मंगलवार, 3 जनवरी 2012

इस शाने-अवध ‘लखनऊ’ में कितनी अवधी?

विविधता, कर्म-सौंदर्य, आत्मसमीक्षा-भाव, संवादात्मक-औदार्य किसी सु-संस्कृति की विशेषता होती है। जब कोई स्वयं को सु-संस्कृत होने का दावा करे या उसके बारे में ऐसी कोई आम राय बनी हो, तो जरूरी होता है कि इन आधारों पर उसकी वास्तविकता की पड़ताल की जाए। अवध/अवधी संस्कृति के संदर्भ में लखनऊ अपने आपको एक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रस्तुत करता है। वहां के लोगों को एक खास किस्म की रूढ़ि संस्कृति दिखती है, जिसका वहां के लोग गौरवगान भी करते हैं। तब जरूरी होता है कि लखनऊ की सांस्कृतिक समीक्षा की जाए। ऐसे ही लखनऊ के कुछ मित्रों से फेसबुकिया बातचीत के दौरान इस संदर्भ में कुछ बातें रखता रहा हूं, उनकी सहज आक्रोशित प्रतिक्रियाओं को स्वीकार भी करता रहा हूं। इन्हीं बातों को, प्रश्नों को इस आलेख में रख रहा हूं! 

जिस तरह व्यक्तियों के मध्य प्रभु व्यक्ति की प्रवृत्तियों का संचरण होता जाता है, उसी तरह भूभाग विशेष में किसी प्रभु स्थल का प्रभाव भी फैलने लगता है। इसके प्रति प्रश्नवाचकता कम अनुकरण अधिक किया जाता है। लखनऊ की जिस ‘संस्कृति’ की बात की जाती है, उसमें आज भी मूलतः नवाबी दौर की अकर्मकता, शेष अवध से असंवाद, नाजुकी-तमीज-तहजीब आदि के आत्ममुग्धी मुहावरों के चलते आत्‍मसमीक्षा भाव का अभाव और तमाम स्वरों को अनदेखा करने से वैविध्य-समृद्धि की अनुपस्थिति स्पष्ट तौर पर दिखती है। यहां की पृष्ठभूमि पर कथाकार प्रेमचंद की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ को सत्ता-केंद्र पर रखकर देखिए, आज भी वह मनोविन्यास दिखेगा। यहां कल्चर को लेकर एक खास किस्म का विभाजन है, जिसकी तरफ ध्यान दिलाने पर वहीं के मित्रों ने कहा – यह ‘कल्चर’ और ‘एग्रीकल्चर’ का डिफरेंस है, और दोनों में फर्क होना चाहिए। मैं ऐसा विभाजन बेमानी समझता हूं, जिसमें पोएटिक कल्चर की बात हो व एग्रीकल्चरल रिप्रजेंटेशन को छांट दिया जाए। मसलन, एग्रीकल्चर के कवि घाघ को छांटकर कोई शामे-अवध की लखनवी सूरत रचे, तो यकीनन उसमें मगरूरिये-अमीरशाही दिख सकती है, लेकिन अवध की अविस्मरणीय किसानी-संस्कृति नहीं दिखेगी। मुझे समस्या इसी से है कि लखनऊ अवध की जिस कल्चरल-पैकेजिंग का नाम होता रहा है, उसमें अवधी संस्कृति का नितांत अभाव है। यहां वह अवधी संस्कृति क्यों नहीं दिखती, जिसमें जनभाषा का कर्म-सौंदर्य हो? लखनऊ में कितनी है अवधी? उसके बाद भी शामे-अवध लखनऊ? एक खास तरीके का बासी एस्थेटिक्स कल्चर का मुलम्मा चढ़ा-चढ़ा के जीता है लखनऊ में! वैविध्य कहां? गति कहां? दृष्टि कहां? प्रतिरोध कहां? प्रतिकार कहां? लोक कहां? जन कहां? जनभाषा कहां? – क्या यह परंपराएं नहीं होनी चाहिए लखनऊ में? 

