रविवार, 19 दिसंबर 2010

........... आखिर मैंने क्या गलत कहा जिसका इतना राजनीतिक रायता फैला दिया जाय !

'' बचन परमप्रिय कहत कठोरे | कहहिं सुनहिं ते नर बहु थोरे || '' 
                                                                   ~ तुलसीदास 
'' मैं तुम्हारे विचारों को एक सिरे से खारिज करता हूँ , मगर मरते दम तक तुम्हारे ऐसा कहने के अधिकार का समर्थन करता रहूंगा | '' 
                                                                                                                                                       ~ वोल्तेयर 
दो तीन दिन पहले दो पोस्टों पर जाना/टीपना हुआ | दोनों जगहों पर आपत्तियां/असहमतियां रखी मैंने | अक्सर मेरी आपत्ति में लोग तल्खी देखते हैं , पर वह अनायास तो नहीं आती | क्या असहमतियां भी मिष्ठान-वितरण के अंदाज में रखी जायेंगी ! दूसरी बात ब्लोग्बुड में कमेन्ट का मतलब प्रशंसा ही है अमूमन , पर इस ट्रेंड का पालन ही किया जाय , यह आवश्यक तो नहीं ! असहमतियों के मूल भाव तो देखे ही जाने चाहिए | दो पोस्टों में से एक थी - मनोज जी की पोस्ट -  , जिसपर मैंने आपत्तियां रखीं | वहाँ मनोज जी से संवाद हुआ और उनको कोई मनोमालिन्य नहीं है , संवाद को उन्होंने तो सकारात्मक ढंग से लिया | पर एक दूसरी जगह पर मेरे द्वारा रखी बात को निहायत बुरे अंदाज में औंटा गया | यह पोस्ट रही - रवीन्द्र प्रभात जी की - |  उनकी पोस्ट पर सहज ही गया था , बरास्ते 'नुक्कड़' ब्लॉग के | जो उचित लगा वह कहा | मेरा कमेन्ट उनके लिए नाकाबिले-बर्दाश्त हो गया | रवीन्द्र जी ने एक असहमति के सिरे को पकड़कर सियासी रायता फैलाते हुए - एक पोस्ट लिख मारी - | मेरे वक्तव्य को भ्रामक अंदाज में रखकर औंटी गयी इस पोस्ट पर मुझे अपना पक्ष रखना मजबूरन जरूरी लगा | फिर वहाँ क्या हुआ , उसी के लिए पोस्ट लिख रहा हूँ ताकि असहमतियों के घटिया डिलीतीकरण के बाद भी 'ताकि सनद रहे' के रूप में यह पोस्ट मेरे ब्लॉग में स्मृति का हिस्सा बनी रहे !
    मैंने ब्लागीय सक्रियता को नाप रहे रवीन्द्र जी की पोस्ट पर जो पहला कमेन्ट किया था , यहाँ रख रहा हूँ , जो शायद वहाँ भी होगा | उनके निकष वस्तुनिष्ठ थे ही स्पष्ट | जाने कितने सक्रिय ब्लॉगों को उन्होंने दरकिनार किया था , खुद की सीमा के चलते | ब्लॉगजगत के स्तरहीन लेखन पर कोई चिंता थी | उनके कारणों की पड़ताल और उसे कहने के साहस का प्रयास वहाँ नहीं था | उनके विश्लेषण का प्रयास एकांगी खानापूर्ती लगा | इसलिए उनके प्रयास में स्तरहीनता दिखी | मेरा एकमात्र लक्ष्य यही था कि सही मूल्यांकन द्वारा ऐसा परिवेश बनाया जाय जिससे लोग बेहतर लेखन की ओर आयें , और गंभीर लोगों द्वारा कहा जाना कि 'ब्लॉग लेखन' स्तरीय नहीं है - का विकल्प दिया जाय | आत्ममुग्धता से उबरकर ठोस कारण देखे जांय !  इसको मैंने कहा ---
  इसपर सहज सी रवीन्द्र प्रभात जी की नकारात्मक प्रतिक्रया आयी जिसमें बात को समझने का प्रयास नहीं किया गया था और मेरे टीप-कर्म पर व्यंग्य मारा गया था ---
   फिर मैंने स्पष्टीकरण दिया ---
    इस स्पष्टीकरण के बाद तो उन्हें मेरे कमेन्ट का मंतव्य समझना था | पर उन्हें तो और ही सूझ रहा था और फिर 'मत चूको चौहान' का अवसर भी मिला था , घटिया खेल के लिहाज से | मुझे केंद्र में रखकर एक - बेतुकी राजनीतिक पोस्ट - लिख ठोंकी | वहाँ पर मैंने अपने पक्ष को तीन टीपों में रखा | उन्होंने इन टीपों को डिलीट कर दिया , उसी पोस्ट पर लगभग दो दर्जन से अधिक टीपों के डिलीतीकरण के प्रोजेक्ट के तहत | मुझसे सहमति रखने वाले कई वरिष्ठ ब्लागरों की टीपों को भी डिलीट किया , जिनमें प्रवीण जी , अनूप जी , सुरेश चिपलूनकर जी , रचना जी .. आदि रहे | फिलहाल उनके कारनामों का अंदेशा था मुझे और मैंने उनकी कॉपी सेव कर रखी है | मेरी तीन टीपें ये हैं :
प्रवीण जी , चिपलूनकर जी , रचना जी , की टीप यहाँ रख रहा हूँ जबकि अनूप जी की टीप - यहाँ बज़ पर - जाकर देखी जा सकती है | बज़ पर मुझसे सहमत होते अन्य लोगों के कमेन्ट भी आपको मिलेंगे
वहाँ पर रवीन्द्र के परम सहयोगी थे - जील और टपक गिरधारी | जील को गाली गलौज की भाषा आती है और अनर्गल बखेड़े खडा करना उनका अभीष्ट कार्य है | जिस तरह से रवीन्द्र जी ने अन्य सियासी तीर रखा था उसी तरह यह दिव्यास्त्र  भी उनकी राजनीति का हिस्सा था | जिस ब्लॉगर को  मैं बेकार का समझकर अब जिसकी जानिब एक हर्फ़ नहीं जाया करता उसका इस तरह - टीपों में मेरा अभिनन्दन करना क्या कहा जाय :) | धन्य है यह लड़ेच्छा भी ! रवीन्द्र जी को इससे बढियां अस्त्र क्या मिलता
     जील पर रचना जी का समर्थन अखरने वाला जरूर लगा | ब्लागरी के इस अजीबो-गरीब माहौल में रचना जी नारीवाद की ध्वजावाहिका हैं , इसलिए और अखरा ! जिन रचना जी ने पहले टीपते हुए कहा था :
अब यह कमेन्ट डिलीट है .  
उन्हीं रचना जी का मुद्दों से कटी और असंवाद से भरी इन ताबड़तोड़ वाहियात टीपों पर 'ब्रैवो' कहना हैरत में डालता है | रचना जी ने मुझसे सवाल किया  था कि जील को रवीन्द्र का सियासी तीर कहना मुद्दे को भटकाना है |
पहली बात कि जिस प्रविष्टि का स्थापत्य ही धूर्तता के साथ हुआ है वहाँ 'मुद्दे' की बात की किसने  परवाह की थी ? जील ने कहा '' इनकी टिप्पणियां मुझे चिदंबरम के वक्तव्य - " भगवा आतंक " , या फिर दिग्विजय की घटिया बयानबाजी या फिर मंदिरा बेदी और राखी सावंत के बचकाने वक्तव्यों जैसी लगती है , जो बस चर्चा में बने रहना चाहते हैं, उसके लिए चाहे जो मार्ग अपनाना पड़े। '' | रचना जी , आपको क्या यहाँ मुद्दे के भटकाव का अनुभव नहीं हुआ ? इसकी तारीफ़ में आपने 'ब्रैवो' कहा ! यही चीज अगर कोई पुरुष कहता किसी स्त्री को तो आपको अपमान-अपराध जैसा लगता और बहुत संभव है कि नारी ब्लॉग पर आप उसके खिलाफ पोस्ट भी लगातीं ' venomous snake ' , idiocies , leeches , Besharam ,  maggot ' - आदि गालियाँ कोई पुरुष दे , तो देखिये क्या से क्या हो जाय , पर यही एक स्त्री कहती है तो आपके सहज स्वीकार्य हो जाता है ! तारीफ़ के योग्य हो जाता है ! आपके प्रतिमान दोहरे क्यों हैं ? क्या इस तरह आप नारीवाद जैसी लोकोपकारी विचारधारा को समग्र मानवीयता से अलग नहीं रख रहीं ??
      टपक गिरधारी ने सतीश सक्सेना जी के ब्लाग  का लिंक दिया और फिजूल की बात कही --- 
 भाई ,किसी  के व्यक्तिगत मिलने और ब्लॉग-लेखन की इस बहस (?) से क्या सम्बन्ध था | अब कोई मिलने आयेगा तो उसे भगा तो नहीं दिया जाएगा | मानवता तो कहती है कि वाद-प्रतिवाद-संवाद और सामान्य सदाचार तो किये जांय , इसमें दिक्कत नहीं !  और इसे कोई ब्लॉग पर लिख रहा है , तो यह उसकी खुशी | इससे हमारी बातों का क्या लेना देना था ? पर यह सब संवाद की मर्यादा में था सिवाय मेरी टीपों के ! :)
          कुछ साथियों का कहना है कि डिलीतीकरण कोई मुद्दा नहीं होना चाहिए ! प्रश्न है कि जब आप कमेन्ट को ब्लॉग माध्यम का उत्कृष्ट पहलू मानते हैं , तो क्या इस तरह का धूर्त डिलीतीकरण आप पर प्रश्न खडा नहीं करता ? आप कोई अपनी पोस्ट में किसी व्यक्ति का नकारात्मक रूप से उल्लेख करते हुए , कुछ भी लिख मारे  तो क्या वह अपना पक्ष/अपनी बातें नहीं रखे वहाँ ? उसकी टीपों का मिटाया जाना क्या फासीवादी कर्म नहीं है ? यह घटना मेरे साथ जाने कितनी बार हुई है ! एक बार तो यह चिट्ठाचर्चा ( मयंक शास्त्री द्वारा कृत ) पर यही हुआ , जिसपर साथी ब्लॉगर गिरिजेश राव जी की - यह पोस्ट - देखी जा सकती है | यह महज संयोग नहीं है कि 'परिकल्पना' ( रवीन्द्र जी का ब्लॉग ) और चिट्ठाचर्चा पर ऐसा होता है | एक सा स्वभाव दिखेगा दोनों में | एक जगह चर्चा द्वारा भीड़ बटोरी जाती है और दूसरी जगह पुरस्कार के द्वारा | अब चर्चालोभी और पुरस्कारलोभी वाहवाही नहीं करेंगे तो क्या करेंगे | और जो वाहवाही ही सुनने के आदी हैं , उनसे असहमति के कमेन्ट कहाँ पचेंगे ! बिलबिलाकर डिलीट ही करेंगे
      क्षेत्रवाद , जातिवाद जैसी मनोवृत्तियाँ भी ब्लागरी के इस माहौल में बहुत फूलती - फलती हुई मिलती हैं ! पता चलेगा कि विदेश में बैठा एक व्यक्ति , देश में बैठे एक व्यक्ति का ब्लागीय-साथ इसलिए देने पर तुला है , क्योंकि दोनों की जातियां एक हैं , या एक स्थान से हैं या ....ऐसे ही अन्य कारण भी ! यह मथाधीसी के इर्द-गिर्द घूमता चक्र है ! एक आंतरिक 'सेटिंग' ! यह वादवादी मनोवृत्ति ब्लागिंग के स्तरीय होने में बड़ी बाधा है
      भाई मुझे नहीं लगता कि मैंने ऐसी कोई गलत बात कह दी थी , जिसपर इतनी फिजूलबाजी हो ! कोई भी गंभीर 'ऑब्जर्वर' ऐसा कहता मिलेगा | मुझ क्षुद्र जीव  ने भी यही बात कह दी , इसमें मेरी क्या गलती ! वोल्तेयर ने तो बहुत बड़ी बात कह दी थी , यहाँ तो भाषा के लोकतंत्र में ज़रा सी असहमति पर आपकी ह्त्या करने के लिए लोग अपने रमपुरिया चाकू पर शान चढ़ाए बैठे रहते हैं !  पर एक बात यह स्पष्ट है कि कहीं भी जाकर सहज ही कमेन्ट करना इस स्तरीय(?) हिन्दी ब्लागिंग में अकारण हेडेक लेना है | एक दो हो तो चले , जाने कितने कटु अनुभव हो चुके ऐसे !  अब कोई चाहे ठिठकी टीपें देने वाला कहे या निष्क्रिय ब्लॉगर , गू में मुंह घुसेड़ी करने नहीं जाउंगा | इस ब्लोग्बुड की मुख्यधारा की किसी भी लोकप्रिय(?) गली में चले जाइये , दर्जन भर से ढेर कूकुर मुंह से हगते हुए मिलेंगे !


