट कराती हैं। ऊगल-गूगल, उद्योग, व्यापार सब अंग्रेजी में चल रहा है। ऐसे में उदय प्रकाश को लोग भूल गए हैं। राजेश जोशी बूढ़े हो गए हैं। वागर्थ, हंस, नया ज्ञानोदय में लिखना और पढ़ना वैसा ही है जैसे ऊंट के ब्याह में गधा बाराती। लेखक ही एक-दूसरे को पढ़ और गा रहे हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के यहां से जो चेतना बनी वह आगे तक कायम नहीं रह सकी। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि हिन्दी में अब केवल विधवा विलाप चल रहा है। हिन्दी का कोई नामलेवा नहीं है। अवधी-फवधी, अंजाबी-पंजाबी समेत किसी का कुछ नहीं है। उनका यह प्रलाप जारी था कि कुछ लोगों ने आपत्ति की। इस पर संचालक दयानंद पांडेय ने हस्तक्षेप करते हुए रामशंकर त्रिपाठी की बातों को खारिज करते हुए कहा कि पता नहीं त्रिपाठी जी को हिन्दी की अच्छी चीजें क्यों नहीं दिखतीं? उदय प्रकाश व राजेश जोशी हिन्दी की थाती हैं। अगर आप दूर नहीं जाना चाहते तो कम से कम अपने ही शहर पर नजर डाल लीजिए। कहानीकार अखिलेश समेत अनेक नाम हम हिन्दी वालों के लिए गौरव हैं। संचालक ने उन्हें भाषा को देखने के नजरिए और लेखकों के बारे में ज्ञान बढ़ाने की सलाह दे डाली।

इसी के साथ आयोजकों ने घड़ी की ओर इशारा किया, लेकिन संचालक ने कहा कि बेकल जी मंच पर मौजूद हों और उनके बिना कुछ सुनाए सत्र का समापन हो जाए यह नाइंसाफी होगी। इसी के साथ उनकी ओर माइक बढ़ा दिया। बेकल जी ने पहले अपना रचना ‘यही है मेरा लखनऊ...’ सुनाया। फिर गजल का नम्बर लगा-‘रात जंगल वो आइ गई अंखियां, भोर होतै झुराइ गई अंखियां, जी भरि कइ देखहूं न पाएन, तुमका देखतइ लुकाइ गई अंखियां, अग्नि लगाइ के होलिका होइ गईं, जग जराइ के बुताइ गई अंखियां, चोट लागि नहिं पीड़ा जानिन, जानि कैसे सुवाइ गई अंखियां, सपने के मेले में बेकल, मिलते-मिलते हेराइ गई अंखियां, जानि ना पाइउ उत्साही जी, कैसे बेकल बनाइ गई अंखियां, इसी के साथ सत्र का समापन हो गया। मजेदार बात यह रही कि इस सत्र में विषय पर बात कम ही हुई। संचालक दयानंद पांडेय व डाॅ. अमरेन्द्र त्रिपाठी ने अपने को विषय तक सीमित रखा...लेकिन रामशंकर त्रिपाठी तो विषय के आसपास भी नहीं पहुंचे। फेस्टिवल में अनेक खामियां रहीं। लेकिन इससे अधिक अहम बात यह कि बंजर जमीन में कुछ पौधे उगे। इसलिए बंजर जमीन में कुछ पौधे उगाने के प्रयास के लिए आयोजकों की तारीफ होनी चाहिए।
(फोटो: साभार, लखनऊ सेसाइटी) 

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दिन से इंतजार था इस रपट का। पढ़कर अच्छा लगा।

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  2. इस आयोजन के बारे में पढ़ना अच्छा लगा। पौधे जड़ पकड़ें, शुभकामनायें भी और विश्वास भी।

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