बुधवार, 13 मार्च 2013

‘चौराहे पर पुतला’: कला के स्वधर्म और मनुष्य के बौनेपन की ‘स्ट्रांगर, लांगर और थिकर’ कहानी

[हाल ही में ‘नया ज्ञानोदय’ पत्रिका में प्रकाशित  पुरुषोत्तम अग्रवाल  की कहानी ‘चौराहे पर पुतला’ ने बहुत से सुधी पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस कहानी को पाठकों व समीक्षकों की ओर से बहुविध समझा और परखा जा रहा है। इसी समझन और परखन की प्रक्रिया में आनन्द पाण्डेय द्वारा इस कहानी की समीक्षा काबिलेगौर है। : संपादक]

‘चौराहे पर पुतला’: कला के स्वधर्म और मनुष्य के बौनेपन की ‘स्ट्रांगर, लांगर और थिकर’ कहानी 
फोटो, फ्लिकर से
  
पुरुषोत्तम अग्रवाल की लम्बी कहानी ‘चौराहे पर पुतला’ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उभार के फलस्वरूप कला और मानवता पर आसन्न फासीवादी खतरे की और धर्मनिरपेक्ष राजनीति और प्रगतिशील संस्कृति दृष्टि के पतन की कहानी है। प्रचलित विमर्शों को इस कथा-सूत्र में विलक्षण ढंग से पिरोते हुए पुरुषोत्तम अग्रवाल ने आज के समय और संस्कृति की कॉमिक-व्यंग्यात्मक समीक्षा की है।

अपने समय के भारतीय जीवन के सघन, जटिल और बहुस्तरीय यथार्थ की विविध प्रतिध्वनियों से अनुगूंजित यह कहानी महाकाव्यात्मक प्रभाव छोड़ती है। यह कहानी आज के राजनीतिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन की कॉमिक-व्यंग्यपूर्ण आलोचना है। यह -आद्यांत -सामायिक विमर्शों की हास्यास्पद; और त्रासद भी, विफलता की दास्ताँ है। यह सामयिक भारतीय जीवन की बिडम्बना को बड़े असरदार तरीके से उजागर करती है. इसका सन्दर्भ बहुत व्यापक है, बल्कि वैश्विक है।

