रविवार, 11 मार्च 2012

खुले में रचना / कविता-पाठ / ११-३-१२ / jnu / [१]

अभी कुछ घंटों पहले जे.एन.यू.-एस.एल. के कमिटी रूम में आयोजित ‘खुले में रचना -१’ से लौटा हूँ। मैंने पूरा कार्यक्रम सुना। इसपर अपनी ओर से रपट और अंततः अपनी बात रखना चाहता हूँ। एक पोस्ट में यह संभव न हो सकेगा इसलिये तीन हिस्सों में बाँट दे रहा हूँ, १- आमंत्रित कवयित्री सुमन केसरी और अरुण देव का काव्यपाठ और उसपर साहित्यकार अशोक वाजपेयी की टिप्पणी। २- अशोक वाजपेयी की कविताएँ, और उनके विचार(जो प्रश्नोत्तर आदि के क्रम में आए)। ३- अशोक वाजपेयी की बातों पर कुछ अपनी बात(खास करके कविता, गुणवत्ता और लोकप्रियता से ताल्लुक)। फिलहाल यह पहला हिस्सा प्रस्तुत है: 

कार्यक्रम निर्धारित समय से कुछ विलंब से शुरू हुआ। संचालन सईद साहिब कर रहे थे। उन्होंने शुरुआत में अरुण जी को कविता पढ़ने के लिये आमंत्रित किया। अरुण जी ने इस तरह अपनी कविताएँ और बातें रखी: (बीच बीच में ईडिट कर कुछ ‘बातें’ भी सिंगल इन्वर्टेड  कॉमा  के साथ रख रहा हूँ) 

‘जे.एन.यू. में पढ़ा हूँ, यहाँ से बहुत कुछ सीखा है, यहाँ आना और कविता सुनाना घर में आने जैसा है। आँगन में आने पर जैसा लगता है! यह आप लोगों का स्नेह है जो आपने इतना मान दिया। कुछ कविताएँ सुना रहा हूँ, कि जिससे कवि का भावबोध आ जाय! पहिली कविता जो आपको सुनाना चाहता हूँ उसका शीर्षक है ‘लालटेन’।’ 

“अभी भी वह बची है
इसी धरती पर

अँधेरे के पास विनम्र बैठी
बतिया रही हो धीरे–धीरे

सयंम की आग में जैसे कोई युवा भिक्षुणी

कांच के पीछे उसकी लौ मुस्काती
बाहर हँसता रहता उसका प्रकाश
जरूरत भर की नैतिकता से बंधा

ओस की बूंदों में जैसे चमक रहा हो
नक्षत्रों से झरता आलोक

अक्सर अँधेरे को अँधेरे के बाहर कहा गया
अँधेरे का सम्मान कोई लालटेन से सीखे
अगर मंद न कर दिया जाए उसे थोड़ी देर में
वह ढक लेती खुद को अपनी ही राख से

सिर्फ चाहने भर से वह रौशन न होती
थोड़ी तैयारी है उसकी
शाम से ही संवरती
भौंए तराशी जातीं
धुल-पुछ कर साफ होना होता है
कि तन में मन भी चमके

और जब तक दोनों में एका न हो
उजाला हँसता नहीं
कुछ घुटता है और चिनक जाता है कहीं
भभक कर बुझ जाती है लौ!” 

इसके बाद उन्होंने ‘शास्त्रार्थ’ , ‘अयोध्या’ , ‘पत्नी के लिए’ ‘सिरहाने मीर के’ आदि कविताएँ सुनायी। ‘पत्नी के लिये’ कविता पर उनका कहना रहा कि यह फेसबुक पर बड़ी विवादास्पद कविता रही है। इस कविता को यहाँ रखना चाहूँगा: 

“वह आंच नहीं हमारे बीच
जो झुलसा देती है
वह आवेग भी नही जो कुछ और नहीं देखता
तुम्हारा प्रेम जलधार जैसा 