नोट : आप ब्लॉग - स्पेस की अराजकता की एक झांकी यहाँ - सतीश पंचम जी की पोस्ट - पर जाकर भी देख सकते हैं | धूर्तता को प्रश्नविद्ध करती हुई , व्यंग्यात्मक लहजे में लिखी गयी एक अच्छी प्रविष्टि है ! :)  

60 टिप्‍पणियां:


  1. नफरत की भावना को साथ लेकर काम करने वाले सिर्फ और सिर्फ अपना मानसिक और शारीरिक शक्ति का नुकसान करेंगे !जो लोग किसी की दुश्मनी में पलीता लगा रहे हैं निस्संदेह वे अपनी मानसिकता का परिचय दे रहे हैं !

    अनामियों के कमेन्ट की तारीफ़ करने वाले कमेन्ट देख कर यही लगता है कि अनामी वास्तव में इनके जानकार हैं अथवा यह खुद हैं !

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  2. ओह ! तो उस बज़ का आधार ये परिकल्पना वगैरह थी, मैंने तो सोचा था कि ब्लॉगजगत में लेखन के स्तर को लेकर कोई चर्चा आयोजित की गयी थी, जिसमें सबने अपने-अपने मत दिए थे. पूरी बात अब जाकर पता चली है.
    मुझे तो ये वार्षिक ब्लॉग के संकलन की बात ही सिरे से बेकार लगती है क्योंकि मैं इसे एकदम स्वतन्त्र विधा मानती हूँ. हिन्दी ब्लॉगजगत में ना एक जैसे विषय पर लिखा जाता है, और ना ही एक जैसा स्तर है, तो समीक्षा की बात ही बेमानी है.
    हाँ, लेकिन 'हमारी भी जय-जय, तुम्हारी भी जय-जय' वाली प्रवृत्ति तो है ही, पर इसकी भी आलोचना करके कोई सुधार नहीं होने वाला है.
    समस्या तो वही है कि जब आपकी आलोचना को कोई आलोचना ना मानकर आक्षेप माने, आपके द्वारा आलोचना करने से कोई अपने को सुधारे ना, तो वहाँ अपनी ऊर्जा व्यर्थ करने का क्या फायदा?
    मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ अमरेन्द्र, पर फिर वही बात कहूँगी कि यह एक स्वतंत्र विधा है, कोई साहित्य नहीं. जिसके मानक तय हों, जिनके निकष पर लेखन को कसा जाय, इसलिए आलोचना व्यर्थ है.
    दूसरी बात, तुम खुद यह जानते हो कि इन तमाम विसंगतियों के बावजूद कुछ लोग हैं, जो इन सब से दूर रहकर अपने लेखन कार्य में व्यस्त हैं. तो सकारात्मक चीज़ों को देखो, नकारात्मक बातों में खुद को उलझाने का कोई फायदा नहीं.तुम प्रतिभाशाली हो, ऊर्जावान हो. अपनी ऊर्जा को सही जगह पर लगाओ. यहाँ तुम्हारी आवाज़ कोई नहीं सुनने वाला और ना ही समझने वाला.

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  3. फेसबुक पर निर्मल पानेरी जी का कमेन्ट मिला है , जिसे रख रहा हूँ :

    Nirmal Paneri >> सामूहिक आत्मा मुग्धता से उठा कर कुछ बेहतर किया जा सके ...इस घुट को पीना निम् के पानी या पत्तों को चेत्र महीने में पीने के बार बार है ...जो हमारे शास्त्रों में कहा गया है ...अब क्या की ये पानी पुरे साल भर इन्सान को स्वस्थ रखने की गारंटी देता है ...जब तक की कोई ला इलाज बीमारी घर न कर जाये ....सो ....आज कल हो क्या गया है अमरेद्र जी की सब को बुफ्फेट में खाने की आदत है और उसमें भी पसंद या स्व्रुचिकर भोजन होता है ...पर जो अच्छा दीखता है लोग उसी को पसंद करतें है ...जबकि वो लगभग स्वस्थ के लिए हानिकारक है ....सो ये हमारी समझ में इंसानी फितरत है ...इसको हूं भी इतना अन्दर तक न लें .....मेरे हिसाब से कोई गलत तो नहीं ही है ये !!!!!!!!!!!!!!

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  4. 'फेसबुक' पर वन्दना शर्मा जी का कमेन्ट ये है :

    Vandana Sharma >> एकदम अजीब है सब कुछ ...इतना कुछ हो रहा है ...हमे जानकारी नही थी ..अच्छा नही लगा ...घर बैठे तनाव लेने देने वाली बात हुई सभी शिक्षित हैं इतनी कड़वाहट तक नही आना चाहिए ...यदि किसी की विचार निरंतर कष्ट देते हैं तो वहाँ से हट जाने या उनसे मुद्दों की बातचीत न करने में ही भलाई है ...ऐसी भी क्या टीका टिप्पणियाँ जो मन दुखाएं ...तुम अपने घर भले हम अपने घर ..कष्ट तो सभी को हुआ न ...किस स्तर तक होता है यह सब जानकर हैरत और दहशत हुई ...

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  5. आराधना से सहमत....वह ठीक कह रही है अमरेन्द्र .. अगर आप यह सोचते हैं की आपकी असहमति आलोचना को लोग सकारात्मक तरीके से लेंगे ..बहुत बड़ी गलतफहमी है आपको ....अपना वक़्त और उर्जा सही जगह पर व्यय कीजिये .

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  6. अभी हम सब को सब्र के पाठ पढ़न की जरूरत है। बिना सब्र के कुछ सकारात्‍मक हासिल नहीं होने वाला है। सभी अपने धैर्य को बढ़ायें और दूसरों को सुनने और उस पर सही चिंतन करके ही निष्‍कर्षों तक पहुंचे, तो बेहतर होगा।

    गिरीश बिल्‍लौरे और अविनाश वाचस्‍पति की वीडियो बातचीत

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  7. यार अमरेन्द्र…तुमसे एक प्रार्थना है…ब्लाग को इतनी गंभीरता से मत लो…यहाँ एक से एक क्षुद्र और महात्वाकांक्षी लोग हैं…हर जगह टिप्पणी ज़रूरी नहीं…बेहतर है कुछ सार्थक कामों में लगो…

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  8. मेरे सबसे पसंदीदा ब्लॉग अधिकतर वैसे ब्लॉग हैं जहाँ कोई झाँकने तक नहीं जाता है.. लगता है जैसे बिलकुल अछूता हो.. इसका कारण सिर्फ मुझे एक ही दिखता है.. वह यह कि उसके लेखक कहीं कमेन्ट नहीं करते हैं..
    वैसे ब्लॉग कभी इन चर्चाओं का हिस्सा नहीं बन पाया है.. शायद कभी ब्लॉग का इतिहास लिखा जायेगा तब भी उसे नकार दिया जाएगा और चरण वंदना में लोग लग जायेंगे..

    खैर.. हमें क्या?

