गुरुवार, 22 सितंबर 2011

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते” (~श्रीलाल शुक्ल)


हिन्दी के प्रख्यात साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत को ४५-वें ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। सोद्देश्यपूर्ण व्यंग्य लेखन में श्रीलाल शुक्ल अग्रणी साहित्यकार हैं, जिनका उपन्यास ‘राग दरबारी’ किसी भी उपन्यास-प्रेमी के लिए विशिष्ट स्थान रखता है। जीवन के छियासी बसंत देख चुके श्रीलाल शुक्ल जी को इस सम्मान के लिए बधाई, और अनेकानेक शुभकामनाएँ! इस अवसर पर प्रस्तुत है, हुजूर का लिखा एक छोटा सा आलेख ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’। यह इनके लेख संग्रह ‘आओ बैठ लें कुछ देर’ से लिया गया है: 
श्रीलाल शुक्ल
  
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते

मेरे गाँव की बात है। मेरे बचपन में एक भरे-पूरे परिवार की एक दादी माँ थीं। बुढ़ापे में भी वे सुंदर दीखती थीं। वे हम लोगों से बड़े प्यार से बोलती थीं। मेरी माँ उन्हें बहुत नापसंद करती थी। इसके कारण का पता मुझे बड़े होने पर ही चला। दादी माँ अपने जमाने में एक काम के लिए एक्सपर्ट मानी जाती थीं। वह काम था अपने खानदान में अगर कोई कन्या पैदा हो तो उसके जन्मते ही सफाई के साथ उसकी हत्या कर देना। इस शताब्दी की शुरुआत तक बहुत से खानदानों में सद्योजात कन्या की हत्या का चलन था। जैसे आज नवविवाहिताओं को दहेज के लिए जलाने का कारोबार ज्यादातर सवर्णों ही में होता है, उन दिनों कन्याओं की शिशु-हत्या भी प्रायः सवर्णों की ही विशेषता थी।
      खैर, दादी माँ और उनका कबीला तो मिट गया, उनके अपराधों की याद अब भी कभी-कभी आ जाती है। पिछले महीने मैं पं. अमृतलाल नागर की जीवनी लिख रहा था। उस प्रसंग में उनके पूरे साहित्य को फिर से पढ़ा। उनके उपन्यास ‘सतरंज के मोहरे’ में एक जगह इस जघन्य अपराध का चित्रण पढ़कर स्तब्ध रह गया। यह ऐसा यथार्थ था जो यथार्थवाद की सीमा को लाँघ जाता है:

      “कंडौर अवध का एक गाँव है। वहाँ के जमींदार लाल साहब कहलाते हैं, उनकी पहली पत्नी ने चार कन्याओं और एक पुत्र को जन्म दिया था। पुत्रियाँ जन्मते ही मार डाली गयीं। अब दूसरी पत्नी की यह पहली सौरी है। लाल साहब की माँ, विधवा बहन और दायी कंडौर(कंडा रखने की कोठरी) में छोटी ठकुरानी को घेरे बैठी हैं। दायी पृथ्वी पर नये जीवन का स्वागत करने को तत्पर खड़ी है। दीया जल रहा है, बड़ी उमस है।
      “दायी के हाथों में नयी जिन्दगी आ गयी। अम्मी और काकी उत्सुक हुईं।

      “ ‘करमुही आय, जनै वाली की कोख जरै, रेकवारेन के घर की बिटेवा, यू असगुन जनमि के पसरी है! भरौ मु माँ मदार!’
      “लाल साहब की माँ और चाची जल-भुनकर चल दीं। लाल कुँवर सिंह की नवजात कन्या के पहली ‘कुआँ-कुआँ’ करते ही दायी ने उसके मुँह में मदार का दूध टपकाना आरम्भ कर दिया था। बच्ची को मदार का दूध पिलाकर उसके मुँह में गर्भ का मल भर दिया। जच्चा की खाट के पास जल्दी-जल्दी गड्ढा खोदकर जैसे तैसे शिशु का शव तोप दिया।”
      इस भयानक अमानवीय प्रथा को खत्म करने के लिये उन्नीसवीं सदी में जोरदार कोशिशें हुईं। पर सती प्रथा की तरह उन्हें किसी बड़े सामाजिक आंदोलन का सहयोग नहीं मिला। पूरी बात लगभग हत्या संबंधी कानून के प्रयोग और अपराधी के बीच सीमित रही। बीसवीं सदी के अभ्युदय के साथ यह पाशविक प्रथा समाप्त हुई।
      पर क्या यह सचमुच ही समाप्त हुई? लगता है कि गाँवों से निकलकर यह प्रथा शहर के संभ्रांत वर्गों में आ गयी। वे अब कन्या के जन्म की प्रतीक्षा नहीं करते, वे भ्रूण परीक्षण कराते हैं और अगर शिशु कन्या की संभावना हुई तो बड़ी निस्संगता से गर्भपात का रास्ता अपनाते हैं। अगर कन्या हो ही गयी तो उसे तुरंत मारा नहीं जायेगा। किसी दूसरे खानदान की औरतें मिट्टी का तेल सँजोकर उसके बहू के रूप में आने की प्रतीक्षा करेंगी। हम वैसे ही वहशी हैं। फर्क बस इतना आया है कि नारी हत्या अब उसके जन्म के पहले होने लगी है या जन्म के बीस पच्चीस साल बाद।
[ ११ अप्रैल १९९३ ]

12 टिप्‍पणियां:

  1. कितना विभतसव कर्म था..
    पर लोगों की हिम्मत तो थी,
    आज के बुजदिल चोरी छिपे ये कर कर रहे हैं... तौबा तौबा करते हुए .

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  2. दिल दहल गया पढ़कर...और उस सद्यमाता के दुख की तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता

    कितने दुख की बात है...आज भी ये प्रवृति विद्यमान है.

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  3. कन्या की भ्रूण हत्या हमारे समाज के लिये कलंक है, कारण जो भी रहे हों तब, आज सब रोक दिया जाये।

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  4. Ye ghatna sunkr rongate khade ho gaye

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  5. हे राम! सभ्यता के आवरण में छिपे यह क्रूर हत्यारे आज भी खुलेआम घूम रहे हैं।

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  6. वीभत्सम कृत्य -ताज्जुब है यह मानव सभ्यता बची हुयी है!

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. इस जघन्य अपराध पर टिप्पणी करने के लिए शब्द ही नहीं हैं मेरे पास......बस गूंगापन रह गया है...लगता है मेरे भी मुंह में वही मदार का दूध किसी ने टपका दिया है....वही कसैलापन.....और....और ....

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  9. श्रीलाल शुक्ल जी के 'राग-दरबारी' के अपन भी मुरीद है. उसे पढ़ते हुए लगता है,अपनी ही कहानी है ! उन्हें ज्ञानपीठ-पुरस्कार की बधाई !

    हुजूर साहब का आलेख बताता है कि अभी हम कितने अनपढ़ और संवेदनहीन हैं ? शायद यह समाज कोई सबक ले !

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  10. कैसे समय से गुजरे। कैसा समय है!

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