तुम्हारा प्रेम बरसता है
और कमाल की जैसे खिली हो धूप

तुम्हारा घर
प्रेम के साथ-साथ थोड़ी दुनियावी जिम्मेदारिओं से बना है
कभी आंटे का खाली कनस्तर बज जाता है
तो कभी बिटिया के इम्तहान का रिपोर्ट कार्ड बांचने बैठ जाती हो

तुम्हारे आंचल से कच्चे दूध की गंध आती है
तुम्हारे भरे स्तनों पर तुम्हारे शिशु के गुलाबी होंठ हैं
अगाध तृप्ति से भर गया है उसका चेहरा
मुझे देखता पाकर आंचल से उसे ढँक लेती हो
और कहती हो नज़र लग जाएगी
शायद तुमने पहचान लिया है मेरी ईर्ष्या को 

बहुत कुछ देखते हुए भी नहीं देखती तुम
तुम्हारे सहेजने से है यह सहज

तुम्हारे प्रेम से ही हूँ इस लायक कि कर सकूँ प्रेम

कई बार तुम हो जाती हो अदृश्य जब
भटकता हूँ किसी और स्त्री की कामना में
हिस्र पशुओं से भरे वन में 

लौट कर जब आता हूँ तुम्हारे पास
तुम में ही मिलती ही वह स्त्री
अचरज से भर उसके नाम से तुम्हें पुकारता हूँ

तुम विहंसती हो और कहती हो यह क्या नाम रखा तुमने मेरा!” 

अरुण जी के उपरांत सुमन केसरी जी को काव्यपाठ के लिये आमंत्रित किया गया जिनके संदर्भ में सईद साहिब ने कहा कि ‘सुमन जी की कविताओं को केदार नाथ सिंह जी संवादधर्मी गंभीर कविता कहते हैं।’ सुमन जी ने कहा: 

‘कवितापाठ पहले किया है लेकिन आज आप लोगों के बीच हूँ तो जैसे पहली बार पढ़ने जैसा हो। मेरी मनोकामना थी कि कभी अशोक वाजपेयी जी के समक्ष कविता पढ़ूं, आज बड़ा अच्छा लग रहा है कि इतने सारे कवि नैजवान के साथ पढ़ रही हूँ। जैसा कि बताया गया कि मैं मिथकों-पौराणिक चरित्रों पर कविताएँ लिखती हूँ, उन चरित्रों को आज की दृष्टि से देखती हूँ, लेकिन मैं ऐसा भी नहीं कर सकती कि वे अपनी भूमि से अलग हो जाएँ। उनके मूल को देखते हुये उनके विकास की कल्पना करती हूँ, इस तरह से मैं अपने मिथकीय चरित्रों को उठाती हूँ। पहले मैं आपको ‘स्त्री होकर सवाल करती है’ संग्रह की कविता ‘दौपदी’ को पढ़ती हूँ कि मुझे लगता है कि पूरे संग्रह के शीर्षक में इसकी थोड़ी सी अनुगूँज है।’ 

इस कविता की कुछ पंक्तियां इस तरह हैं: 

“ क्या परिचय दूं मैं अपना 
दौपदी... पांचाली... कृष्णा... याज्ञसेनी... 
सभी संज्ञाएँ वस्तुतः विशेषण हैं या संबंधसूचक 
कभी गौर किया है तुमने 
मेरा कोई नाम नहीं।” 

सुमन जी ने फिर ‘कृष्णा’ कविता सुनायी: 

“मैं पांचाली-पुंश्चली
आज स्वयं को कृष्णा कहती हूँ
डंके की चोट !