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  9. अभी अभी अशोक जी का कमेन्ट पढ़ा.. गौर किया जाए उस पर.. :)

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  10. @ सतीश जी , जैसे दस सर होने पर भी रावण एक था वैसे ही कई बेनामियों में भी एक ब्लॉगर-आत्मा दिखेगी ! मुझे भी लग रहा है कि वही बेनामी थे या उनके हम ख्याली ! जो भी हो . भाड़ में जाएँ !
    @ मुक्ति जी & लवली जी , अब मुझे भी यही समझ में आ गया है !
    @ अविनाश जी , उपदेशतः आप सही कह रहे हैं ! मैंने तो बहुत धैर्य का परिचय दिया , यह पाठ रवीन्द्र जी भी पढ़ लेते तो क्या न होता ! बार बार स्पष्टीकरण देने के बाद वह चाहते थे कि उनकी पीठ ठोंकूं , तो यह तो न हो पाया | और इसमें कुछ गलत भी नहीं था !
    @ अशोक जी , भाई अब छोड़ रहा हूँ कहीं भी जाकर सहज ही कुछ कह देने के स्वभाव को !
    @ प्रशांत जी , वह तो है . और अशोक जी की बात काबिले-गौर है ही उससे भी ज्यादा काबिले-अमल !

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  11. 'हिन्दी' आप की प्रतीक्षा में है।

    अँखड़ियाँ झाईं पड़ी पंथ निहारि निहारि
    जीभिड़िया छाला पड़ा नाम पुकारि पुकारि।
    ...........
    तोड़ दो शीशा,इसमें शक्ल बेनूर दिखती है
    मुझे मेरी माँ ने हमेशा खूबसूरत कहा है।

    न ढूँढ़ो मुझे अजीयत की तंग गलियों में
    मैं दीवार-ए-सुकूँ पर इश्तिहार सा चिपका हूँ।

    न करो नीयत पर शक, त्यौहार का जमाना है
    धुन-ए-मातम बेसुरी बेवक्त सही,बजा तो रहा हूँ।

    ग़जब इश्क तेरा महबूब मेरे,
    वहीं छूते हो जहाँ दुखता है।
    .........................
    चर्चा फर्चा, इनाम उनाम वाले ब्लॉगों में क्या शामिल है, यह नहीं देखना चाहिए। जो नहीं शामिल हैं, उन नामों पर गौर फरमाना चाहिए। ये 'जाति प्रथा' वाली बात बहुत मार्के की कही बीड़ू!

    और अंत में 'उत्सवी ब्लागरी' पर एक और द्विपदी - खुसरो की:
    गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस,
    चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस।

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  12. जिस प्रकार हिंदी-साहित्य को कुछ मठाधीशों ने जकड रखा है,ब्लौग-लेखन में भी यही प्रवृत्ति शुरू हो चुकी है.किसी का लिखा ज़रूरी नहीं ,सबके मन-मुताबिक हो.यह तो वाही हुआ की आप केवल 'आत्म-मुग्धता' के जाल में ही बंधे रहना चाहते हैं.
    जो टिप्पणीकार किसी की पोस्ट में जाकर गंभीरता से उसका विवेचन करता है वह आपका 'शत्रु' कैसे हो गया,हाँ कुछ लोग ''बहुत प्रभावी रचना'', ''उम्दा प्रस्तुति'' आदि का कट-पेस्ट ही पसंद करते हैं तो उन्हें उनकी ''आत्म-मुग्धता' मुबारक हो.

    हमारी पोस्ट में यदि भूले-बिसरे एक भी गंभीर टीप आ जाती है तो धन्य समझता हूँ.

    अमरेन्द्र भाई इन तथाकथित 'ब्लॉगरों'से जितनी जल्दी पीछा छुड़ा लो ,हम-सबके लिए अच्छा होगा !आपकी शिकायत सौ-फ़ीसदी जायज़ है !

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  13. अगर मै एक व्यवस्थित टिप्पणी कर पाता तो शायद वह मुक्ति जी की टिप्पणी की तरह होती....!मुक्तिजी को उनकी टिप्पणी के लिए साधुवाद..!

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  14. तो अब अमरेन्द्र टिप्पणी नहीं करेंगे?

    आराधना जी, लवली जी, प्रशांत, श्रीश और संतोष जी सब की राय सही है। आचार्य तो खैर हमेशा सही होते ही है।
    राय अपनी भी ऐसी ही है अमरेन्द्र, जिन्हें नहीं सुहाये,उनके यहाँ क्यों टिपियायें?
    ये मत सोचना कि अपने यहाँ बुलाना चाह रहा हूँ, बिल्कुल भी मत आना। तुम स्वभाववश अपने मन की लिखोगे, और आलोचना मैं भी नहीं सुनना चाहता:)

    और भी गम हैं जमाने में यार...

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  15. आइये आप जैसों का हमारे ब्लॉग संसार में स्वागत है !

    डिस्क्लेमर : कृपया इसे प्रचार ना समझा जाए |

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  16. पाल ले इक रोग नादान.....
    ...

    अमरेन्द्र जी आपने भी अच्छा रोग पाल लिया.........

    बीती ताहि बिसार के आगे की सुध ले....

    कुछ तो लोग कहेंगे........ लोगों का काम है कहना.........


    पर मैं कुछ भी नहीं कह पा रहा हूँ...... एक विकल्प दे रहा हूँ (?)
    सुंदर.......
    अति सुंदर...
    साधुवाद
    गज़ब...
    इन चार में से एक टीप दीजिए....... (अगर मन आये तो)

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  17. घटिया ब्लौग पढ़ने से बचना चाहते हैं तो मेरे ब्लौग एग्रीगेटर पर आइये और उसके लिए अच्छे ब्लौग सुझाइए.
    रवीन्द्र प्रभात जैसे चिरकुटों के पीछे अपने मन क्यों खट्टा करते हैं?

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  18. उन्हीं रचना जी का मुद्दों से कटी और असंवाद से भरी इन ताबड़तोड़ वाहियात टीपों पर 'ब्रैवो' कहना हैरत में डालता है |

    क्यूँ हैरत मे डालता हैं ? मुझ उसका इतनी लम्बी टीप देना अच्छा लगा मैने ब्रावो कहा वैसे ही जैसे मैने आपकी बातो को कुछ हद तक सही कहा ।

    क्या ये जरुरी हैं की अगर आप और जील मे किसी एक का चुनाव करना ही होगा ??
    मुझ कुछ कुछ दोनों का भी पसंद और ना पसंद हो सकता हैं ।

    रचना जी ने मुझसे सवाल किया था कि जील को रवीन्द्र का सियासी तीर कहना मुद्दे को भटकाना है |

    जी नहीं जो मैने कहा था वो मात्र इतना था की आप अगर सही हैं तो जील भी सही हैं और ये कहना गलत हैं की रविन्द्र ने जील से वो टीप लिखवाये । मे खुद रविन्द्र की आलोचक हूँ लेकिन आप का ये कहना की वो जील को लेकर आये आप के ऊपर तीर चलवाने के लिये मुझे नहीं जचा और मैने लिखा

    सतीश पंचम की पोस्ट पर आप के ब्लॉग का लिंक देखा और अपना नाम देख कर टीप दी क्युकी मे बुधिजीवियो के यहाँ कम ही जाती हूँ । !!!

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  19. पके प्रतिमान दोहरे क्यों हैं ?


    आप एक भी ऐसी पोस्ट दिखा दे जहा मैने अपशब्दों की तारीफ की हैं । नारी ब्लॉग पर मे पुरुषो के खिलाफ नहीं समाज मे स्त्री के खिलाफ दोहरे नज़रिये के ऊपर लिखती हूँ । कम से कम मेरे पास एक मुद्दा तो हैं अमेरंद्र जिस के लिये मे ब्लॉग लिखती हूँ । बेहूदा प्रेम प्रसंगों की विफलता से अपनी उर्जा और समय तो नहीं व्यर्थ करती । आप कितनी बार मेरे साथ खड़े हुए हैं जब मेरे ऊपर गलियाँ पड़ी हैं ????? क्युकी आप की नज़र मे महिला को आवाज उठानी ही नहीं चाहिये उसके खिलाफ जो जो चाहे लिखे । ज्यादा और क्या लिखूं उम्र मे आप से बहुत बड़ी हूँ और एक गरिमा आप के साथ बना कर रखना चाहती हूँ पर अफ़सोस हैं की आप ने मेरे ऊपर आक्षेप केवल इस लिये किया की मैने जील की टीप पर ब्रावो कहा जबकी ना जाने कितने उनके ब्लॉग पर यही सब कहते हैं जो आप के बहुत अपने हैं । ये पार्शियल हैं

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  20. थोड़ी असमंजस की स्थिति है..कभी सोचती हूँ..लोगों को आईना दिखाना जरूरी है....किसी प्लान के तहत नहीं....नज़र पड़ गयी...पढ़ लिया....कोई बात अनुचित लगी तो विरोध क्यूँ ना दर्शायें

    पर ये भी है, समय और सृजनात्मकता दोनों पर ही असर पड़ता है....आप कुछ सृजनात्मक लिखने की सोचते हैं, पता चलता है...लोगों के आरोपों का जबाब देने में ही लगे हुए हैं और सारा समय जाया हो गया.

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  21. i re visited the other blog and found that my first comment has been deleted{ its within the permissible rights given by Google } so i hv deleted "bravo " comment by me because now it looks out of context

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  22. पता नहीं मेरे गूगल रीडर में कौन सा फिल्टर लगा है कि झगड़ा बढ़ाने वाली कई पोस्टें आने ही नहीं देता है, जय हो गूगल देवता।

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  23. pravisti evam pratikriya padhne ke
    uprant yahi kah sakte hain ke kum-se-kum blogjagat ko 2/4% stariya blogger
    ke karan bakiya ko dhakiyaya nahi
    jai.....

    yse vyaktigat anubhav ko samooh se
    jorna vidwan vyakti ke liye nakaratmak hote hain.............

    note: hindi blog ke kinhi 10 blog(vyaktigat/samoohik) me parikalpana ne apne seva-bhaw se
    apna sthan pa liya hai........

    mere samajh se sabse adhik blog ke
    link is blog se mil sakte hain ...
    uchit sthan ke saath aur kya chahiye kisi lekhak athva pathak ko

    sabhi ko pranam

    ye apni tippani 'parikalpana blog' se bhai amrenderji wali post se cut-pest kar laye hain...........

    ye ek pakshiye tippani hai......aap ki post padhne ke baad aapke dwara diye gaye buzz link par hum apne param priye anup bhaijee ke tippani
    padhne ke uprant apni tivragami tippani par khed jatate hue kshma
    chahte hain......