एक शहर के समग्र जीवन की कहानी एक पुतले के माध्यम से कही गयी है। बीस साल की कालावधि में फैली इस कहानी का सारांश इसप्रकार है: बीस साल पहले नगरपालिका ने अपने आपको ‘सम्वेदनशील’ और ‘कलाप्रेमी’ सिद्ध करने के लिए नगर के सौन्दर्यीकरण का अभियान चलाया था। अभियान के तहत बड़े-बड़े कलाकारों से ‘मयूर’, ‘नर्तक-नर्तकियों’, के साथ-साथ साँवले संगमरमर से पाँच साल के खड़े-खड़े नहाते हुए बच्चे का एक नग्न पुतला भी बनवाया गया था. पुतले की भाव-भंगिमा लेखक के शब्दों में इसप्रकार थी, “पानी लोटे से गिर, पुतले के सर और शरीर से गुज़रता हुआ नाली से निकल जाता था. पुतले के चेहरे पर, मम्मी की मदद के बिना ख़ुद नहाने का आत्म-गौरव, नहाने से आ रहा ताजापन” था. ‘पुतले की यह बहुलार्थक स्नान-भंगिमा’ जिन ‘सर्जनात्मक तथा वैचारिक उपक्रमों की विषय-वस्तु’ बनी उनमें प्रमुख थी ‘अश्लीलता-संवेदी राडारों’ की सांस्कृतिक प्रतिक्रिया- ‘’कि पुतले के कारण बहू-बेटियों के चरित्र पर चिंतनीय प्रभाव पड़ रहा है.” (“अधिक सच्चे निष्कर्ष को अप्रकाशित रखने में ही बुद्धिमत्ता समझी गयी थी- पुतले के कारण बहन-बेटियों के चरित्र पर चिंतनीय प्रभाव पड़ रहा हो या न पड़ रहा हो, भाई-बापों के आत्म-विश्वास पर सोचनीय प्रभाव निःसंदेह पड़ रहा था.”) इन ‘राडारों’ ने अपनी रिपोर्ट स्थानीय ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादी’ नेता गंगाधरजी को सौंपी. “गंगाधरजी की पार्टी तो जानी ही सांस्कृतिकता के लिए जाती थी.” ‘राजनैतिक तीर्थ-लाभ’ के मकसद से उनकी पार्टी ने पुतले को मीडिया के माध्यम से अश्लीलता फ़ैलाने वाला कहकर उसकी निंदा की और “पार्टी के पार्षदों को निर्देश भी दिया कि नगर-पालिका में पुतले को हटाने का प्रस्ताव फ़ौरन पेश कर दें”। सत्तापक्ष भी इस प्रस्ताव को पास कराना चाहता था। महापौर ने गंगाधरजी को आश्वस्त कर दिया था। लेकिन प्रस्ताव पेश होने के पहले ही मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से महापौर वादे से मुकर गए और प्रस्ताव की कटु निंदा की। पुतले को बनाने वाला कलाकार प्रधानमंत्री का मित्र था इसलिए भी मुख्यमंत्री और महापौर प्रधानमंत्री का कोपभाजन नहीं बनना चाहते थे। गंगाधरजी कुछ नहीं कर सके क्योंकि उनकी पार्टी अल्पमत में थी। इसके बाद से यह मुद्दा धीरे-धीरे स्थानीय से राष्ट्रीय और फिर वैश्विक बन गया। सूचना और प्रसारण-क्रांति के बाद पुतले से जुड़ा विवाद सबके घरों तक में पहुँचने लगा। गंगाधरजी की पार्टी पुतले के पक्ष में खड़े होने वाले कलाकारों और बुद्धिजीवियों के साथ हिंसा और बलप्रयोग करने लगी। बात को बढ़ते देख प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री को तलब किया, पद से हटाने की धमकी दी। इशारों-इशारों में ही प्रधानमंत्री से मिले आदेश का अनुपालन करते हुए मुख्यमंत्री ने पुतला-विवाद पर एक आयोग का गठन कर दिया। अब सब कुछ आयोग की रिपोर्ट पर निर्भर था। और जैसा कि आयोगों की राजनीति होती है-बहुत अधिक समय लेना। इस आयोग ने भी कला की स्वतंत्रता, कला और राजसत्ता, कला और अश्लीलता जैसे गूढ़ प्रश्नों पर जानकारी लेने के लिए दुनियाभर के फिल्म, कला समारोहों में भागादारी की। दुनिया के सारे दर्शनीय स्थलों की यात्राएं कीं। आयोग को कई कार्य-विस्तार भी मिले।
  
पुतले से ‘सांस्कृतिक’ लोग तो परेशान थे ही लेकिन इसके साथ ही रवि सक्सेना नाम के मार्क्सवादी प्रोफेसर भी परेशान थे; निहायत व्यक्तिगत कारणों से। वे काम विकारों से ‘बीमार इंसान’ थे। वे स्ट्रांगर, लांगर और थिकर ‘अंग’ के आत्मविश्वास से वंचित थे। इसलिए उन्हें लगता था कि उनकी पत्नी जया पुतले के ‘अंग’ की कामना करती हैं और उनकी क्षमता से असंतुष्ट हैं। इससे उनके मन ने पुतले को ‘रकीब’ मान लिया और जया को चरित्रहीन। और अब वे भी पुतले के दुश्मन हो गये थे। प्रगतिशील दृष्टि की वजह से वे पुतले को हटा देने की बजाय उसे चड्ढी पहना देने के मौलिक विचार के साथ आये। आयोग की रिपोर्ट आने तक कई मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बदल गये फिर भी सत्ताधारी पार्टी वही रही, गंगाधरजी और रवि सक्सेना तो अपनी जगह पर थे ही। आयोग ने रिपोर्ट में कला की स्वायत्ता को महत्व देते हुए समाज को अश्लीलता से बचाने के लिए पुतले को चड्ढी पहनाने की सिफारिश की। कहानी पुतले के चड्ढी पहनाने के कार्यक्रम के दिन पर ही केन्द्रित है। लेकिन, फ्लैशबैक तकनीकि से पीछे की बातें भी कहती है। पुतले को जब दीवार तोड़कर मुक्त किया गया तब वह लोगों को पच्चीस साल का लगा। चड्ढी तो पाँच साल के लड़के के लिए लाई गई थी। सब लोग ‘हकबका कर चुप हो गए थे।’ कुछ ने इसके लिए कलिकाल को दोषी ठहराया तो रवि सक्सेना ने इसे पुतले की दुष्टई बताया।

