रविवार, 12 फ़रवरी 2012

आकाशवाणी विनाशवाणी की राह पर..!

यह नारा सत्य साबित हो तो बेहतर..!
निश्चय ही आकाशवाणी से समय-समाज-व्यक्ति-दिनचर्या में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। बहुत कुछ आज भी हम स्वाद की तरह याद करते हैं तो वह आकाशवाणी की ही कृपा से। गाँव गिराँव में आकशवाणी की तरफ से प्रस्तुत किये जाने वाले लोकभाषा के कार्यक्रम खासे आकर्षण का केंद्र होते थे। जिसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि इसमें हमें समझने के लिये कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता। जातीय भाषा होने के कारण उससे जुड़ जाने की नैसर्गिकता हममें होती है, यह वह भाषा है जिसे हम सीखते नहीं बल्कि यह तो खुद-ब-खुद आक्सीजन व जल की तरह जन्म के साथ ही ‘मिली’ होती है। 

इधर कुछ समय पहले मैने लखनऊ आकाशवाणी से ताल्लुक कुछ लोगों से बात की तो जानकारी मिली कि लोकभाषा अवधी की अधिकांश रेडियो रिकार्डिंग्स बर्बाद हो गयी हैं, किन्हीं अर्थों में बर्बाद कर दी गयी हैं। अवधी गद्य की धरोहर के रूप में अप्रतिम भूमिका रखने वाली रमई काका की एकांकियाँ(रेडियो नाटिकाएँ) भसम हो चुकी हैं। कहीं कुछ इधर-उधर से खुरचन निकल आये, तो वह बात अलग है। यह स्थिति है उस रचनाकार की विरासत के संग्रहण की है, जिसके लिये कहा जाता है कि रमई काका को सुनने के लिये लोग रेडियो खरीदते थे। इसी तरह और भी कई लोकभाषा के सांगीतिक कार्यक्रमों के रिकार्ड्स के चौपट होने की पुख्तगी निराश करती है। लोकभाषाओं को इसी क्षेत्र के लोगों ने नुकसान पहुँचाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। 

किसी भी सांस्कृतिक रूप का गतीगम्म न रखना हमारी गुणसूत्रीय समस्या हो गयी है। हम खा के अचै लिये, अब नदी चौपट हो या ताल सूखे, हमरे ठेंगे से! यही मिटाऊ-मानसिकता अन्य क्षेत्रों में भी दिखती है। कई महत्वपूर्ण किताबें अलभ्य हो चली हैं। कई पाण्डुलिपियाँ दम तोड़ चुकी हैं। हमने अंग्रेजों से ‘अंग्रेज’ बनने की सीख ली, लेकिन उनकी यत्किंच सकारात्मकता को नहीं सीखा। संरक्षण को लेकर अंग्रेजों की जागरुकता सराहनीय और अनुकरणीय है। आप इंटर्नेट पर अंग्रेजों के समय में हुये लैंग्वेज-सर्वे के भाषा नमूनों की रिकार्डिग्स बा-तरतीब सुन सकते हैं। यह उनका ‘अपना’ देश नहीं था तब भी। इधर हम हैं कि हर चीज को पूरे अपनेपन के साथ बर्बाद करते हैं। 

आकाशवाणी ने लोकभाषाओं के साथ सर्वाधिक गैर-जिम्मेदाराना रुख अख्तियार किया है। हिन्दी-उर्दू के गीतों-कार्यक्रमों की  व्याप्ति  के अनुसार सुरक्षित रह जाने की संभाव्यता अधिक रही है, पर लोकभाषाओं के इन गीतों-कार्यक्रमों के लिये तो अंधे की लकड़ी आकाशवाणी ही थी। इसके लिये तो इसे और भी गंभीर होना चाहिये था। जाने कितनी लोकभाषायी समृद्धि दिनों-दिन छीज रही है। ऐसी संगीत-समृद्धि उर्दू-हिन्दी में कहाँ थी/है, जहाँ जीवन के हर काण्डों पर संगीत की योजना हो, श्रम की भंगिमा पर संगीत हो! हिन्दी पट्टी में लोकभाषाओं के महत्व को न समझने की और इसे सम्मान न देने की मानसिकता भी रही है, जो एक हद तक बुद्धिजीवी वर्ग के दोहरे चरित्र का नतीजा थी, इससे भी लोकभाषाओं की सामग्रियों के प्रति अगम्भीरता को बल मिला। 

अधिकाधिक लोगों तक सामग्रियों को पहुँचा देना कई दृष्टियों से लाभकारी होता है। इससे, सामग्री गतिशील-जीवित रूप में रहती है, सर्वाधिक संरक्षित रूप में रहती है, पब्लिक-डोमेन में उसकी मौजूदगी रहती है(जो किसी भी कला का हेतु होना चाहिये)। अब तकनीकी उन्नत हो चली है इसलिये जितना भी बचा खुचा है उसे चाहिये कि सार्वजनिक उपयोग माध्यमों में मुहैय्या करा दिया जाय। लखनऊ आकाशवाणी(अन्य भी) को इस दिशा में सक्रिय होना चाहिये। इससे पहले की रंच-रंच भर खत्म हो जाय, सामग्रियाँ लोकमानस के लिये मुक्तहस्त हो कर प्रस्तुत कर देनी चाहिये। जब पब्लिक अंग्रेजी गानों पर झूमने की आदी हो जायेगी तब क्या आकाशवाणी अचार डालेगी इन सामग्रियों का! बड़े स्तर पर पहल होने की आवश्यक्ता है, लोग जुटें तो आंदोलन-धर्मी रूप में यह काम किया जाना चाहिये। नहीं तो आकाशवाणी विनाशवाणी की राह पर बढ़ती जा रही है। 

हमारे समाज की एक दूसरी समस्या है कि जो व्यक्ति कुछेक सामग्री व्यक्तिगत तौर पर रखा है तो वह उसे वैसे ही एकमात्र मालिक बन के रखना चाहता है जैसे बिच्छू झारने का मंतर कोई दूसरे को नहीं बताना चाहता। इस चक्कर में आदर्शवादी(?) भारतीय समाज में जाने कितना बंटाधार हुआ है और आगे भी होता ही रहेगा! ये कुछ बातें थीं जिन्हें बक गया यह जानते हुये कि एक ब्लागर की पहुँच अपनी उँगलियों को खिट्‌-खिट्‌ करने से अधिक की क्या है भला! तथापि! गिरिजेश जी इस समय भोजपुरी लोकभाषा के कुछ मोतियों को सहेजने और लोकमानस में लाने के उद्यम में संलग्न हैं। उनकी पोस्ट पढ़ते हुये उनका यह वाक्य पढ़ा, ‘‘आकाशवाणी केन्द्रों में जाने कितने ही लोकगायकों के लोकगीत तालों में बन्द हैं। कितने ही एल पी रिकॉर्ड नष्ट हो गये/हो रहे हैं। आवश्यकता है कि उन्हें लोकहित में आम कर दिया जाय। कोई सरकारी बाबू सुन रहा है?” – और फिर इतनी बात कहने में आ गयी! यह सूरत बदले! आमीन! 

3 टिप्‍पणियां:

  1. हम अपने ज़माने को याद करते हैं.हमें बहुत कुछ सिखाया,मनोविनोद भी कराया पर अब आकाशवाणी की यह गत कैसे बन गई ,यह आज के तंत्र की चिंता नहीं है !

    अब भी कुछ बचा है तो उसे बचाया जाय !

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  2. अब वही काम एफ एम को करना चाहिए जो कभी आकाशवाणी करती थी।

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