    0. fursatiya
    1. shabdon ka safar
    2. kwachidanyatoapi
    3. ek alsi ka chittha
    4. safedggar
    5. dil ki baat
    6. shiv/gyan blog
    7. udan tastari
    8. chittha-charcha
    9. parikalpana
    10.anar kumar-sirf tippani ke liye.

    उत्तर देंहटाएं
  24. मुक्ति जी की टिप्पणी से सहमत.
    उनकी बातों को गंभीरता से लिजीये.

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  25. पहले रचना जी के समक्ष अपनी बात रख लूँ , बाकी आदरणीय टीपने वालों को यथाशक्य बाद में संबोधित करूंगा ......

    @ रचनाजी ,
    आरम्भ में पुनः स्पष्ट कर दूँ की आप प्रतिशोधात्मक कीचड-उछौहल से भरे इस ब्लॉग-स्पेस में नारीवाद की ध्वजावाहिका हैं , यह गर्व की बात है इसलिए सहमति/असहमति के उपरान्त भी आप माननीय हैं ! और आपके कथन पर - ''कम से कम मेरे पास एक मुद्दा तो हैं अमेरंद्र जिस के लिये मे ब्लॉग लिखती हूँ ।'' --- अमरेन्द्र क्या कोई परम-पागल भी इसको झुठला नहीं सकता !

    'लम्बी टीप' आपको अच्छी लगे , मुझे कोई आपत्ति नहीं थी पर उनकी टीप का वह हिस्सा जो मैंने कोट किया है वह अगर किसी पुरुष द्वारा किसी 'नारी' को प्रेषित होता तो क्या आप उसी गर्म जोशी से 'ब्रैवो' कहतीं जबकि आप ने यहाँ भी अपनी टीप में स्वीकार किया है कि ' मे पुरुषो के खिलाफ नहीं समाज मे स्त्री के खिलाफ ..... ' ? दोहरे प्रतिमान होने का सम्बन्ध यहाँ से है ! गाली बकने वाले किसी का साथ इसलिए की वह नारी है और पुरुष को दे रही है , पचता नहीं !

    @ आप कितनी बार मेरे साथ खड़े हुए हैं जब मेरे ऊपर गलियाँ पड़ी हैं ?????
    --- इस प्रश्न को ज़रा ऐसे भी देखिये कि जहां आपको गाली दी गयी होगी क्या मैं आपके विरोध में था ? और कभी अपने पक्ष में सहायता भी नहीं माँगी ! एक सहज सर्वोदयी अपेक्षा रही 'जेनुइन' बात रखने की , इसलिए क्योंकि आप विशिष्ट लोकोपकारी वाद की ध्वजावाहिका है !
    हां , ऐसे कई नारी संबंधी मुद्दे थे जहां मैंने नारी मुद्दे में साथ दिया !
    -'लंठ' ब्लॉग के ऊपर का फोटो जहां नारीदेह के 'उत्सवीकरण' का विरोध मैंने किया था , आपकी भी सहमति थी . दुर्योग से ब्लॉग नदारद है !
    - ' बेनामी' ब्लॉग की चर्चा में नारी पक्ष रखने में पुरुषों ने यहाँ तक कह डाला कि 'अमरेन्द्र ही बेनामी हैं' ! दुर्योग से यह ब्लॉग भी नदारद है !
    - चिट्ठाचर्चा में सुजाता जी द्वारा लिखी गयी चर्चा में यहाँ देखिएगा , संयोग से यह मौजूद है , यह लिंक रहा - http://chitthacharcha.blogspot.com/2010/03/blog-post.html

    मैं यह नहीं कहूंगा की मैंने कोई बड़ी बात की बल्कि यह कि जो 'जेनुइन' लगा बिना 'वर्ग'/जाती की परवाह किये कहा ! यह सहज सी अपेक्षा किसी से भी कर सकता हूँ !

    ................. जारी

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  26. @ बेहूदा प्रेम प्रसंगों की विफलता से अपनी उर्जा और समय तो नहीं व्यर्थ करती । & क्युकी आप की नज़र मे महिला को आवाज उठानी ही नहीं चाहिये उसके खिलाफ जो जो चाहे लिखे ।
    --- इन वक्तव्यों की छाया अगर मेरे ऊपर है तो प्रकारांतर से स्पष्टीकरण अवश्य दूंगा . आप नारीवाद की सैद्धांतिकी और व्यावहारिकी दोनों से परिचित हैं इसलिए आप समझेंगी , ऐसी उम्मीद के साथ !

    विषकन्याओं की निर्मिति में दोष न तो विष का है न ही कन्याओं का . दोष है पितृसत्तात्मक समाज का ! पर कोई विषकन्या अगर किसी ठीक व्यक्ति ( जो स्त्री लोलुप न हो पर नैसर्गिकता वश ... ) को बरास्ते धूर्तई के 'प्रेम करती हूँ' कह कर अपने बहुबिध जाल में फंसाई हो - आसक्त बनाती हो - और चौकाऊ तथ्य बटोरी हो , तो इसमें क्या सारा दोष उस पुरुष का है ? क्या नारी पक्ष निर्दोष है ? क्या यह नहीं देखा जाना चाहिए उस पुरुष के अन्य उदाहरण हैं ऐसे अन्य महिलाओं के प्रति ? क्या यह प्रकरण 'जेनुइन' के समर्थन की मांग नहीं करता , स्त्री या पुरुष की वर्ग-दृष्टि से अलग निरपेक्ष होकर ..क्योंकि -
    महज किसी स्त्री का समर्थन करना स्त्रीवाद का समर्थन करना नहीं है !
    ठीक वैसे ही जैसे -
    महज किसी ब्राह्मण का समर्थन करना ब्राह्मणवाद का समर्थन करना नहीं है !
    महज किसी दलित का समर्थन करना दलितवाद का समर्थन करना नहीं है !

    सीधे कहता हूँ किसी घटना-विशेष से सम्बद्ध व्यक्ति - विशेष को नारी-विरोधी कहना प्रथमतः घटना विशेष के वतुनिष्ठ विवेचन की मांग करता है | ब्लागिंग की इस गदह-पचीसी में वस्तुनिष्ठ विश्लेषण कहाँ संभव ? मुद्दा विशेष से जुड़ी ब्लॉग-संसद की गदह पचीसी इसका उदाहरण है | जब तक न्यायालय जितनी भी वस्तुनिष्ठता न आ सके , ब्लॉग स्पेस को किसी व्यक्ति के चरित्र पर निर्णय देने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए !

    मुझे उम्मीद है आप मेरी बात को समझेंगी !

    ------------------

    जहां तक आपने कहा है कि मैंने 'सियासी तीर' के सन्दर्भ में आप की बात को पूर्णतया नहीं समझ सका तो अब क्या कहूँ ? टीप तो वहाँ है नहीं ! उसे कैच भी नहीं कर सका था ! हाँ, आपकी वह टीप अंगरेजी में थी , हो सकता है की मुझ भाषाई विकलांग को न समझ आयी हो ! ऐसी स्थिति में क्षमा सहित !

    ........................समाप्त |

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  27. मुझे अपनी यह कविता क्यों याद आ रही है?


    ऊ हो बढ़िया तूहूँ बढ़िया
    बढ़िया से जब मिल गए बढ़िया
    हम हुए बुरधुधुर बढ़िया।

    उत्तर देंहटाएं
  28. अमरेन्द्र ,आपकी यह पोस्ट एक बार फिर म्लानता ,नैराश्यपूर्ण अवसाद की ही प्रतीति/प्रलाप भर है और आपकी प्रतिभा के निरंतर अधोपतन की ही यह एक दुर्भाग्यपूर्ण परिणत है ....जिन तुलसी को आप उद्धृत करते नहीं अघाते वे एक महान समन्वय वादी रहे ...सकल राम मय सब जग जानी -विनम्रता ही विद्वता का निकष है ....मैं खुद आत्मान्वेषण में पाता हूँ कि मुझमें वे तमाम कमियाँ बरक़रार हैं जिन्होंने मुझे मेरी भवितव्यता से मिलने से रोक रखा है -एतदर्थ -

    मैं आपसे बड़ा हूँ ,उम्र में भी और वर्षों के अनुभव में भी ....हाँ बौद्धिक कुशाग्रता ,भाषा की समझ आदि में आपसे काफी कमतर हूँ और इस बात का मुझे हर्ष ही है क्योकि आप मेरे अनुज सरीखे हैं ..मगर आपसे अंतिम बार कह रहा हूँ सकारात्मक लोगों से संवाद रखिये ,पाजिटिव सोचिये ..मैं क्या देख रहा हूँ कि आपके इर्द गिर्द ,नैराश्यपूर्ण ,नकारात्मक लोगों की भीड़ जुट रही है जो कई तरह के मुखौटे लगाए हुए /हुयी हैं ...और वे निरंतर आपमें हताशा ,नैराश्य जनित आक्रामकता का ही संचार करेगें /करेगीं ..मैं स्वयं भुक्तभोगी रहा हूँ और इसलिए अपना प्रिय जानकर आपसे यह निवेदन कर रहा हूँ ..... आप अभी एक साधक भर है ,साध्य को साधिये ..व्यर्थ के साधनों में ही सारी ऊर्जा का अपव्यय मत कर डालिए ....अपनी प्रतिभा को फोकस कीजिये और लक्ष्य पर केन्द्रित होईये ..बस! मैं जानता हूँ आप चमत्कार कर सकते हैं ..अभी हाल की कविता ने मेरे मन मस्तिष्क पर आपकी प्रतिभा का एक अमित छाप छोड़ा है! अपने को पहचानिए और आगे बढिए !