यह कहानी देश की राजधानी दिल्ली से दूर राज्य के एक छोटे-से शहर में घटती है. पहली नजर में यह एक पुतले की कहानी है लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो यह कहानी एक शहर में गिरते राजनीतिक-सांस्कृतिक और इसलिए मानवीय मूल्यों और प्रगतिशील जीवन-दृष्टि में आती हुई गिरावट की कहानी है। एक तरह से यह उस शहर के बीस साल के इतिहास का सांस्कृतिक सर्वेक्षण भी है और उसका इतिहास लेखन भी. इतिहास को यह करवट केवल इस शहर में ही नहीं दिलाई जा रही थी बल्कि कहानी प्रधानमंत्री (दिल्ली) से लेकर मुख्यमंत्री (दौलताबाद कह लीजिये) तक के माध्यम से अखिल भारतीय स्तर पर व्याप्त है. जैसे श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ में रुप्पन बाबू को लगता है, “मुझे तो लगता है दादा सारे मुल्क में यह शिवपालगंज ही फैला हुआ है.” वैसे ही यह शहर पूरे मुल्क की कथा और कष्ट समेटे हुए है. पुतले से शहर को ही नहीं ‘सारे देश’ को संताप था, “पिछले बीस सालों से नगर ही नहीं, सारा देश जी संताप झेल रहा था,....”
इस बौने समय में मनुष्यता और कला निर्वासित कर दी गयी है। मनुष्यता और कला का निर्वासन पुरुषोत्तम अग्रवाल के कथा साहित्य के केंद्र में है। यह संयोग नहीं है कि कहानीकार की पहली कहानी ‘चेंग चुई’ भी स्थापत्य कला के एक रूप के अनुसार बने बंगले में निर्वासित अनुभव करते मनुष्य को लेकर लिखी गयी थी। ‘चौराहे पर पुतला’ में मूर्ति कला है। मनुष्य की मूर्ति है- पुतला। यहाँ पुतले के रूप में मनुष्य निर्वासित है। कहानीकार ने आज के मनुष्य के निर्वासन को अधिक स्पष्टता से उजागर करने के लिए ही पुतले का एक इन्सान के रूप में वर्णन किया है अर्थात् पुतले का मानवीकरण किया है। पुतले के मानवीकरण के माध्यम से उसे आज के मनुष्य के निर्वासन की दर्दनाक स्थिति को व्यक्त करने में अधिक सफलता मिली है।

कहानी का नायक एक पुतला है। एक कला-रूप है। पुतले के माध्यम से वे समाज में मनुष्य के लिए बची जगह की पैमाइश भले ही करते हैं लेकिन यह कहानी मूलतः कला के स्वधर्म की रक्षा की चिंता की कहानी है। कला के स्वधर्म के बहाने मानव-धर्म के लिए सिकुड़ती जगह की चिंता कहानी की केन्द्रीय चिंता है। कला का स्वधर्म, मनुष्य का स्वधर्म है। कला के स्वधर्म का विरोध असल में मानव-धर्म का विरोध है। यह कहानी, कला के स्वधर्म के पक्ष में और मानव-विरोधी समय और संस्कृति के परतों को उजागर करने वाले मानवीय विवेक की कहानी है।

