बुधवार, 11 जनवरी 2012

“द डर्टी पिक्‍चर” और व्यावसायिक छल

“I am playing Silk in the Dirty Picture and Silk is a dancing star in the 80s, since the film is based in the 80s and she is someone who wears her heart, her mind, her sexuality, everything on her sleeve. She is a lot of fun, she is very brazen and I think her brazenness, her attitude was the large part of the reason that she went on to become a huge star, and here, may I add before anyone asks me, that this is not based on the life of Silk Smitha, the heroine of the The Dirty Picture is a dancing star of the 80s and we all know that Silk Smitha was a huge dancing star of the 80s.” ~ Vidya Balan

एबी सी… हर ग्रेड की फिल्में होती ही हैं। सबके वजूद के अपने तर्क हैं। हम बहुत सुरुचिपूर्ण होकर एक की तारीफ कर सकते हैं, पर किसी दूसरे को पूरी तरह खारिज नहीं। फिल्म-समीक्षाओं की अपनी सीमाएं भी हैं, फिर भी कई दोष ऐसे होते हैं, जिन पर समीक्षाएं परदा डाल देती हैं। समीक्षाओं की एक अति का छोर वह मीनमेख-निकालू प्रवृत्ति है, जिस पर झुंझला कर किसी जर्मन फिल्मकार ने कहा था कि मैं फिल्में निरक्षरों के लिए बनाता हूं। वहीं दूसरी अति है सच्चाई का न बोलना। जैसे कोई सी ग्रेड की फिल्म हो, तो हम उसे भी ए ग्रेड की फिल्म कह के समीक्षित कर दें। उसके फेवर में मारे गर्दा उड़ा के रख दें। ऐसा करने के मूल में व्यावसायिक संस्कार होते हैं, और छूट लेकर कहूं तो व्यावसायिक छल। क्योंकि व्यावसायिक संस्कार को हम कुछ सकारात्मक कह सकते हैं लेकिन इस व्यावसायिक छल को नहीं। इसमें यह कोशिश होती है कि हर ग्रेड का देखैया उस फिल्म की ओर लुभा जाए। ऐसी ही कई समीक्षाओं को देखकर मैं हाल ही में आयी पिक्चर ‘द डर्टी पिक्चर’ देखने गया, और छले जाने का एहसास हुआ। समीक्षाओं के साथ स्टार की नत्थी भी क्या खूब होती है! अक्सर फिल्म देखने के बाद ये तारे अपनी चमक और विश्वसनीयता फीकी कर हैं।

पहली दिक्कत मुझे यही दिखती है कि इस फिल्म को सही-सही क्यों नहीं कहते कि यह सिल्क स्मिता के जीवन पर सिनेमा है। फिल्म-निर्माण से लेकर फिल्म-समीक्षा तक ईमानदारी का इतना अभाव क्यों है! या तो आप सिल्क स्मिता का किसी भी रूप में जिक्र न करें और अगर करें तो ठीक से करें। आशय यह कि जीवनाधारित सिनेमा की जिम्मेदारियों का निर्वाह करें नहीं तो ‘है भी और नहीं भी है’ वाला गेम न खेला जाय! वस्तुतः इसमें एक शातिरपना दिखता है, वह यह कि ‘है भी’ का पूरा लाभ ले लिया जाए और जब दिक्कत या जवाबदेही बने तो ‘नहीं है’ की छूट से काम चला लिया जाए। एक तरफ प्रगतिशीलता-संवेदनशीलता-गंभीरता की समाई दिखायी जाए और दूसरी तरफ हल्केपन-वायवीपन के तुक को भी साध लिया जाए। एक तरफ ए ग्रेड के दर्शकों को लुभा लिया जाए तो दूसरी तरफ अन्य ग्रेड के दर्शकों को भी ललचुआ लिया जाए। 80 का दशकीय दौर भी चुना जाता है, दक्षिण भारत का परिदृश्य रचा जाता है, फिल्म में ‘सिल्क’ नाम भी उसी छवि को दिखाने के लिए रखा जाता है; तब भी कहते हैं कि हम कुछ अलग रच रहे हैं। हुई समीक्षाओं का भी श्री-गणेश इसी के साथ होता है! फिर इस लुकाछिपी या खिचड़ी का क्या औचित्य! अगर सिल्क स्मिता जीवित होतीं और यह देखतीं तो क्या वैसे ही बात रखतीं जैसी ये समीक्षाएं! क्या वे जटिलता और समग्रता को लाने की मांग न करतीं! क्या वे न कहतीं कि त्रासदी के साथ इन चटपटे-द्विअर्थी संवादों की भूमिका कैसी! क्या यह फिल्म ‘सिल्क’ की मृत्यु के साथ न्याय कर सकी है! वैसे इन सब सवालों से बचने का एक खूबसूरत उत्तर तो है ही कि ‘यह फिल्म सिल्क स्मिता पर नहीं है’!