    उत्तर देंहटाएं
  29. अमरेन्द्र ,आपकी यह पोस्ट एक बार फिर म्लानता ,नैराश्यपूर्ण अवसाद की ही प्रतीति/प्रलाप भर है और आपकी प्रतिभा के निरंतर अधोपतन की ही यह एक दुर्भाग्यपूर्ण परिणत है ....जिन तुलसी को आप उद्धृत करते नहीं अघाते वे एक महान समन्वय वादी रहे ...सकल राम मय सब जग जानी -विनम्रता ही विद्वता का निकष है ....मैं खुद आत्मान्वेषण में पाता हूँ कि मुझमें वे तमाम कमियाँ बरक़रार हैं जिन्होंने मुझे मेरी भवितव्यता से मिलने से रोक रखा है -एतदर्थ -

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  30. मैं आपसे बड़ा हूँ ,उम्र में भी और वर्षों के अनुभव में भी ....हाँ बौद्धिक कुशाग्रता ,भाषा की समझ आदि में आपसे काफी कमतर हूँ और इस बात का मुझे हर्ष ही है क्योकि आप मेरे अनुज सरीखे हैं ..मगर आपसे अंतिम बार कह रहा हूँ सकारात्मक लोगों से संवाद रखिये ,पाजिटिव सोचिये ..मैं क्या देख रहा हूँ कि आपके इर्द गिर्द ,नैराश्यपूर्ण ,नकारात्मक लोगों की भीड़ जुट रही है जो कई तरह के मुखौटे लगाए हुए /हुयी हैं ...और वे निरंतर आपमें हताशा ,नैराश्य जनित आक्रामकता का ही संचार करेगें /करेगीं ..मैं स्वयं भुक्तभोगी रहा हूँ और इसलिए अपना प्रिय जानकर आपसे यह निवेदन कर रहा हूँ ..... आप अभी एक साधक भर है ,साध्य को साधिये ..व्यर्थ के साधनों में ही सारी ऊर्जा का अपव्यय मत कर डालिए ....अपनी प्रतिभा को फोकस कीजिये और लक्ष्य पर केन्द्रित होईये ..बस! मैं जानता हूँ आप चमत्कार कर सकते हैं ..अभी हाल की कविता ने मेरे मन मस्तिष्क पर आपकी प्रतिभा का एक अमिट छाप छोड़ा है! अपने को पहचानिए और आगे बढिए !

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  31. @ अमरेन्द्र,

    डॉ अरविन्द मिश्र के कथन को देख

    "मैं क्या देख रहा हूँ कि आपके इर्द गिर्द ,नैराश्यपूर्ण ,नकारात्मक लोगों की भीड़ जुट रही है जो कई तरह के मुखौटे लगाए हुए /हुयी हैं ...और वे निरंतर आपमें हताशा ,नैराश्य जनित आक्रामकता का ही संचार करेगें /करेगीं ..मैं स्वयं भुक्तभोगी रहा हूँ और इसलिए अपना प्रिय जानकर आपसे यह निवेदन कर रहा हूँ "

    उनकी इज्ज़त कम से कम मेरी निगाह में बढ़ी है ! आप दोनों के बीच मनमुटाव ( जैसा की मैंने महसूस किया ) रहा है , उम्र अनुभव में बड़े होने के बावजूद वे तुम्हे सम्मान दे रहे हैं ! यह मामूली बात नहीं !

    मेरा भी अनुरोध है कि आप अपने अध्ययन की तरफ ध्यान दें और ब्लॉग जगत में रचनात्मक प्रयास देते रहें ! जहाँ तक पुरानी दबी हुई बातों को, अगर कोई उभारता है तो भी आप संयम रखें जो ऐसा कार्य करेगा देर सबेर वह अपनी भूल महसूस जरूर करेगा !

    ब्लॉग जगत में एक से एक बेहतरीन लोग मौजूद हैं, अन्याय पर अवश्य बोला जाएगा!

    उत्तर देंहटाएं
  32. रवीन्द्र प्रभात उन टिप्पणियों को हटा दिया जिनमें उनकी आलोचना की गयी थी। लगता है उनको सिवाय तारीफ़ के और कुछ सुनने का अभ्यास नहीं है।
    मैं सोच रहा था कि क्या यह वही रवीन्द्र प्रभात हैं जिन्होंने वर्धा में माइक के सामने खड़े होकर कहा था:हम अच्छे बनें, धनात्मक रहें, खुश रहें। हम अपनी पत्नी को नहीं बदल सकते है, साथ जुड़े अन्य लोगों को नहीं। लेकिन हम प्रयास कर सकते हैं कि अपने आप को बदल सकते हैं। कई उदाहरण देते हुये उन्होंने बताया कि कैसे हम अच्छे विचार ब्लागर बन सकते हैं।
    यह कैसी धनात्मकता है जिसमें अपने खिलाफ़ बात सुनने का माद्दा नहीं है। जिस पोस्ट में उन्होंने अमरेन्द्र की टिप्पणियां मिटाईं उसमें अमरेन्द्र की टिप्पणी का जिक्र था। उनको अपनी बात कहने का मौका तो मिलना चाहिये। बहरहाल, उनकी मर्जी।

    इसमें कोई शक नहीं है कि रवीन्द्र बहुत मेहनत करके हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे में लिख रहे हैं। लेकिन यह भी उतना ही सही है कि जो वे लिख रहे हैं उसमें बेतरतीबपन भी बहुत है। जहां से मन आया शुरु हो गये। जहां मन आया वहां कहीं और हो लिये। उनका इतिहास लेखन राणाप्रताप के घोड़े चेतक की तरह इधर-उधर होता है:
    है यहीं रहा¸ अब यहां नहीं¸
    वह वहीं रहा है वहां नहीं।
    थी जगह न कोई जहां नहीं¸
    किस अरि–मस्तक पर कहां नहीं

    रवीन्द्रजी ने जो ब्लॉग के बारें में लिखा है उसमें शुरुआती दौर की बहुत सारी चीजें या तो छूट गयीं हैं या गलत लिखी हैं। कुछ पोस्टों में मैंने उनको बताया भी और जिसे उन्होंने सादर, सश्रद्धा स्वीकार करके सुधारा। लेकिन अब लगता है उनका आदर और श्रद्धा का कोटा पूरा हो लिया और वे अपने खिलाफ़ कुछ सुनना नहीं चाहते।

    लेकिन यह रवीन्द्र प्रभात और उनको भी समझना होगा जो उनके काम के बहुत प्रशंसक हैं कि रवीन्द्र प्रभात कोई पोस्ट मात्र नहीं लिख रहे हैं। वे जो लिख रहे हैं कल को हिन्दी ब्लॉगिंग में लोग संदर्भ के रूप में प्रयोग करेंगे। इसलिये उनकी जिम्मेदारी ज्यादा कि वे इस तरह बिदकने की बजाय चीजों को सही ढंग से लिखने की कोशिश करें।

    रवीन्द्र जी ने कल की एक पोस्ट में मेरा जिक्र करते हुये लिखा कि मैंने ब्लॉगिंग 2003 में शुरू की जबकि मैंने अगस्त 2004 में शुरुआत की। इसके अलावा उन्होंने न जाने कितने शुरुआती ब्लॉगों के लिंक छोड़ दिये। यह सब देखकर ही मैंने लिखा था कि रवीन्द्र प्रभात का इतिहास लेखन इतिहास लेखन - "हम जहां खड़े हो जाते हैं लाइन वहां से शुरू होती है" टाइप का है!

    बाकी क्या कहें। अमरेन्द्र को समझाइस के इतने इंजेक्शन ठुक चुके हैं इस पोस्ट पर कि उनको आगे और समझाइश देना उनके साथ अन्याय करना होगा।

    अरविन्द मिश्र जी एक से अधिक टिप्पणियों में अपनी बात तभी कहते हैं जब वे गुस्से में कहते हैं। लेकिन आज उनका गुस्सा समझाइशमय है (जन्मदिन की बधाईयों से खुश हैं न) इसलिये वर्तनी की कमियां कम हैं। लेकिन यहां उद्दरत चौपाई उनसे गड़बड़ हो ही गयी( टाइपो है भाई):
    सकल राम मय सब जग जानी (गलत)
    सीय राम मय सब जग जानी (सही)


    मुक्ति की बात से सहमत।

    पोस्ट की अन्तिम दो पंक्तियों में अमरेन्द्र का गुस्सा चरम पर है। लगता है अग्रज की आत्मा सवार हो गयी अनुज पर। :)

    उत्तर देंहटाएं
  33. उपर रवीन्द्र प्रभात के जिस वक्तव्य का जिक्र किया वह यहां है:
    http://chitthacharcha.blogspot.com/2010/10/blog-post_2315.html

    उत्तर देंहटाएं
  34. आचार्य जी!
    'सब रमायण हो गइल, सितवा केकर बाप!' की तर्ज पर प्रश्न पूछ रहा हूँ:

    'रायता' शब्द की व्युत्पत्ति कैसे हुई?
    इसका स्रोत क्या है?
    फैलाने के लिए रायता ही क्यों, दाल, कढ़ी, रसम वगैरह क्यों नहीं?

    उत्तर देंहटाएं
  35. प्रिय अमेरंद्र
    जब मैने ये कहा कि @ बेहूदा प्रेम प्रसंगों की विफलता से अपनी उर्जा और समय तो नहीं व्यर्थ करती । तो मै मान कर चली की प्रेम प्रसंग मे दो लोग होते ही हैं । मैने कब आक्षेप किया किसी एक पर । क्युकी मै किसी से भी ईमेल / फ़ोन इत्यादि पर ब्लॉग संबंधी बातो को ना तो पूछती हूँ ना जानना चाहती हूँ सो जो लिखा जाता हैं मै उस को पढ़ कर अपनी बात कहती हूँ । हां बेहूदा इस लिये कहा क्युकी प्रेम की इस रूप से निरंतर अनजान हूँ जिस मै प्रेम करने के बाद एक दूसरे को साप , बिच्छू , विष कन्या, कुतिया इत्यादि संबोधनों से अलंकृत किया जाता हैं । हो सकता हैं प्रेम का २ हज़ारिकरण हो ये ।
    जब मैने ये कहा की @ क्युकी आप की नज़र मे महिला को आवाज उठानी ही नहीं चाहिये उसके खिलाफ जो जो चाहे लिखे ।तो मेरा तात्पर्य था आप की उस पोस्ट से जो एक प्रकरण से जुड़ी थी और आप ने शायद अनूप के कहने से मिटा दी । उस प्रकरण से जुड़े तीन पोस्ट मिटा दिये गये और बात ख़तम होगई लेकिन विषाक्त मन मै हैं और रहेगी तो पोस्ट भी रहने देते । और अगर आप को या किसी को भी पूरी पोस्ट मिटने का अधिकार गूगल ने दिया हैं हैं तो रविन्द्र को टीप मिटा कर आगे बढ़ना का अधिकार क्यूँ नहीं हैं ??? {मै रविंद्रे की आलोचक हूँ पर कोई अपने ब्लॉग पर क्या करे ये उसका अधिकार मानती हूँ ।}

    एक प्रकरण से जुड़े लोग एक दूसरे पर लिख रहे हैं उसमे एक महिला हैं तो महिला कि तरफ हूँ ये आप का आक्षेप सही नहीं हैं ये आप कि सोच का धोखा हैं हां मै ये जरुर मानती हूँ कि अगर आप गाली दे कर अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं क्युकी आप पुरुष हैं तो ये अपराध नहीं हैं तो एक महिला को भी वही अधिकार हैं ।

    "क्या यह नहीं देखा जाना चाहिए उस पुरुष के अन्य उदाहरण हैं ऐसे अन्य महिलाओं के प्रति ?