‘पुतला’ एक स्वतंत्र, प्रसन्न, आदिम और अनावृत मानवीय व्यक्तित्व, का प्रतीक, है। मनुष्यता विरोधी समय और संस्कृति उसे पचा नहीं पातीं। सभ्यता की परतंत्रता एक आदिम मानवीय रूप को स्वतंत्र और जीवित नहीं रहने देना चाहती। उस सांस्कृतिक विमर्श का बोलबाला है जिसे कलाओं में अभिव्यक्त होने वाला मनुष्य का आदिम और अनावृत रूप अश्लील लगता है। और, जिसका अभिप्रत सेंसर्ड और पराधीन मानवता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की इस मानवता-विरोधी, कला विरोधी राजनीति को कंुठित और स्त्री-विरोधी प्रगतिशील (?) बौद्धिक लोगों का साथ मिलता है। ढुलमुल और नाप-तौल कर चलने वाली राजनीति कला को, मनुष्य को न केवल बचा पाने में असफल होती है बल्कि वह भी उनके साथ हो लेती है - मनुष्यता और कला की स्वतंत्रता के हरण के लिए। उसे सेंसर करने के लिए तीनों में होड़ लग जाती है। फलस्वरूप पुतले को ‘चढ्ढी’ पहनाने के सांस्कृतिक अभियान की विजय होती दिखायी देती है। बहुत दिनों से चारदीवारी में कैद करके निर्वासित की गयी कला - मनुष्यता को सेंसर करने का प्रयास किया जाता है, अर्द्ध-पराधीन कर दिया जाता है।
आज की दुनिया में किसी समुदाय की भावना-आहत होने के और अश्लील होने के आरोप में कलाकृतियों, रचनाओं और फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। कलाकारों-लेखकों को देशनिकाला दे दिया जाता है। मकबूल फिदा हुसैन, सलमान रूश्दी और तस्लीमा नसरीन के साथ जो कुछ हुआ और हो रहा है उससे कौन संवेदनशील हृदय चिंतित नहीं है? ‘चौराहे पर पुतला’ में लेखक ने इन्हीं चिंताओं को व्यापक परिप्रेक्ष्य में वाणी देने की कामयाब कोशिश की है। इसलिए इसे कला के स्वधर्म की रक्षा करने वाली कहानी कहना चाहिए।

प्रतिरोध की आवाजें कहानी में जिस तरह गुम हैं, उससे यह स्पष्ट है कि स्वतंत्र मनुष्य के प्रतीक, कला के स्वधर्म के प्रतीक पुतले को पूर्णतया लुप्त या पराधीन करने की दिशा में चढ्ढी पहनाने की सांस्कृतिक कार्यवाही पहला कदम है। ध्यान रखें, आखिरी नहीं। और वह दिन दूर नहीं जब पुतला हटा दिया जाएगा, जब मनुष्य-धर्म, कला का स्वधर्म विलुप्त कर दिया जाने वाला है। यह कहानी कला के स्वधर्म और मनुष्यता के संकटग्रस्त होने की सूचना और फासीवाद की आसन्न आहटों की ओर ध्यान देने, कान देने के लिए सावधान करती है। यह मानवता विरोधी, कला विरोधी समय में फँसी मनुष्यता, कला को देखने के लिए आँख खोल देने वाली कहानी है।