मुझे कभी न भूलेगी कुरुसभा की अपनी कातर पुकार
और तुम्हारी उत्कंठा
मुझे आवृत्त कर लेने की

ओह! वे क्षण
बदल गई मैं
सुनो कृष्ण ! मैंने तुम्हीं से प्रेम किया है
दोस्ती की है

तुमने कहा-
“अर्जुन मेरा मित्र, मेरा हमरूप, मेरा भक्त है
तुम इसकी हो जाओ
मैं उसकी हो गई”

तुमने कहा-
“माँ ने बाट दिया है तुमको अपने पाँचों बेटो के बीच
तुम बँट जाओ
मैं बँट गई

तुमने कहा-
सुभद्रा अर्जुन प्रिया है
स्वीकार लो उसे
और मैंने उसे स्वीकार लिया

प्रिय ! यह सब इसलिए
कि तुम मेरे सखा हो
और प्रेम में तो यह होता ही है !

सब कहते हैं-
अर्जुन के मोह ने
हिमदंश दिया मुझे
किन्तु मैं जानती हूँ
कि तुम्हीं ने रोक लिए थे मेरे क़दम
मैं आज भी वहीं पड़ी हूँ, प्रिय
मुझे केवल तुम्हारी वंशी की तान
सुनाई पड़ती है
अनहद नाद-सी ।” 

इनकी कविता ‘बा और बापू’ इस तरह रही: 

“चलते चलते आख़िर थक ही गई
इशारे भर से रोक लिया उसे भी
उस ढलती शाम को
जो जाने कब से तो चल रहा था
प्रश्नो की कँटीली राह पर
नंगे पाँव

नियम तोड़ रुक गया वह
भीग गई आत्मा
लहलहाई
कोरों पर चमकी
यह जानते हुए भी
कि देह भर रुकी है उसकी
शय्या के पास
मन तो भटक ही रहा है
किरिच भरी राहों पर
उन प्रश्नों के समाधान ढ़ूँढ़ता
जो अब तक पूछे ही न गए थे...” 

सुमन जी का रचना-कर्म महज स्त्री-विमर्श की हदों में बंधा नहीं है, उन्होंने कविता के अलग रूप-रंग भी दिखाया। 

इसके उपरांत दोनों कवियों पर अशोक वाजपेयी जी ने अपनी टिप्पणी प्रस्तुत की। अशोक जी ने कहा: 

‘‘मित्रों! कविताओं को सुनना और उसके बाद उसपर टिप्पणी करना कोई उत्साहजनक कार्यवाही नहीं है। .. मैं दो-तीन बातें कहना चाहता हूँ। एक तो यह सही है कि हमारी ज्यादातर कविता पढ़ी जाने के लिये लिखी गयी है। वह सुनाने के लिये नहीं लिखी गयी है। एक जमाना था जब सुनाने के लिये लिखी जाती थी। लेकिन अब बुनियादी संस्कार में फर्क आया है। जब हम किसी कवि से कविता सुनते हैं तो दूसरा फर्क पड़ता है, उसकी उपस्थिति का फर्क पड़ता है। उसके बलाघात का फर्क पड़ता है। जिसे हम पढ़ते समय नहीं देख पाते। तो..! 

दोनों अपने-अपने ढ़ंग के अलग-अलग रंग के कवि हैं। दोनों में एक बात समान है। जिसका जिक्र सुमन जी ने किया है। कि हमें हिन्दी समाज में व्याप्ति लाना है तो उसकी एक जातीय स्मृति होती है। उस जातीय स्मृति का संबंध मिथक पुराण या इतिहास ग्रंथ से ही नहीं है, हर भाषा की एक जातीय स्मृति होती है। वह कवि का लोक होता है। कविता का एक काम हमको भूलने से रोकना है। कविता का दूसरा काम वो है जिसे हम अधीरता में, जल्दबाजी में, - हालाकि मैं नहीं समझ पाता कि लोगों को इतनी जल्दबाजी काहे की है – नहीं ध्यान देते, ठहराव लाना है। इस अनावश्यक-अनर्थक तेजी के बीच कविता का एक काम ठिठकाना है। वह रूपों, बिंबों, प्रतीकों, शब्दों से ठिठकाती है। 