एक दृष्टि डालिए, दो शहरों की चाल के तुलनात्मक अध्ययन पर! एक लखनऊ व दूसरा बनारस! एक कल्चर यह और एक कल्चर वह भी। यहां आपको अधिक संसाधन में कम आउट-पुट दिखेगा (राजनीतिक अवसरों पर दीठ डालने पर), वहीं बनारस पुरानी लीक पर चलने के बाद भी एक सांस्कृतिक दायित्व को निभाता हुआ मिलेगा। बनारस पूर्वांचल की जातीयता का वाहक दिखेगा, लेकिन लखनऊ अवधी जातीयता का वाहक नहीं। भाषा संस्कृति-रूप है, इसके हवाले से कहूं तो बनारस में आपको भोजपुरी-भाषी परिवार मिलेंगे, घर के भीतर व बाहर सब बोलते हैं भोजपुरी, लेकिन लखनऊ में इस तरह अवधी को गौरवबोध के साथ बोलते हुए परिवार नहीं मिलेंगे। लखनऊ ने हिंदी-उर्दू के सामने ऐसे घुटना टेका, जैसे इसकी अपनी कोई जातीय भाषा ही न हो। फलतः जातीय निर्माण की प्रक्रिया में लखनऊ ने – अवधी कल्चर का मिथ्या दावा करने के बावजूद – नकारात्मक भूमिका निभायी। मैथिली जातीयता मिलेगी आपको, भोजपुरी जातीयता मिलेगी आपको, लेकिन अवधी जातीयता पर कुठाराघात लखनऊ ने ही कर दिया। (इसे आकाशवाणी लखनऊ में विगत 6-7 दशकों के अवधी कार्यक्रम के गिरते हुए ग्राफ से देख सकते हैं) जबकि अवध-अवधी की सचेत जातीयता भाषा से अलग भी विविध सांस्कृतिक रूपों में है, जिसकी पहचान खुद को इलाके का कल्चरल-हब कहलाने वाले लखनऊ ने नहीं की, तो इसके मूल में वहां लोगों को जाना चाहिए। 

मैं यह नहीं कह रहा कि लखनऊ ‘नरक’ है बल्कि यह कह रहा हूं कि जिस नफासती-तहजीबी ‘स्वर्ग’ का दावा किया जाता है और पूरे अवध की कल्चरल पैकेजिंग कर दी जाती है, उसका हकदार लखनऊ कतई नहीं है। इसी बात को कहते हुए जिन कवियों ने कुछ कहा, उनकी बात को बड़े हल्के में लिया गया। खुद पर सोचने का प्रयास नहीं किया गया। देशभाषा की कविताओं में निहित व्यंग्येतर (व्यंग्य होने पर भी) सांस्कृतिक समीक्षा को नहीं देखा गया। इतनी व्यंग्य रचनाएं क्या यूं ही आ गयीं! बकौल मुक्तिबोध कवि/लेखक का काम सांस्कृतिक समीक्षा का है। अवधी कवि रमई काका जी ने अपनी कविताओं में प्रसंग-प्रसंग पर अपनी बात कही है, लखनऊ में सांस्कृतिक दाय की उपेक्षा का भाव देखकर! व्यंग्य काका की शैली है, पर उनका कार्य सांस्कृतिक समीक्षा का ही है। उन्होंने देखा था कि ओस को नाजुक बरसात कह लोग छाता लगाते थे। इसी को लक्ष्य करते हुए उनकी अवधी गजल की दो पंक्तियां है… 

नाजुक सहर मा नाजुक हर बात ह्वै रही है!
अब लखनऊ मा नाजुक बरसात ह्वै रही है! 
(अर्थ के लिए : अवधी में संबंधसूचक ‘मा’ का प्रयोग होता है, जो खड़ीबोली-हिंदी में ‘में’ है।) 

इसके अतिरिक्त एक कविता में काका जी ने तो विस्तार में लखनौव्वा कल्चर को तार-तार करके दिखाया है। कल्चर के विशिष्ट तौर-तरीके में ढले नगर और नागरिकों पर उनकी यह कविता गौरतलब है… 

ई आहीं पक्का लखनौव्वा
कहैं चीज के दूने दाम,
बात बात मा करैं सलाम,
चीकट तकिया चटख लिहाफ,
घर मा गंदे बाहर साफ,
बड़ा तकल्लुफ कैके खांय,
याक कौरु का सत्तर दांय,
नाजुक देहीं सिर पर पल्ला,
आंखिन सुरमा अंगुरिन छल्ला,
ख्यालैं नित बैठकुवा खेल,
आप आप मा छोड़ैं रेल,
तितुर लड़ावैं कबौ बटेर,
कबौं कबुतरन के हैं फेर,
तिउ-तिउहार उड़ै कनकौव्वा,
जानि लिह्यो पक्का लखनौव्वा! 
(अर्थ के लिए : पल्ला – टोपी / बैठकुवा खेल – कमरे के भीतर खेलने वाले खेल जैसे तास-शतरंज आदि जिसका यहां व्यंजक संकेत समय के काटने और कर्म-हीनता से है। / कनकौव्वा – पतंग) 