समय के बौनेपन की इन्तहां यह है कि लोगों को 20 सालों में 5 साल का पुतला 25 साल का लगने लगता है। इस प्रसंग के वर्णन में लेखक ने कुछ-कुछ जादुई यथार्थवादी शैली का सहारा लिया है। जिससे लगता है कि पुतला सचमुच में बढ़ गया है लेकिन, सच तो यह है कि विकास पुतले में नहीं हुआ है बल्कि इसके विपरीत संकुचन आदमी में हुआ है। उसमें संकीर्णता बढ़ी है। सांस्कृतिक राष्ट्रवादी राजनीति और नैतिकतावादी दुराग्रहों के फलस्वरूप 20 सालों में आदमी में बौनापन आया है। जिस अनुपात में यह बौनापन बढ़ा है, उसी अनुपात में निर्जीव पुतले की उम्र अधिक लगती है। जिन आँखों को ’गोल दीवारों में कैद’ पुतला दीवारों को तोड़ने के बाद 25 साल का लगता है, वे आँखें स्वयं ’गोल दीवारों की कैद’ में हैं। सच तो यह है कि पुतले को कैद करने के पहले ये आँखें स्वयं को कैद कर चुकी थीं। इसी कैद से पुतले को कैद करने का विचार प्रसूत हुआ था। और तब से ये आँखें और पुतला दोनों कैद में रहते आये हैं।

बिडम्बना यह है कि इसके लिए राजनीतिक वर्ग में सर्वसम्मति है। आज जिसे पुतले की मुक्ति और ’आँखों’ को संताप से मुक्त करने का सांस्कृतिक-राजनीतिक कार्यक्रम कहा जा रहा था और जिसमें मुख्यमंत्री, प्रतिपक्ष के नेता और प्रगतिशील बुद्धिजीवी के साथ-साथ मीडिया और नगर की जनता शामिल थी, वह असल में सांस्कृतिक पतन के एक चरण पूरे होने का उत्सव था। जिसमें पुतले और संस्कृति की कैद पर वैधानिक, लोकतान्त्रिक, धार्मिक, बौद्धिक और न्यायिक मुलम्मा चढ़ना था। इससे उपजी स्थिति - सांस्कृतिक पतन और उसके सर्वग्रासी रूप की भयावहता- का कहानीकार ने कॉमिक-व्यंग्य शैली में वर्णन किया है। इस जुलूस, जिसमें ’’राजनैतिक जुलूसों वाला छिछोरा जोश नहीं, धार्मिक चल-समारोह सरीखा भावपूर्ण उत्सव था।’’ को देखकर मुक्तिबोध की कहानी ‘अँधेरे में‘ के रात में निकलनेवाले जुलूस की सहज ही याद आ जाती है, जिसमें डोमाजी उस्ताद, राजनेता, कवि, पत्रकार सब शामिल थे। ‘‘चौराहे पर पुतला’ में भी सब मिले हुए हैं, सब एक साथ हैं।

चड्ढी असल में पुतले को नहीं बल्कि मानवीय विवेक को पहनाई गयी है। चड्ढी से पुतले की नग्नता को नहीं ढँका गया है बल्कि इससे समय के बौनेपन को ढँकने की कोशिश की गयी है। कहानीकार की सफलता यह है कि पुतले को चड्ढी पहनाने के बहाने उसने भयावह समय के तहों से पर्दा उठा दिया है। ‘‘गंगाधरजी को समझ नहीं आ रहा था कि इस उलटबाँसी का क्या अर्थ निकालें कि जीवित होने का दावा करने वाले मनुष्य जिस कलिकाल में बौने होते जा रहे हैं, उसी कलिकाल में पत्थर का यह जड़ पुतला अपने कद में बढ़ता चला गया था। जो चड्ढियाँ पुतले को पहनाने के लिए लायी गयी थीं, वे उसकी निर्वस्त्रता के आगे छोटी पड़ गयी थीं, और उसे चड्ढी पहनाने पर आमादा अक्लें उसकी हिमाकत के सामने बौनी हो गयी थीं।’’
बौद्धिक वर्ग के प्रतिनिधि चरित्र रवि सक्सेना के माध्यम से कहानीकार ने बौद्धिक वर्ग की भी आलोचना की है। अवसरवादी, भटका हुआ स्त्री विरोधी बौद्धिक वर्ग कैसे इस पतन में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति के काम आता है, रवि के चरित्र के माध्यम से कहानीकार इस स्थिति को विस्तार से दिखाया है। रवि प्रगतिशील और वामपंथी होने के बावजूद फ्रायडीय चिंताओं से परेशान मर्दवादी हैं। उन्हें लगता था कि पुतला उनके वैवाहिक जीवन को नष्ट किए दे रहा है। वे लगभग कामविकारों के रोगी हो चुके थे इसलिए पुतले को शत्रु मानने लगे थे। ऐसे प्रगतिशीलों के स्त्री विरोधी चरित्र को कहानीकार ने विस्तार से उकेरा है, ‘‘प्रगतिशीलता के चक्कतर में कब तक उस हरामी पुतले को इजाजत देता कि वह मेरी लुगाई को लुभाता रहे .... प्रगतिशील हूँ, वामपंथी हूँ नामर्द तो नहीं।’’ यह एक हास्यास्पद चरित्र है।