कविता प्रत्याशित को – जैसे सबको पता है कि ऐसा हुआ, ऐसा होना है – अप्रत्याशित में बदलती है। मसलन सुमन जी की कविता में दौपदी कृष्ण से अपने प्रेम को स्वीकार करती है। ऐसे ही पहले भी महाभारत के चरित्र के साथ उड़िया के साहित्यकार ने प्रयोग किया है। दृष्य है कि कर्ण से मिलने द्रौपदी जाती है, तब जब वह वहां जाती है तो पहले भीष्म पितामह का शिविर पड़ता है, अब वह जायेगी तो जूते कहां रखेगी, यहां पर कृष्ण ने कहा कि तुम जाओ मैं तुम्हारे जूते की रखवाली करता हूं। अब यह अप्रत्याशित है। महाभारत ने इसे नहीं कहा लेकिन आगे के कवियों को महाभारत ने इसे कहने से रोका भी नहीं। महाकाव्य वह है जो आगे आने वाले कवियों को भी पूरी छूट देता है, मुक्ति देता है। महाकाव्य बाइबिल-कुरान-वेद नहीं है, जिसमें आप फेर-बदल न कर सकें। इसलिये धर्मग्रंथ पूज्य होते हुये भी इस अर्थ में कविता नहीं होते। अरुण जी की ‘लालटेन’ कविता सुनते हुये दो बातें याद आयीं। एक लालटेन पर एक लंबी कविता विष्णु खरे की है। एक दूसरी ‘पहाड़ पर लालटेन’ मंगलेश डबराल की। लेकिन इन्होंने जैसे लालटेन को देखा वैसा हम लोगों में से कितनों ने देखा है! अब तो लालटेन भी कितने देखते हैं! किसे याद है कि एक जमाने में हम अंग्रेजी के शब्द को पालतू बनाने के लिये उसके साथ क्या कर सकते थे। ‘लैटर्न’ को हमने लालटेन में बदल दिया। किसको अब लैटर्न-लालटेन याद! रेणु की कहानियों में दिखे, या कहीं फिर और.. 

एक और बात यह लगी कि सुमन जी की कविताओं में पौराणिक चरित्र बहुत सारे आये हैं और मेरी यह धारणा है कि चरित्रों से अपने आप कविता पैदा होती है। आप कुछ न कहें। कविता अपने आप आ जायेगी, ये सब चरित्र भी तो कविताजन्य चरित्र हैं। कविता ने इन्हें इतनी सघनता एवं जटिलता से रचा कि जो सचमुच ऐतिहासिक चरित्र रहे होंगे, उनसे ज्यादा सच हो गये! जैसे इन्होंने मीर का चरित्र लिया, अयोध्या पर अपनी बात कही। अयोध्या पर आम तौर पर जो कविता लिखते हैं, बहुत बने बनाये ढ़ंग से, जैसे हमारे मित्र कुंवरनाराण ने अयोध्या पर एक खराब सी कविता लिख दी है, ‘अब के जंगल वे जंगल नहीं रहे..’ ऐसे ही। अरुण की अयोध्या कविता में जो बेगम अख्तर आती है..आखिर वो कौन अयोध्या है जो बनी थी और वह कैसे खंडित हुई! यह ज्यादा  मार्मिक बात है। इनकी, जैसे मीर वाली कविता है, मुझे लग रहा है कि अब कविता में नास्टेल्जिया वापस आ रहा है, यह अच्छी बात है। अब समय में इतनी व्यस्तता की हम तुम्हे ऐसा बना देंगे कि तुम दुख देखने की भी फुरसत न रखोगे, भूल जाओ कि क्या है! कविता का एक काम जब सब लोग बहुत सुखी दिखाई दे रहे हों, सफल दिखाई दे रहे हों, तब वह दूसरी ओर ध्यान दिलाये! कई बार विफलता अधिक सार्थक होती है, सफलता की तुलना में। कई बार मैने कहा है कि हिन्दी के दो बड़े कवि बहुत विफल कवि रहे हैं, मुक्तिबोध और शमशेर। वह अज्ञेय की तरह सफल कवि नहीं हैं। उनमें संप्रेषण की बहुत कठिनाइयां हैं! इसी वजह से उनकी सार्थकता है। बहरहाल..! 