    मै ऊपर कह चुकी हूँ कि मै किसी के भी संबंधो का आकलन करने ब्लॉग मै नहीं आयी हूँ जो लिखा जाता हैं पढ़ लेती हूँ । ब्लॉग को मै सोशल नेट्वोर्किंग के लिये नहीं मानती हूँ और ना ही आप को मै किसी सोशल नेट्वोर्किंग साईट पर मिलूंगी

    क्या यह प्रकरण 'जेनुइन' के समर्थन की मांग नहीं करता , स्त्री या पुरुष की वर्ग-दृष्टि से अलग निरपेक्ष होकर ..क्योंकि -
    महज किसी स्त्री का समर्थन करना स्त्रीवाद का समर्थन करना नहीं है !

    मेरी सोच मै नारीवाद का एक ही मतलब हैं समानता हर चीज़ मै । उस से ऊपर कुछ नहीं हां अगर चौराहे पर खड़े होकर किसी स्त्री के कपड़े नोचे जाए तो मै एक स्त्री होने के नाते सबसे पहले उसके साथ खड़ी होयुंगी क्युकी आज भी समाज स्त्री को ही डराता हैं और नंगा करता हैं । पुरुष को जिस दिन नंगे होने का भय होने लगेगा उस दिन प्रिय अमेरंद्र समानता आ जायेगी ।


    टीप कुछ लम्बी होगयी पर कहना जरुरी हैं सो आगे

    उत्तर देंहटाएं
  36. आप ने जितने भी लिंक दिये हैं उनकी याद हैं मुझ सो चलिये शुक्रिया कहना बनता हैं सो कह रही हूँ । आग्रह करती हूँ कि अपना साथ देते रहियेगा । और अंत मे कभी कभी हम गलत नहीं होते पर हम सही भी नहीं होते हैं । आप आप आकलन कीजिये

    उत्तर देंहटाएं
  37. इन बातों को पढ़ने के बाद ये लग रहा है कि आपमें न केवल सच कहने का साहस है बल्कि आप हिंदी साहित्य के बारे में अच्छा ज्ञान रखते हैं ... अच्छा लगा कि कोई सच कह रहा है !

    उत्तर देंहटाएं
  38. .
    .
    .
    उफ अमरेन्द्र... आह अमरेन्द्र... :(

    दोबारा यह सब क्यों कहा अमरेन्द्र... ?

    इस सब से नहीं कोई कहीं बदलेगा... ;)

    फिर काहे को अपना टाइम खोटी किया अमरेन्द्र... :))


    ऊपर लिखी टीपों से ही उड़ा कर लिख रहा हूँ...

    * अपनी प्रतिभा को फोकस कीजिये और लक्ष्य पर केन्द्रित होईये!
    * व्यर्थ के लोगों से उलझने में अपनी ऊर्जा का अपव्यय मत कीजिये!
    * अपने को पहचानिए और आगे बढिए !
    * अंतर्जाल पर आपके लिखे ने मेरे मन मस्तिष्क पर आपकी प्रतिभा की एक अमित छाप छोड़ी है, एक पाठक के तौर पर मैं आपको खोना नहीं चाहता!
    * रही बात चल रही चिरकुटी व नाइन्साफी की, तो ब्लॉग जगत में एक से एक बेहतरीन, इंसाफपसंद, व निडर लड़ाके मौजूद हैं, अन्याय पर अवश्य बोला जाएगा, आश्वस्त रहो !


    आभार!



    ...

    उत्तर देंहटाएं
  39. चलिये पूरा डेढ़ घंटे का समय उस काल में देकर जब मैं ब्लॉग जगत से लगभग कटी हुई हूँ आप पर एहसान तो किया ही है मैने अमरेंद्र।

    और लब्बो लुआब वही निकला जो सब पहले से कह गये कि ये सच कहने की जो बीमारी हो गयी है आपको, उसके लिये सुबह सुबह कोई टेबलेट लिया करिये। बैलेंस्ड दिनभर बना रहेगा। यहाँ लखनऊ के अलीगंज हनुमान मंदिर में हनुमान जी को कच्चे सिंदूर का चोला चढ़ाइये। १ साल के अंदर परिणाम स्वयं दिखाई देने लगेंगे।

    हँसी मजाक के इतर गंभीर बात ये है कि कहते सभी वही हैं जो आपने कहा। अभी कथा क्रम महोत्सव में जाने का अवसर प्राप्त हुआ और वहाँ ब्लॉग के विषय में जो विचार सुनने को मिले उससे दुःख ही हुआ। यद्यपि उन्हे कुछ नाम गिना आई कि आप इसे पढ़िये यहाँ कभी भी गलत नही लिखा जाता। सार्थक और ईमानदार लेखन होता है। तथापि कष्ट हुआ। कि हम यही छवि दे रहे हैं प्रिंट मीडिया क्या हर एक को। मगर एक बात बताओ मुझे ? ये इस तरह की टिप्पणियाँ करके वही विवाद फिर से नही पैदा कर रहे हो आप ?

    उत्तर देंहटाएं
  40. ईश्वर ने जो दिया है उसका सही उपयोग करिये। साहित्य में आप बहुत कुछ ऐसा दे सकते हैं, जो बहुत दिनो तक याद रखा जाये। ये विवाद अल्पजीवी हैं। इन्हें देख कर भी अनदेखा करना सीखिये।

    और हाँ आप का भी हाल वही हो गया है कि " रोज तौबा उठायी जाती है, रोज़ नीयत खराब होती है।" आप हर बार कहते हैं कि बस अब छोड़ दूँगा और फिर उसी कीचड़ में पड़ जाते हैं। ये आपके लिये अच्छा नही।

    शुभकामनाओं सहित।

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  41. ------ अब आभार-ज्ञापन कर लूँ , इसी में अपन की भी कुशल है :) ------
    @ गिरिजेश जी , प्रभो , हम तो आपकी बातों के अर्थ-निहितार्थ समझ लेते हैं लेकिन आप क्या कहना चाहते हैं , पाठक गण 'कन्फ्यूज' रहते हैं ! :) मैं कहाँ तक भाष्य दूंगा ! नहीं तो 'हिन्दी' पर गिरि-भाष्य प्रकरण चलाना होगा :) | ठीक है 'रायता' शब्द पर रायता फैलाना पडेगा ! :)
    @ संतोष त्रिवेदी जी , टीप से सम्बद्ध आप जैसी उदारता सबमें हो तो आनंद आ जाय ! काश ..!
    @ श्रीश जी , बटोही को बाट की पहचान हो गयी , यह भी जरूरी था न ! :)
    @ मो सम कौन , सर , इधर अब खचाक , उधर और ग़मों ग़मों की ओर चला . :)
    @ प्रवीण त्रिवेदी जी , संसार तो आपका ही है , सर्वत्र , भेद दृष्टि क्यों रखूं :)
    @ दीपक बाबा , हम भोंदू हैं चारों पर टिक मार दे रहे हैं :)
    @ हिन्दी-ब्लॉग-जगत , पसंद आया आपका ब्लॉग एग्रीग्रेटर . आप सही कह रहे हैं !
    @ रश्मि जी , जी यह तो है . यह काम पेचीदा है . बड़ा समय खपाऊ और फायदा नहीं चवन्नी भर का :)
    @ प्रवीण पाण्डेय जी , सोचिये झगड़ालू पोस्ट कहने में गूगल ने बड़ी सुविधा दी :)
    @ संजय झा जी , चलिए आपने अपनी टीप को एकपक्षीय तो कहा , अब रवीन्द्र जी को बेहतर की ओर प्रेरित कीजिये , मुझे यकीन है कि मेरी नहीं पर वह आपकी बात मानेंगे , उस दरबार में तारीफ़ ही सुनने का रिवाज है :)
    @ अल्पना जी , मुक्ति जी से मैं भी सहमत हूँ , उनकी बातें काबिले-अमल है ! आभार !
    @ ज्ञानदत्त जी , आपका 'नाइस' कहना नाइस लगा . ई फिजूलबाजी है , पर का करता , जरूरी भी लगा :(

    ...............जारी

    उत्तर देंहटाएं
  42. @ अरविन्द मिश्र जी ,
    स्नेहाधिक्य के लिए आभारी हूँ . आपने मुझमें यत्किंच श्रेष्ठता को देखा यह निश्चय ही आपकी कौतूहल-प्रद उदारता है . पर मुद्दा मैंने महत्वपूर्ण उठाया है . इस तरह समानांतर प्रतिवादी-संवादी स्वर का 'डिलीतीकरण' द्वारा गला घोंटना निरंकुशता है ! कम-से-कम भाषा के लोकतंत्र में यह निरंकुशता नहीं आनी चाहिए , तब जबकि मेरे ही कथ्य को प्रविष्टि का केंद्र बिंदु बनाया गया हो . ऐसी स्थिति में 'जबरा मारै - बोलै न देय' वाली रवीन्द्रीय सियासी पैतरेबाजी अक्षम्य थी . जील-मिसाइल की लांचिंग का वही सम्बन्ध है ! अन्दर का भार्गव ज्ञान-परशु को धिक्कारने लगता है , क्या करता ?/! अब उन गलियों में क्या जाना जहां 'प्राकृत जनों का गुणगान करना हो' ! आपने सलीम खान वाले पुरस्कार-प्रकरण और यहाँ भी गलत लोगों का पक्ष लिया है . दुःख होता है कि आप द्वारा प्रयत्न पूर्वक अर्जित ज्ञानराशि और सकारात्मकता को किस मजबूरी में कोई राहु-मंडल ग्रस लेता है . मुद्दे अपनी जगह हैं पर इसका मुझे सर्वाधिक दुःख है !

