बुधवार, 14 मार्च 2012

चचा ग़ालिब (२) : मैं दिल हूँ, फ़रेबे-वफ़ा-ख़ुर्दगाँ का

नकारात्मक/बदतर/अशिव/तुच्छ के प्रति दाय रखना बड़ा काम है, नामुमकिन सा! धर्मवीर भारती के 'अंधायुग' में कुछ ऐसा ही सवाल था कृष्ण से, 'आस्था तुम लेते हो, लेगा अनास्था कौन'! सिर्फ अच्छे-अच्छे तक ही अपनी पहुँच रखकर दायरा कभी बृहत्तर नहीं रखा जा सकता. ईश्वर की विराटता शिव के साथ अशिव के समावेश से पुराती है. अमृत और विष दोनों को उसने उसी निष्ठा से रचा है. मालिक मोहम्मद जायसी ने उसी ईश्वर के लिए कहा - '' कीन्हेसि अमृत , जियै जो पाए । कीन्हेसि बिक्ख, मीचु जेहि खाए ॥'' 

रचनाकार बिना इस विराट को साधे बड़ा रचनाकार नहीं हो सकता. अगर `कविरेव प्रजापतिः' है वह तब. उन धर्मग्रंथों में साहित्य भरा पडा है जहां नकारात्मक पात्रों के भी निसर्ग-सिद्ध विराट की उपेक्षा नहीं है. रावण और सुयोधन तक भी उस विराटता का छोर जाता है. ईश्वर से यह महाकाव्यात्मकता विराट मानव सीखता है. 

जयशंकर प्रसाद ने साहित्यकार के सन्दर्भ में उसे 'लघुता की   ओर  साहित्यिक दृष्टिपात' करने की बात कही है. साहित्यकार के लिए जरूरी है कि यह सहित का भाव, विराट का भाव, अपनी रचना-दृष्टि व सृष्टि में बनाए रखे. इस दृष्टि से चचा ग़ालिब की पंक्तियाँ गौर-तलब हैं: 

लबे-ख़ुश्क दर-तिश्नगी मुर्दगाँ का,
ज़ियारत-कदः हूँ, दिल आज़ुर्दगाँ का. 

मतलब, उग्र जी के शब्दों में, 'प्रेम-पिपासा में प्राण देने वाले का मैं पिपासाकुल ओष्ठ हूँ; उपासना-मंदिर हूँ मैं भाग्य-विरहित ह्रदय का.'

हमः ना-उमीदी, हमः बद-गुमानी,
मैं दिल हूँ, फ़रेबे-वफ़ा-ख़ुर्दगाँ का.

मतलब, उग्र जी के शब्दों में, 'महा-निराश, सर-से-पाँव तक संदिग्ध, मुहब्बत में छले गए, मानव का मैं महा-मोह-मण्डित-मन हूँ.' 

4 टिप्‍पणियां:

  1. बड़े गंभीर विषय पर आपने ध्यान खींचा है अमरेन्द्र जी ! आभार आपका ! वास्तव में सही- अशिव , आस्था-अनास्था दोनों ही एक व्यक्ति में समाहित होती है ! परिस्थिति के अनुसार कभी एक पक्ष उभार पर आ जाता है और कभी दूसरा ! अशिव से शिव और अनास्था से आस्था फिर इसी के उलटे क्रम में ..ये धारा प्रवाह हर मूर्त और सजग प्राणी में चलता ही रहता है.....मृत्यु तक !

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  2. नया विषय अच्छा लगा ...आशा है आगे और देते रहोगे !

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  3. आपके इस पोस्ट की चर्चा यहाँ भी...

    http://tetalaa.nukkadh.com/2012/03/blog-post_16.html

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  4. RESPECTED CHCHA GHALIB NE JO DEKHA ,JO MAHASOOS KIYA USKI BEMISAAL REPORTING KI HAI // SIR IT IS A GREAT PIECE OF SELECTION AS AN QUOTE/EXAMPLE // THANKS//
    MAVARK//

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