परंतु ऐसी आलोचनाओं को समीक्षा के लिए जरूरी समझा ही नहीं गया। यह माना गया कि यह सब बातें ग्राम्य-दोष की पैदावार हैं। यह आज तक नहीं समझ में आया कि मुख्यधारा के खास ट्रेंड की रचनाओं को ही ‘रचना’ क्यों माना जाता है जब उससे कम प्रभावकारी बातें ग्राम्य-गिरा में होने पर उनको मूल्यांकन के योग्य क्यों नहीं समझा जाता! लखनऊ के ऐसे ही माहौल पर लखनऊ से 25-30 किमी के फासले पर बाराबंकी के अवधी कवि मृगेश ने लिखा… 

जौ अइसन टेक निराली तौ बिसहौ प्याला-प्याली,
लखनऊ सहर मा रहिके दुइ चार लिखौ कौव्वाली,
समझ्यो मूरखचंद बुढ़ौनू जुग बदला!
तुम करौ कबितई बंद बुढ़ौनू जुग बदला! 

इसके बावजूद कभी भी इन आलोचनाओं पर विचार नहीं हुआ, जबकि साहित्य-संस्कृति का ठेका लिये वहीं अपनी गढ़ी हुई परिभाषाओं में मस्त रहा। इस मस्ती का गौरवगान हुआ। जिस इलाके में प्रेमचंद के ‘गोदान’ की सामाजिक संरचना आज भी मौजूद हो, वहां ‘होरी’ की जुबान आज भी अपनी पहचान और सवालों उपेक्षा में ही है। उल्टे दिखाया ऐसे जाता है कि सब चुस्त-दुरुस्त-चकाचक है! ऊपर जिन कवियों का जिक्र किया है, ये लोग कमोबेश उसी दौर में लिख रहे थे, जब बंबैया सिनेमा आदर्श और कल्पना की लुभाऊ छौंक लगाकर लखनऊ का इस रूप में गौरवगान कर रहा था… 

ये लखनऊ की सरजमीं
ये रंग रूप का चमन
ये हुस्न-ओ-इश्क का वतन
ये तो वही मकाम है
जहां अवध की शाम है
जवां-जवां हसीं-हसीं
ये लखनऊ की सरजमीं! 

अब सवाल है कि क्या रमई काका आदि जनभाषा के कवियों का दिमाग खराब था, जो लखनऊ की शान में गुस्ताखी कर रहे थे? नहीं भाई, नहीं! लखनऊ की इस परिणति पर औरों ने भी लिखा है। जनभाषाएं सहज होती हैं, सीधा-सपाट कहती हैं। अब मैं इस संदर्भ में ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मानित कुंवर नारायण जी की कविता का हवाला दूंगा। याद रहे कि कुंवर जी पैदा हुए फैजाबाद में, रहे अधिकांश जीवन लखनऊ में, अब दिल्ली में हैं। हम उनके संदर्भ में नहीं कह सकते कि वे किसी ग्राम्यगिरा-सुलभ दोष के शिकार हैं या वे लखनऊ को समझ नहीं रहे। उन्हें कल्चर की बखूबी समझ है, किसी हड़बड़ी में नहीं कह रहे हैं! एक सोच है! लखनऊ पर उनकी ‘लखनऊ’ कविता के अंश देखिए… 

किसी नौजवान के जवान तरीकों पर त्यौरियां चढ़ाये
एक टूटी आरामकुर्सी पर
अधलेटे
अधमरे बूढ़े सा खांसता हुआ लखनऊ।
कॉफी-हाउस, हजरतगंज अमीनाबाद और चौक तक
चार तहजीबों में बंटा हुआ लखनऊ। 

… 

किसी मुर्दा शानो-शौकत की कब्र सा,
किसी बेवा के सब्र सा,
जर्जर गुंबदों के ऊपर
अवध की उदास शामों का शामियाना थामे,
किसी तवाइफ की गजल सा
हर आने वाला दिन किसी बीते हुए कल-सा,
कमान-कमर नवाब के झुके हुए
शरीफ आदाब-सा लखनऊ,
खंडहरों में सिमटते हुए किसी बेगम के शबाब-सा लखनऊ,
बारीक मखमल पर कढ़ी हुई बारीकियों की तरह
इस शहर की कमजोर नफासत,
नवाबी जमाने की जनानी अदाओं में
किसी मनचले को रिझाने के लिए
कव्वालियां गाती हुई नजाकत:
किसी मरीज की तरह नयी जिंदगी के लिए तरसता,
सरशार और मजाज का लखनऊ,
किसी शौकीन और हाय किसी बेनियाज का लखनऊ:
यह है किब्ला
हमारा और आपका लखनऊ। 
[कुंवर नारायण, संग्रह ‘अपने सामने’ 1979] 