जहां-तहां इस फिल्म के संवादों पर लोग कहते दिखे कि संवाद अच्छे-अच्छे हैं। पूरी फिल्म में मुझे हंसाऊ संवाद मिले, हृदयस्पर्शी नहीं! ऐसे संवाद नहीं मिले जिनकी कोर कहीं संवेदन-तंत्र को कुरेदे रहे और उसके चित्त में आते ही त्रासदी विचारोद्यत करे जैसे किसी चोट के चिन्ह पर उंगली जाने पर किसी घटना की मार्मिकता हमें अपने साथ ले लेती हो। थियेटर में इन संवादों पर मैने सीटियों और हुल्लड़ के साथ समीप वालों को पाया। मैने पाया कि कहानी की प्रकृति अलग है और संवाद अलग ही परिवेश रच जा रहे हैं, अलग असर डाल रहे हैं। संवाद त्रासदी-सुलभ करुणा नहीं पैदा कर सके हैं! फिल्म की नजर में और फिल्म में कथित ‘इंटरटेनमेंटx3’ शायद यही हो, पर मुझे रास नहीं आया। कहानी की टूटन और गानों का अहैतुकी समावेशन दर्शक-चित्त को अपने साथ जोड़ पाने में असफल दिखा! ये कमियां हर ग्रेड के दर्शक-वर्ग को साधने की कोशिश का नतीजा हो सकती हैं। फिल्म-समीक्षाकार अजय ब्रह्मात्मज जी की एक बात का जिक्र करना चाहूंगा कि यह फिल्म ‘आम दर्शकों और खास दर्शकों को अलग-अलग कारणों से एंटरटेन कर सकती है!’

लीड रोल के तौर पर विद्या बालन के अभिनय की भूरि भूरि प्रशंसा हुई, जिन्होंने सिल्क का रोल किया है। लेकिन मैं इसे अभिभूत कर देने वाला अभिनय नहीं कह पा रहा। फिल्म की कमियों को कहीं कहीं भरता सा लग सकता है विद्या बालन का अभिनय, लेकिन फिल्म की वैतरणी इससे नहीं तरती। ‘रॉकस्टार’ फिल्म का संदर्भ लेकर कहूं तो उस फिल्‍म में कुछ खास न होने पर भी रणवीर कपूर ने स्वयं जैसे फिल्म की नौका को खे दिया हो, ऐसा इस फिल्म के बारे में नहीं कहा जा सकता।

अपनी बात को खत्म करते हुए कहूंगा कि यह फिल्म एक असफल फिल्म है, उन दावों के साथ तो बिल्कुल ही असफल जो समीक्षाओं में दागे गये। बेहतर होता अलग आधार पर इसे मसाला फिल्म ही बना देते, तो दोनों तरफ से ईमानदारी होती! बिचऊपुर में दुनहूं गवां गये!

पूर्वप्रकाशित: मोहल्ला-लाइव  
~सादर/अमरेन्द्र अवधिया

5 टिप्‍पणियां:

  1. सबसे अचछी समीक्षा, इस फ़िल्म पर, जो मैंने अब तक पढ़ी है।

    रॉकस्टार से तुलना भी अच्छा लगा, मुझे।
    क्योंकि मैंने भी पहले इस फ़िल्म को देखी और दूसरे दिन रॉकस्टार ...! जहां रॉकस्टार ने कई जगहों पर दिल को छुआ, कई जगह आंखें भर आईं और रोल में रणबीर लाजवाब नज़र आए और वह गाना और फ़िल्म का अंत सब भाया।

    वहीं इस फ़िल्म में विद्या फूहड़, फूहड़ और फूहड़ ही लगीं। इस विषय को कलात्मक ढ़ंग से भी पेश किया जा सकता है। मैंने सिल्क स्मिता कि न सिर्फ़ हिंदी बल्कि कई तेलुगु फ़िल्में देखीं हैं, इतनी फूहड़ता से वे कभी ऊ ला ला नहीं करतीं थी। उसमें एक क्लास था, एक आर्ट भी। यहां तो लगा कि सब पैसा बनाने के लिए किया जा रहा हो।

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  2. यह फिल्म पूरी तरह से बाज़ार के लिए ही बनाई गयी है...सिल्क स्मिता के नाम से प्रबुद्ध दर्शक भी खिंचे जरूर चले आए पर उन्हें नाउम्मीदी ही हुई .

    फिल्म निर्माता-निर्देशक के लिए यह बिलकुल ही असफल फिल्म नहीं है....उन्हें पैसे बनाने थे और उनका मकसद पूरा हुआ.

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  3. मेरे मन में भी कुछ ऐसे ही विचार आये थे.आपने लिख दिया अच्छा किया.सच पूछिए तो एक सी ग्रेड की चिकनी जवानी टाइप की फिल्म से यह किसी रूप में बेहतर नहीं है.और जिन संवादों के कसीदे पढ़े गए.मुझे तो निहायत ही घटिया द्विअर्थी संवाद लगे.

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  4. एक साधारण सी फ़िल्म है जिसे शायद दोबारा देखना न चाहे कोई। समीक्षा अच्छी है।

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  5. रील वाली तो बखान दी ,रियल वाली पे कुछ नहीं कहा आज :)

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