    अभी कुछ ही दिन पहले आपका जन्म दिन रहा . मुझे खुशी है . पिछली बार बड़ी खुशी से मैंने बधाई प्रेषित की थी . उससे कम खुशी इसबार भी नहीं है . जिजीविषा के पहाड़ पर हम प्रतिवर्ष एक सुन्दर छलांग लगा लेते हैं , यह स्वयं में ही बहुत सृजनात्मक और आह्लादकारी है ! इस बार भी ढेर सारी शुभकामनाएं ! आगे नव जन्म-वर्ष में आपको सफलताएं ( अच्छे कामों में ) मिलें : 'प्रबिसि नगर कीजै सब काजा | हृदय राखि कोसल पुर राजा ||'

    @ सतीश सक्सेना जी ,
    आपकी बात से सहमत हूँ ! बस इसी पर अनाश्वस्त हूँ कि -'' ब्लॉग जगत में एक से एक बेहतरीन लोग मौजूद हैं '' ! अत्यल्प से भी अल्प है :( || :)

    ..................जारी

    उत्तर देंहटाएं
  43. @ अनूप जी , मार्के का कोट लाये आप ! सोचिये कथनी और करनी में इतना पुरस्कार-योग्य अंतर :) वे महनत तो कर ही रहे हैं , यह इनकार करने लायक नहीं है पर उनकी बेतरतीबी और दृष्टि का अभाव भी ख़ास लक्षित करने योग्य है ! उन्होंने अपने पैमाने नहीं बताये - बस भिड़े जा रहे हैं ! दृष्टि हीन काम ऐसे होता है जैसे बिना नमक की बनी दाल या बिना इंजन के एक भारी सा मोटर !
    @ .....पोस्ट की अन्तिम दो पंक्तियों में अमरेन्द्र का गुस्सा चरम पर है।
    --- अव्यवस्था भाषा में भी नक्सलवाद पनपा देती है ! यही मानिए ! :) | अपने सम्बन्ध में यही कह सकता हूँ !

    @ रचना जी ,
    किसी को विषकन्या मैंने नहीं कहा बस एक स्थिति बताई जिसमें विषकन्या सदृश व्यवहार घटित किया गया हो किसी के साथ ! वैसे तो चाहता नहीं पर मैं चाहने के बाद भी इस तरह गाली नहीं बक पाता | अंगरेजी के जानकार ससम्मान गालियों को बकते हैं , और मुझे वह भी नहीं आती ! :(
    जो मुझे लगा , मैंने कहा और आपसे निवेदित किया . आपने संवाद - योग्य समझा , इसके लिए आभारी हूँ ! आपने अपनी बात रख दी है , दोनों पक्ष पाठकों के सम्मुख है . लोग निष्कर्ष तक जाने में समर्थ हैं ! मैं गलत होउंगा तो लोग मुझे ही गलत कहेंगे !
    हाँ , आगे भी नारी मुद्दे पर जहां कोई बहस होगी और कहने की स्पेस दिखेगी , यकीन मानिए लिंग-वर्ग-जाति से निरपेक्ष होकर अपनी बात कहूंगा ! लिंक के अनुसार आपकी पोस्ट पर गया था , वहाँ से सम्बद्ध बात वहीं कहूंगा ! आभार !

    ...................जारी

    उत्तर देंहटाएं
  44. @ इन्द्रनील जी , आपबीती कह दी , राम जाने सच-झूठ :) | शुक्रिया !

    @ प्रवीण जी , आपकी आश्वस्ति से खुशी हुई ! अब उसी लोक में जाता हूँ ! गुनीजनों की भी वही समझाईस है | ऊर्जा को बर्बाद करना ही है यह , और सुधरना कुछ नहीं ! आप लोगों के स्नेह ने ब्लॉग-जगत में भी उत्साह दिया और उसी पूंजी के साथ 'फोकस' हो जाता हूँ अपनी प्राथमिकताओं पर ! सादर......आभार !

    @ कंचन जी , निश्चय ही एहसान किया आपने ! खुद पर भी कहूंगा की आपको मुखर कर ही दिया , भले ही बरास्ते-उपद्रव :)
    हनुमान जी की साधना करूँ , कहीं बदले में लंका-दहन सिखा दिए तो :) | करेला नीम चढ़ा , वाली दशा हो जायेगी ! संतोषी मैय्या के दरबार में हमारी भी विनय-पत्रिका भेज दीजिये :)
    यह तो एकदम वही बात कही आपने जो मैं भी फेस करता हूँ . कोई पूछता है क्या कुछ लिखते हो ? कहता हूँ - ब्लॉग ! वह कहता है - बेकार का लेखन है वह ! वहाँ मैं अपूर्व ....आदि नाम देकर बताता हूँ इसकी शक्ति ! पर इस सच को ब्लॉग-स्पेस में भी न कहूँ तो अजीब लगता है ! पर यह सही है कि हम करने में लगें , कहने में नहीं ! या सब ऊर्जा का अपक्षय है , और कोई सुनने वाला नहीं ! हवा में मूके मारने जैसा फिजूल काम :)
    आपके विश्वास पर खरा उतरूं , ईश्वर इतनी शक्ति दे ! और कभी कहने लायक हो सकूँ - 'यह किया' ! नीयत-खराबी से बचूंगा , बहुत हो चुका ऐसा अनुभव , अगली बार ऐसा नहीं होगा :) सादर........आभार !
    -------------------

    ---- आदरणीय प्रबुद्ध ब्लागरों , अब स्टुडेंट कंसेसन दीजिये और बहस से मुझे अलग रहने का आशीष :) | आप सबसे बहुत सीखा | अपनी अंतर्मुखी दुनिया के बाहर व्यावहारिक जगत में भी इतना नहीं रमा (?) जितना इस ब्लोग्बुड में , यह मेरी सीमा भी थी , क्या पता मेरी शक्ति भी बन जाय ! :) || ----

    .............समाप्त !

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  45. यह अंत नहीं शुरूआत है
    और आपने शुरूआत में ही
    कर दिया है समाप्‍त।

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  46. @ रोज तौबा उठायी जाती है,
    रोज़ नीयत खराब होती है।

    वाह! क्या बात कह गईं कंचन जी! मैं भी इन महाशय को 'हिन्दी' ब्लॉग पर लिखने को कह कह पगला गया हूँ लेकिन ये हैं कि ....।

    कल Chimamanda Adichie को पढ़ कर मुग्ध हुआ और आज आप की टिप्पणी पर।

    एक बार पुन: वाह!

    सादर ,

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  47. इस प्रकरण पर सतीश पंचम के ब्लॉग पर दी टिप्पणी यहाँ भी देना प्रासंगिक है, अतः दे रहा हूँ !

    @ सतीश पंचम ,
    अमरेन्द्र की वह टिप्पणी "अत्यल्प को छोड़कर पूरे ब्लॉगजगत का लेखन स्तरहीन है " पर रविन्द्र प्रभात की समझ थी कि अमरेन्द्र अपने आपको छोड़ कर बाकि लोगों को स्तरहीन लेखक बता रहे हैं !

    अमरेन्द्र की टिप्पणी में वर्णित सत्य, ब्लाग जगत का सत्य नहीं तो और क्या है ??
    अफ़सोस यह है कि यहाँ कोई भी, किसी को ध्यान से पढता ही नहीं है ! बेहतरीन लेखों के साथ शायद ही कोई न्याय कर पाता है ! इसी क्रम में मैंने भी रविन्द्र प्रभात के बारे में, उनकी कई बार तारीफ़ की थी कि वे एक नीरस और उबाऊ काम कर, हिंदी का भला कर रहे हैं !

    सरसरी और सतही पठन के कारण हम जैसे भी, अच्छी टिप्पणियां नहीं दे पाते तो औरों की स्थिति समझना मेरे लिए अधिक मुश्किल नहीं, यह यहाँ की त्रासदी नहीं तो और क्या है ?
    रविन्द्र प्रभात की अमरेन्द्र के बारे में उपरोक्त समझ भुलाई जा सकती थी मगर उसके बाद टपक गिरधारी ने वहां आकर जे एन यू में मेरी अनूप शुक्ल के साथ अमरेन्द्र की मुलाक़ात पर ही प्रश्न उठा दिया ... बहुत लम्बी इस टिप्पणी में कहा गया था कि मैं वहां अमरेन्द्र को टिप्पणियों के लालच में पटाने/ चमचा गिरी करने गया था ...और रविन्द्र प्रभात ने इस टिप्पणी को प्रमुखता से प्रकाशित ही नहीं किया अपितु उस के समर्थन में आयीं अन्य टिप्पणियों को भी महत्व दिया जो विषय से सम्बंधित ही नहीं थी !

    बाद में मेरी शिकायत पर, अविनाश वाचस्पति के हस्तक्षेप के कारण वह वहां से हटाई जा सकी !

    अमरेन्द्र, उम्र में मेरे बेटे से भी छोटा है और मेरे ब्लॉग पर शायद उसकी आमद न के बराबर है ! और दिल्ली में रहते हुए मैं उससे कभी नहीं मिला था...मगर इस प्रतिभाशाली लेखक से मैं यकीनन प्रभावित हूँ अतः उससे मिलने की इच्छा दिल में थी ! उस दिन अचानक अनूप शुक्ल के आगमन की सूचना मिलने पर "एक पंथ दो काज " के कारण मैं जे एन यू गया था जो कुछ थर्डग्रेड ब्लागर महोदय हज़म नहीं कर पाए और टपक गिरधारी बनकर वहां टिप्पणी पेल दी !