मुझे यह लगा कि सुमन जी की कविता में कभी कभी ज्यादा विश्लेषणपरकता आ जाती है। अरुण जी की कविता में यह कम है। कविता स्वयं में विश्लेषण हो, कविता का काम संश्लेषण है न कि विश्लेषण। बहुत ऐसे ऊबड़-खाबड़ तत्वों को आपस में मिला देना और उनसे एक नया रचाव पैदा करना। यह अप्रत्याशित भी हो सकता है। अक्सर अप्रत्याशित होता है। ..” 

.. जारी। (अगले अंक में अशोक वाजपेयी की कविताएँ एवं उनके बिचार)

14 टिप्‍पणियां:

  1. bahut acchi report Amrendra. Bahut mehnat se likha hai aur bahut shandar hai. Bahut bahut badhai. Baqi do rapat ka intezar hai.

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  2. अगले अंक की प्रतीक्षा रहेगी!
    सादर!

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. रोचक रिपोर्ट है। कुछ कुछ उपस्थिति को जीवंत करती-सी सहज !

    अरुण जी व सुमन जी की रचनाओं का चयन भी अच्छा है। इस बहाने कविताओं से गुजरना फिर अच्छा लगा।

    कविता पर अशोक वाजपेयी को सुनना बहुत सुखद होता है। उनकी काव्यदृष्टि बड़ी साफ है और काव्यकर्म के प्रति अगाध पवित्रता का भाव जैसी।

    धन्यवाद !

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  5. अमरेन्द्रजी
    बहुत अच्छी रपट लिखी है आपने. बहुत कम लोग हैं जिनमें रपट लिखने की तटस्थता और गाम्भीर्य दोनों होते हैं. आप उत्तम श्रेणी की रपट लिखते हैं. अरुण देव की लालटेन कविता पहले भी सुन रखी थी. उनकी पत्नी कविता काफी दिलचस्प लगी. लेकिन अशोकजी की टिप्पणियों से कुछ और ज्यादा उम्मीद कर रहा था.
    श्याम आनंद झा

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  6. कविता का एक काम जब सब लोग बहुत सुखी दिखाई दे रहे हों, सफल दिखाई दे रहे हों, तब वह दूसरी ओर ध्यान दिलाये! कई बार विफलता अधिक सार्थक होती है, सफलता की तुलना में।
    ये बड़ी सुन्दर बात निकली इस प्रस्तुति से।

    बड़ी सुन्दर रिपोर्टिंग है। सुमन केशरी जी और अरुण देव जी की कवितायें पढ़कर अच्छा लगा।

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  7. इस तरह के आयोजन अच्छे हैं और उनमें हो रहा विमर्श भी !
    आपकी रपट ज़ोरदार है !

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  8. कविता का काम संश्लेषण है न कि विश्लेषण।

    इस कथन को तो सहेज लिया है अपने पास...

    सरस सुरुचिपूर्ण रिपोर्टिंग की है आपने..लगा जैसे सब कुछ सामने हो..

    दोनों की ही कवितायें प्रभावशाली लगीं..

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  9. बहुत उम्दा अमरेन्द्र ..वाह मज़ा आ गया !! अच्छा काम कर रहे हो !!

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  10. aksharshah byaura de diya.. aapki smriti kee daad deti hoon.. kash mere paas bhi aisi smriti hoti.. bahut vistaar se likha hai.. shukriya..

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  11. मैं भी वहाँ उपस्थित था !अच्छी व सार्थक रिपोर्ट!

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  12. अद्भुत....
    लेख, रचनाएँ और रचनाकार भी.....!!

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