इसके अलावा लेखक-कलाकार सब इस स्थिति में इतना ढल गए थे कि वे कला के स्वधर्म की रक्षा के प्रति बेपरवाह हो चुके थे। ‘‘रहे कलाकार, लेखक आदि, सो उनमें से अधिकांश धीरे-धीरे मानने लगे थे कि यार, ‘और भी ग़म हैं, ज़माने में पुतले के सिवा।’’’ कला की स्वायत्तता के लिए वे कलाकार भी अब उदासीन हो गये हैं, जो राजसत्ता से मेल-जोल बनाकर कला का व्यापार करते हैं। बौद्धिक और कलाकार-समुदाय की यह अवसरवादिता और उदासीनता सबसे ज्यादा अखरती है। समय और संस्कृति का बौनापन इतना सर्वग्रासी है कि लेखक, बृद्धिजीवी और कलाकार भी उसमें शामिल दिखायी देते हैं। सबके लिए बहाना यह है कि ‘‘न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान सबको करना ही होगा।’’ कहानीकार ने इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पर चोट की है। एक प्रगतिशील, कला के स्वधर्म के प्रतिबद्ध लोकतांत्रिक मिजाज के बौद्धिक-कलाकार समुदाय की कमी भी स्थिति के बदतर होने के लिए जिम्मेदार है। कहानीकार की अंतर्दृष्टि यही कहती है कि ऐसे सुदृढ़ और गतिशील बौद्धिक-कलाकार समुदाय के बिना स्थिति को बदला नहीं जा सकता है, मनुष्य और कला के लिए जरूरी जगह निर्मित नहीं की जा सकती है। मनुष्य और कला का संघर्ष एक ही है।

जिन ‘बहू-बेटियों’ के चरित्र की रक्षा के नाम पर सारा पुरुषवादी सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व्यापार चलाया जा रहा है, उनका पक्ष सचमुच में अनुपस्थित है। कोई उनका पक्ष जानने की कोशिश नहीं करता है- न बुद्धिजीवी, न राजनीति और न ही न्यायिक आयोग। ऐसे में इस स्थिति का सबसे अधिक शिकार औरतें ही होती हैं। जया के चरित्र के माध्यम से कहानीकार ने पूरे ‘सांस्कृतिक-लोकतांत्रिक-न्यायिक-धार्मिक माहौल’ में स्त्री की पराधीनता और उसके निर्वासन को बड़े मार्मिक ढंग से उजागर किया है। ‘‘जया कभी-कभी सोचती थी कि मुझे तो बस पुतले को देख कर हँसी आई थी, रवि को मेरे गालों पर लाज की लाली कैसे दिख गयी? मैं पुतले को देख कर कम हँसी थी, और रवि के भोल से बुद्धूपन पर अधिक। इस भोलपन को बेवकूफी में किसने बदला? जिस प्यार से मैं हँसी थी, उसे बेतुकी तुलना में किसने बदला? दोस्ती की जिस जमीन पर खड़ी मैं हँस रही थी, उसमें निराधार ईर्ष्या की बारूदी सुरंग किसन लगाई? जया इन प्रश्नों के उत्तर जानती थी, लेकिन जानने का फायदा क्या था?’’ सब कुछ जानते हुए भी वह कुछ बोलने के लिए स्वतंत्र नहीं थी। ‘‘जया के लिए तय करना मुश्किल हो चला था कि वह इस बीमार इंसान पर दया करे या इस कूढ़मगज, जिद्दी पति पर एक हाथ जमा दे।’’ उक्त अंश आज के स्त्री-चेतना और आधुनिकता के दौर में स्त्री की बेबसी और पराधीनता को बड़े कारुणिक ढंग से व्यक्त करते हैं।

