मंगलवार, 22 जनवरी 2013

‘कौन है यह गुस्ताख’: मंटो पर केंद्रित नाट्‌य प्रस्तुति

सामाजिक बदलाव के लिए सक्रिय पाकिस्तानी थियेटर ग्रुप ‘अजोका थियेटर’ की मंटो पर केंद्रित प्रस्तुति को देखना एक खूबसूरत अनुभव रहा। तारीख, १९-१-२०१३। यह कार्यक्रम जे.एन.यू.-नई दिल्ली के एक प्रेक्षागृह में हुआ। नाटक का शीर्षक रहा,  ‘कौन है यह गुस्ताख’। राष्ट्रीय नाट्‍य विद्यालय के सौजन्य से इस नाटक को खेला जाना था, लेकिन एकाएक पाकिस्तान से संबंध की तल्खी के बहाने इस कार्यक्रम को रद्द करने का हैरत अंगेज निर्णय लिया गया। मंटो जैसे लेखक जिनका साहित्य और मूल्यवत्ता किसी सीमा के दायरे में नहीं बंधती, उससे संबद्ध नाटक का सीमाई(तनाव का) कारण बनाकर प्रदर्शन न हो पाना त्रासदी ही है। शाषक चरित्र की हृदयहीनता व निरंकुशता! 

उर्दू अदब के आला साहित्यकार सआदत हसन ‘मंटो’ के जीवन और रचना-कर्म पर केंद्रित इस काबिले-तारीफ नाटक को देखते हुए समय कैसे निकल गया पता ही नहीं चला। इतिहास की घटनाएं जहां हमारे जेहनों में कौंध रही थीं, वहीं फिलवक्त की बहुतेरी उलझनों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी स्पष्ट होती जा रही थी। देश की आजादी और विभाजन के बीच ऐसा बहुत कुछ घटता गया जिसे आजादी के उत्साह में भुला देना संभव नहीं। 

त्रासदियों के अनेकानेक सूत्रों को खोलते हुए यह नाटक साहित्यकार मंटो की चिंताओं और उद्देश्यों को बखूबी रखता जा रहा था। उन सारी परिस्थितियों झांकी मौजूद थी जिसमें अपने किसी भी समकालीन साहित्यकार से अधिक मंटो जूझ रहे थे, अकेले थे, असहाय-से! मंटो जिन्हें न तो उस समय के प्रगतिशील साहित्यकार समझ पा रहे थे या समझने की कोशिश कर रहे थे और न ही उनसे अलग सरोकार का दावा करने वाले अन्य साहित्यकार। कारण स्पष्ट था, सबकी अपनी-अपनी सीमाएं थीं और मंटो गैरजानिबदाराना ‘सच’ को कहने के अभ्यासी थे। मजहबी हुजूम से भला क्या उम्मीद जब समकालीन साहित्यकार ही किसी हमसफर अदीब के दिलो-दिमाग की बातें न समझना चाहें! और मंटो का कहना साफ था, ‘जमाने के जिस दौर से हम इस वक्त गुजर रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ हैं तो मेरे अफसाने पढ़िए। अगर आप इन अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब यह है कि यह जमाना नाकाबिले-बर्दाश्त है..!’ 

टीम के साथ मदीहा गौहर(बीच में, हरे कपड़े में) फोटो: अमरेन्द्र 

इस नाटक का एक संवाद यहां रखना चाहूंगा। यह वक्त है, अदालत में मंटो पर चल रहे मुकदमे की सुनवायी का जिसमें फैज अहमद फैज आदि अदीब मंटो के अफसानों पर अपनी तंग-नजरी भरी दलील रखते हैं। मंटो अपना पक्ष रखते जाते हैं! (तब भी अदालत दुर्भाग्यपूर्ण ढ़ंग से मंटो को सजा सुनाती है!) कवि कर्नल फैज अहमद फैज के साथ मंटो का संवाद: 