अंततः यही कहूंगा कि ‘नयी जिंदगी के लिए तरसते लखनऊ’ को समझना अत्यंत जरूरी है। कमियों को क्या ग्लोरीफाई करना! कल्चर के नये ढब तराशने की जरूरत है। 

मैं तकरीबन साल भर रहा हूँ लखनऊ में। अगर अवधी की बात करूँ तो संभव हो अवधी बोलना किसी घर परिवार का सच हो, लेकिन मैने लखनऊ में अवधी की अनुपस्थिति देखी है। दो पड़ोसी जो अवधी जानते हैं, लखनऊ में यह भाषा आपसी बात-चीत में नहीं लाते। यही वजह है कि लखनऊ में – सत्ता शक्ति का सुलभ केंद्र होने के बाद भी – अवधी भाषा के विकास के लिये लोग कभी कतारबद्ध नहीं हुये। अवधी के अध्ययन का कोई पीठ नहीं है। वहाँ के विश्वविद्यालयों में अवधी की यूनिट नहीं है। भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में लाने की माँग बनारस-गोरखपुर से उठ सकती है लेकिन अवधी के आठवीं अनुसूची में लाने की माँग लखनऊ से नहीं उठती। आकाशवाणी ने कब का ही अलविदा कहना शुरू किया, इस तरह कि रमई काका की अवधी गद्य की धरोहरें – सैंकड़ों रेडियो एकांकियाँ – आकाशवाणी में बड़े आराम से बर्बाद कर डाली गयीं। यह सब दिखाता है कि वहाँ कितनी अवधी है और उसको लेकर सम्मान का भाव! इन सब नकारात्मकताओं को लेकर वहाँ के लोग क्या कभी आंदोलित हुये?? यह उनकी अवधी की जागरुकता को दिखाता है। हकीकत बताता है। आज भी वहाँ के लोगों में उस भाषा के प्रति सहज-सम्मान का भाव नहीं है जो थोड़ी दूर किसानो-मजूरों की जीवन-भाषा है, करोड़ों की जीवंत भाषा है। अवधी मुहावरे आदि तो दिल्ली में भी बोले जा रहे हैं, लेकिन इसी से बात नहीं बनती! सवाल उस पूरी भाषा का, उस पूरी भाषिक अस्मिता का, उस पूरी जातीयता का, उस पूरे ग्रामर का है कि वह कहाँ जा रहा है, कितना मिटनशील है!! 

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4 टिप्‍पणियां:

  1. अवध प्रांत की राजधानी से ही अवधी नदारद!

    कारण क्या रहे होंगे यह तो खोज का विषय है। शायद राजधानी लखनऊ के दिल्ली के नजदीक रहने के कारण उसके जैसी भाषा अपनाने का आग्रह रहा हो।

    अवधी कवियों की कविताय़ें बांचकर आनन्दित हुये।

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  2. ali ji ने पोस्ट " इस शाने-अवध ‘लखनऊ’ में कितनी अवधी? " पर एक टिप्पणी छोड़ी thi, jo yah hai, kisi kaaran se nahin aa saki thi :

    सुचिंतित आलेख ! अक्सर शहर / महानगर अपनी कोख से इतर अपरिचितों की तरह अपनी पहचान बनाने का यत्न करते है कि कोई उन्हें कोख सा समय में कहीं ठहर गया ना जान / मान ले !

    महानगरों की यह मनोवृत्ति उसके वाशिंदों की मुड़कर पीछे ना देखने की आदत और पीछे छूट गयी थाथी को हेय मानने के भाव से जुडी हुई है इसे शायद आप कथित आधुनिकता / विकास विरुद्ध परम्परा /पिछडेपन के रूप में देखना चाहेंगे ? जबकि ऐसा वास्तव में है नहीं !

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  3. अपनी भाषा, बोली के प्रति जागरूकता प्यार से आती है लगाव से आती है इस पर विचारो के दबाव का जोर नहीं चल सकता.बहरहाल विचार करने को प्रेरित करने वाला चिंतन.

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  4. लखनऊ और बनारस तो मानक हैं, इनका स्तर कभी न गिरे।

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