कहानी में सामयिक विमर्शों की महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण उपस्थिति है। विविध सामयिक विमर्शाें की भाषा और अनुगँूज पूरी कहानी में व्याप्त है। इसलिए यह कहानी अपनी संरचना में अच्छी-खासी बौद्धिक कहानी है। विभिन्न विमर्शाें को एक साथ रखकर इतनी रचनात्मकता पैदा करना निश्चय ही एक बड़ी संवेदनात्मक और रचनात्मक चुनौती रही होगी। लेकिन, हास-परिहास और व्यंग्य की आद्यांत अंतर्धारा में ये विमर्श उपस्थित होकर भी रचनात्मकता को बाधित नहीं करते हैं। हाँ, यह अवश्य है कि दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियों के आदती के लिए इस कहानी को समझना ज़रा मुश्किल हो सकता है। इस कहानी को समझने के लिए एक निश्चित स्तर की बौद्धिकता जरूरी लगती है।
  
इन विमर्शों की शब्दावली और पद-बंध सीधे-सीध कहानी में प्रयोग किये गये हैं। लेकिन भाषा जिस तरह से खिलंदड़ई करते हुए, पाठक को चकित करते हुए आगे बढ़ती है उसमें ये जरा भी अखरते नहीं हैं। ‘शारीरिक-समीक्षा’, ‘लुगाई-लुभावन’, ‘पधराये रहेंगी’, ‘सांस्कृतिक-ठुकाई’, ‘आनंद-कथा’, ‘बिगूचन-तत्व’, ‘बिटर-बिटर आँखें खोले रहने वाली’ जैसे नये-नये शब्द प्रयोगों और ‘परवारे’, ‘खोंचड़’ जैसे कई विस्मृत हो चुके शब्दों की वापसी से भरी भाषा में विमर्शों की शब्दावली और पद-बंध खप जाते हैं और रचना के भावबोध और विचारलोक को बहुश्रुत और स्तरीय बनाते हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, भारत माता की अवधारणा, दक्षिणपंथ, इतिहास-देवता, फ्रायडवाद, मनोविश्लेषण, राजनीति और साहित्य, पतनशील सामंतवाद, मार्क्सवाद, वर्गच्युत, प्रगतिशील, वामपंथ, मेल शाविनिज़्म, समता, स्वाधीनता, कुंठा, संत्रास, न्यायिक आयोग, निर्वासन, अकेलापन, कला और अश्लीलता, भोक्ता और रचयिता, अस्मिता, कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वाधीनता, राज्य सत्ता और कला, लोकतंत्र, पुरुषवाद, प्रतिक्रियावाद, इंफोटेनमेंट क्रान्ति, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, वैज्ञानिक दृष्टि, आधुनिकतावाद, अनुभव और अनुभूति, इकॉनामी ऑव स्केल, हृदय-परिवर्तन, ऐतिहासिक भूल, वस्तुनिष्ठ ऐतिहासिक आकलन, द्वंद्वात्मक पद्धति, थीसिस-ऐंटी थीसिस, सिन्थेसिस, मध्य-मार्ग, कलावाद, कलात्मक मूल्य, कलाकृति की इयत्ता, कला की स्वायत्तता, कानून का राज, कलियुग, पालिटिकली इनकरेंक्ट, और सार्वजनिक नैतिकता जैसे पद विविध विमर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं। विमर्शों की शब्दावली और पद-बंध कहानी को बहुलार्थी और अर्थसघन बनाते हैं। हिंदी के कई मुहावरों का भी रचनात्मक प्रयोग पाठकों का ध्यान खींचता है।