“फैज अहमद फैज: मेरी राय में अफसाना फ़ह्हाश(अश्लील बातें करने वाला) कतई नहीं। किसी अफसाने से एक लफ्ज निकाल कर उसे फ़ह्हाश कहना बेइमानी बात है। अफसाने पर तनकीद करते समय मजमुई तौर पर तमाम अफसाना जेरे-नजर होना चाहिए। महज उरयानी किसी तहरीर के फ़ह्हाश होने की दलील नहीं। मैं समझता हूं इस अफसाने के मुसन्निफ ने फ़ह्हाश-निगारी नहीं की लेकिन अदब के आला तकाजों को पूरा भी नहीं किया। क्योंकि इसमें जिंदगी के बुनियादी मसाइल का तसल्लीबख्श तजदिया नहीं है। 
मंटो: आपकी शायरी में जिंदगी के बुनियादी मसाइल का तसल्लीबख्श तजदिया मौजूद होता है कर्नल फैज? 
फैज अहमद फैज: शायरी के तकाजे और होते हैं....
मंटो: यानि कि कहानी आला अदब नहीं है तो उसे बैन कर देना जायज है?
फैज अहमद फैज: जी नहीं। अदब या अदीब के मकाम का तायून नकाद, ..और तारीख करती है, अदालतें नहीं। 
मंटो: शुक्रिया ..! तो फिर आपने ये तायून कैसे कर दिया कि यह आला अदब नहीं है! क्या आप तारीख के तर्जुमान हैं? ...मैं ऐसे किरदार पेश कर रहा हूं जो गंवार हैं, लुटेरे हैं, जिन्सी लिहाज से तगड़े हैं। अब जाहिर है उनकी जबान गंगा-जमुना से धुली तो हो नहीं सकती। अगर मैं शाइस्ता अल्फाज उनके मुंह में डाल देता तो यह अदब की बजाय खुराफात बन जाता। तब इसे यकीनन फ़ह्हाश करार दिया जा सकता था।

(फैज: मेरी राय में अफसाना अश्लील कतई नहीं। किसी अफसाने से एक लफ्ज निकाल कर उसे अश्लील कहना बेइमानी बात है। अफसाने पर आलोचना करते समय समग्र रूप से अफसानों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। महज नंगापन किसीलेखन के अश्लील होने की दलील नहीं। मैं समझता हूं इस अफसाने के लेखक ने अश्लील-लेखन नहीं किया है, लेकिन श्रेष्ठ साहित्य की मांगों को पूरा भी नहीं किया। क्योंकि इसमें जिंदगी के आधारभूत मसलों का सुकूनदेय उत्तर नहीं है।
मंटो: आपकी शायरी में जिंदगी के आधारभूत मसलों का सुकूनदेय उत्तर मौजूद होता है कर्नल फैज?
फैज अहमद फैज: कविता की मांगें अलग तरह की होती हैं....
मंटो: यानि कि कहानी श्रेष्ठ साहित्य नहीं है तो उसे बैन कर देना उचित है?
फैज अहमद फैज: जी नहीं। साहित्य या साहित्यकार की श्रेष्ठता का मूल्यांकन आलोचक ..समय करता है, न्यायालय नहीं।
मंटो: शुक्रिया ..! तो फिर आपने ये मूल्यांकन कैसे कर दिया कि यह श्रेष्ठ साहित्य नहीं है! क्या आप तारीख के प्रस्तुतकर्ता(अनुवादक) हैं? ...मैं ऐसे चरित्र पेश कर रहा हूं जो गंवार हैं, लुटेरे हैं, सेक्स के लिहाज से असंयत हैं। अब जाहिर है उनकी जबान गंगा-जमुना से धुली तो हो नहीं सकती। अगर मैं शालीन शब्द उनके मुंह में डाल देता तो यह साहित्य के बजाय खुराफात बन जाता। तब इसे निश्चय ही अश्लील करार दिया जा सकता था।”)

नाटक के अमूमन सभी पात्रों ने बढ़िया अभिनय किया। नाटक की समाप्ति पर नाटक की निर्देशिका मदीहा गौहर ने जे.एन.यू. में अपने नाटक की सफलता पर आभार ज्ञापन किया और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कार्यक्रम रद्द किये जाने पर दिली अफसोस जाहिर किया। 

6 टिप्‍पणियां:

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