    अफ़सोस यह था कि रविन्द्र प्रभात ने वह टिप्पणी प्रमुखता के साथ प्रकाशित की बिना यह सोंचे कि इससे सतीश सक्सेना आदि निरपराध लोग भी कष्ट महसूस करेंगे !

    ख़राब टिप्पणी, जिसमें किसी के अपमान करने का प्रयत्न किया गया हो, छापनी ही नहीं चाहिए और अगर छपती है तो उसकी जिम्मेवारी ब्लॉग व्यवस्थापक की ही होनी चाहिए !

    मुझे लगता है असल मकसद खेमों की लड़ाई का है , अनूप शुक्ल से मिलने का अर्थ उनके विरोधियों से दुश्मनी माना जाना है, यह मान्यता एक महा मूर्खता है इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं ...

    औरों की तो नहीं जानता मगर मैंने अपनी पीठ पर किसी का नाम नहीं लिखने दिया है ब्लॉग जगत में मेरे परम मित्रों में डॉ अरविन्द मिश्र, समीर लाल, अनूप शुक्ल, पी सी रामपुरिया, अमरेन्द्र त्रिपाठी, अविनाश वाचस्पति शामिल हैं , और उम्मीद करता हूँ कि मैं इन सबकी शानदार अच्छाइयों और विद्वता का फायदा लेता रहूँगा, साथ ही कोशिश होगी भी कि बारबार विरोधी ध्रुवों को साथ बैठने में कामयाब रहूँ ताकि ब्लॉग जगत एक साथ, बिना खेमों में बँटे, इनका फायदा उठा सके !
    रविन्द्र प्रभात जी से निवेदन है कि वे आलोचना को स्वस्थ द्रष्टि से ग्रहण करेंगे जिससे उनका योगदान ..वाकई अच्छा योगदान बने !

    अंत में, आपकी स्पष्ट आवाज और अन्याय के खिलाफ विरोध करने की शक्ति को मेरा प्रणाम सतीश पंचम !

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  48. अमरेन्द्र जी,
    माफ़ कीजियेगा, देर से इधर आया…
    आपने मेरी टिप्पणी यहाँ दर्शाई इसका धन्यवाद, वैसे मुझे टिप्पणियाँ डिलीट करवाने का खासा अनुभव है… :) इसलिये अपन ज्यादा बुरा नहीं मानते…

    अब बात निकली ही है, तो बेशर्मी से खुद ही मियाँ मिठ्ठू बन जाता हूं - मेरी विचारधारा और मेरा लेखन, बहुतों को नापसन्द है… हुआ करे… यह लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन इस पसन्द-नापसन्द को यदि कोई तथाकथित "इतिहास-लेखन" में भी शामिल रखे तो कैसे काम चलेगा? माना कि मैं गुटबाजी नहीं करता, समयाभाव के कारण अधिक "वाह-वाही" टिप्पणियाँ नहीं करता, आर्थिक अक्षम हूं इसलिये ब्लॉगर मीटिंग भी आयोजित नहीं करवा सकता, खामखा की हीही-ठीठी वाली पोस्टों पर समय खराब नहीं करता… क्या इसका मतलब ये है कि मैं "हिन्दी ब्लॉगर" ही नहीं हूं?

    आप ब्लॉगिंग का "तथाकथित इतिहास" उठाकर देख लीजिये कि "महाजाल" नामक ब्लॉग जिसके 1000 से अधिक सब्स्क्राइबर, 400 से अधिक फ़ॉलोअर, 500 से अधिक पोस्ट हैं… उसका उल्लेख कहाँ और कितनी बार हुआ है, जबकि अण्टू-फ़ण्टू ब्लॉगों का फ़ोटो-इंटरव्यू सहित लाइव टेलीकास्ट हुआ है… फ़िर भी कोई कहे कि…… गुटबाजी नहीं है, आपसी स्नेह बना हुआ है, हम एक परिवार की तरह हैं… ब्ला-ब्ला-ब्ला-ब्ला-ब्ला… तो वह पुनर्विचार करे…

    और हाँ, इस टिप्पणी से किसी को बुरा लगा हो तो मेरी बला से… मुझे इसकी भी आदत है… :) मैं अपनी इस बात पर कायम हूं कि "हिन्दी ब्लॉग जगत - तू मेरी खुजा, मैं तेरी खुजाता हूं - पर ही निर्भर है, अभी परिपक्व होने मे समय लगेगा…

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  49. @SURESH CHIPLUNKAR....

    DIRECT STRAIGHT DRIVE.....AUR BALL
    PAVELION SE BAHAR....AB GAR ISE KOI
    CATCH BHI KARTA HAI TO ..... SIXER
    HONE SE NAHI ROK SAKTA......

    SALLUTE TO YOU......

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  50. wrt satish saxena last comment

    बाद में मेरी शिकायत पर, अविनाश वाचस्पति के हस्तक्षेप के कारण वह वहां से हटाई जा सकी !


    शायद अब आप समझ सकेगे की ब्लॉग जगत मे ग्रुप हैं और जिनका पी आर हैं वो टीप हटवा सकते हैं । लेकिन वही लोग अपने दोस्तों को कभी कुछ नहीं कहते । आप यहाँ जा कर प्रमाण देख सकते हैं ।http://suratikavialbelakhatri.blogspot.com/2010/12/blog-post_10.html
    रविन्द्र के ब्लॉग पर सतीश को कुछ खराब लगा टीप मे अपने लिये सो अविनाश के जरिये टीप हटाई गयी ।
    जब मैने आप से कहा था की रविन्द्र जील को नहीं कहेगे तो भी यही वजह थी रविन्द्र और अरविन्द का अपना सम हैं और बाकी आप समझदार हैं

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  51. @ रचना जी , बहस को अलविदा कह चुका हूँ तथापि ... गया था वहाँ , आपकी बात से इनकार नहीं कर सकता कि पीआर वाले यह सब तो कर लेते हैं , और यह भूल जाते हैं कि जिनके पीआर न हों ( या जो पीआर द्वारा ऐसा करना न चाहते हों ) वे अनुपयुक्त बातों को ढोने के लिए मजबूर हैं ! ब्लॉग जगत में लोग दूसरों के लिए भी महान बन कर सोचेंगे , यह उम्मीद नहीं की जा सकती !

    @ जब मैने आप से कहा था की रविन्द्र जील को नहीं कहेगे तो भी यही वजह थी रविन्द्र और अरविन्द का अपना सम हैं और बाकी आप समझदार हैं.
    ---- जील को मैंने रवीन्द्र का सियासी तीर कहा था तो यह बात हवा में नहीं कही थी , कारण - जील चुन चुन कर वहाँ जाती हैं जहां मैं एक लफ्ज भी रखता हूँ और सम्बद्ध व्यक्ति तक सहज संपर्क साधती हैं . तत्संबंधी गुटबाजी में यही होता है और मैंने सही पकड़ा था ! आप समझने का यत्न करेंगी तो देखिये , आप द्वारा लक्षित रवीन्द्र-अरविन्द सन्दर्भ की परख के निमित्त भी , उसी लिंक पर सेकेण्ड लास्ट और थर्ड लास्ट टीप में की गयी बातें ! यह लिंक फिर रखता हूँ :
    http://www.parikalpnaa.com/2010/12/blog-post_16.html

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  52. वैसे तो मैंने अपनी आपत्ति रविन्द्र जी की पोस्ट पर दर्ज करा दी है अब वो चाहे उसे प्रकाशित करे या न करे .
    रविन्द्र जी उस लखनऊ ब्लागर्स असोसिएसन के अध्यक्ष है जिस के संयोजक सलीम खान जी है जो अपनी पोस्टो के लिए कुख्यात है . इन्हे पहले अपना घर सुधारना चाहिए

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  53. bhai amrendarji

    aap sahitya sadhak hain ......
    aap bhi shabd prapanchak ke chakra me
    phaste nazar aayenge to ?

    bujhi chingari ko mat hawa dijiye....
    pleae.....aapka sammohit pathak.

    sadar

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  54. @ संजय झा जी ,
    संयोग से इस पोस्ट पर की अंतिम तीन पंक्तियों पर आपकी बात जाती है , तो यही कहूंगा की यहाँ भाषा ऐसी क्यों ? - इसके मूल में जाएँ ! और जिस 'अलग' सन्दर्भ के मद्देनजर आपने बात कहीं है , उस 'अलग' जगह पर मैं अपनी बात कह आया हूँ ! आभार !

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  55. आपका लेख और उस पर ५६ तर्क पढ़े.विवाद में तो नहीं पड़ना चाहता परन्तु इतना कह सकता हूँ कि,आपका मूल निष्कर्ष सही था.क्या हुआ यदि गलत मूल्यांकन में अपना नाम नहीं आया?चूंकि मैं तो स्वान्तः सुखाय और सर्वजन-हिताय लिखता हूँ तथा यह परवाह नहीं करता -लोग कमेन्ट करें या न करें -अपनी बात रखता जाता हूँ.वैसे यह भी आपका कहना सही है -विदेश में बैठा ब्लागर हस्तक्षेप कर रहा है.सच कडवा होता है.कठोर प्रतिक्रियाएं तो मिलनी ही थीं.

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  56. @ विजय माधुर जी ,
    पधारने का शुक्रिया ! पूरा पढ़ने के उपरान्त आपको यही लगा कि यह सब मेरे नाम के न आने की खुन्नस थी , तो मैं आगे कह भी क्या सकता हूँ . कहीं कोई पूर्व-आग्रह न रखें . मैं चर्चा लोभी नही रहा हूँ , नहीं तो यह सब न लिखता क्योंकि चर्चा का ठेका तो वही लोग लिए हैं और भविष्य भी वही गढ़ेंगे न ! सादर..

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  57. साल भर बाद इस पोस्ट को फ़िर से पढ़ा! तमाम सारी बातें फ़िर से याद आयीं। आज फ़िर से मामला उसी तरह चल रहा है लेकिन -अब न रहे वे कहने वाले! :)

    मजा आया इस पोस्ट को दुबारा बांच कर!

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