कोई भी रचना अपने समय के यथार्थ को अभिव्यक्त करती है। लेकिन वह सामयिक घटनाओं और तथ्यों की रपट नहीं होती है। यह कहानी भी यथार्थपरक है। वह यथार्थ जो हमारे राजनीतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवन के अनुभवों की प्रामाणिकता पर आधारित है। इसमें समकालीन घटनाओं, व्यक्तियों और विमर्शों की उपस्थिति है। अपने समय की विभिन्न घटनाओं की अनुगूंज इस कहानी में सुनाई देती है। समकालीन जीवन की न जाने कितनी घटनाओं, व्यक्तियों और विमर्शों की प्रतिध्वनि और रेखांकन कहानी में आपको मिलेगा। यह हर पाठक की अपनी जानकारी और समझदारी पर निर्भर करेगा। फिर भी यह कहानी न समकालीन घटनाओं का रिपोर्ताज है और न ही प्रतिछवि। यह कहानीकार के अपने युगीन यथार्थ की रोचक पुनरर्चना है। यही होता है साहित्य। यही होती है यथार्थपरक कला। 

आनंद पांडेय ने जवाहरलाल नेहरु विश्‍वविद्यालय से उच्‍च शिक्षा प्राप्त की है। यहीं से पीएच.डी. की। लंबे समय तक छात्र-राजनीति से जुड़े रहे। इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य में संलग्न हैं। साहित्यिक और सामाजिक सरोकार के साथ लेखन में सक्रिय हैं। इनसे anandpandeymail@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

2 टिप्‍पणियां:

  1. धन्यवाद, आनंद इस रीडिंग के लिए, इस टिप्पणी के लिए...

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  2. सुमनकेशरी13 मार्च 2013 को 10:39 pm


    "पहली नजर में यह एक पुतले की कहानी है लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो यह कहानी एक शहर में गिरते राजनीतिक-सांस्कृतिक और इसलिए मानवीय मूल्यों और प्रगतिशील जीवन-दृष्टि में आती हुई गिरावट की कहानी है। एक तरह से यह उस शहर के बीस साल के इतिहास का सांस्कृतिक सर्वेक्षण भी है और उसका इतिहास लेखन भी. इतिहास को यह करवट केवल इस शहर में ही नहीं दिलाई जा रही थी बल्कि कहानी प्रधानमंत्री (दिल्ली) से लेकर मुख्यमंत्री (दौलताबाद कह लीजिये) तक के माध्यम से अखिल भारतीय स्तर पर व्याप्त है"
    कहानी का नायक एक पुतला है। एक कला-रूप है। पुतले के माध्यम से वे समाज में मनुष्य के लिए बची जगह की पैमाइश भले ही करते हैं लेकिन यह कहानी मूलतः कला के स्वधर्म की रक्षा की चिंता की कहानी है। कला के स्वधर्म के बहाने मानव-धर्म के लिए सिकुड़ती जगह की चिंता कहानी की केन्द्रीय चिंता है। कला का स्वधर्म, मनुष्य का स्वधर्म है। कला के स्वधर्म का विरोध असल में मानव-धर्म का विरोध है। यह कहानी, कला के स्वधर्म के पक्ष में और मानव-विरोधी समय और संस्कृति के परतों को उजागर करने वाले मानवीय विवेक की कहानी है।


    आनंद बहुत अच्छा विवेचन-विश्लेषण...सच में कहानी खुलती है इस लेख से. बधाई. आप और लिखें तो आलोचना का भला होगा क्योंकि समग्रतापूर्ण दृष्टि से पाठ करना दिनोंदिन कम होता जा रहा है.

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