गुरुवार, 12 अगस्त 2010

कविता का दाय ? , या इलाही ये माजरा क्या है ? ..


??????? :- ब्लागरी जिसमें कमेन्टरी भी है , उसे समय की हलचलों से साक्षात्कार और उससे बावस्तगी का माध्यम भी मानता आया हूँ | इसलिये कुमार विश्वास को लेकर जुटे (अंध)भक्तों के समक्ष कुछ बातें रखना अनुचित नहीं होगा।

विगत माह भर से इस इन्टरनेट पर जिस एक मुद्दे पर उलझता रहा , वह है तथाकथित कवि कुमार विश्वास के 'काव्यत्व' पर लोगों तक अपनी असहमतियों को संप्रेषित करना | इसके लिए मैंने लोगों से 'सस्ती लोकप्रियता के प्रति सोच के आग्रह' की बात की थी | मैंने अपनी असहमतियां रखी थीं पर उसपर उनके प्रशंसकों के रोष-रुदन और गालियों ने बड़ा ही अजीब असंवाद का माहौल बना दिया | प्रतिक्रया में मेरा भी स्वर यत्र-तत्र तिक्त हुआ , जो कि बेशक नहीं होना चाहिए , परन्तु जिस स्तर की गालियाँ ई मेल से भेजी गयीं और  खामखा के गलत आरोप जड़े गए , वे किसी के भी धैर्य की परिक्षा के लिए काफी थे !

इन प्रशंसकों के सम्मुख मैंने यह भी रखा था --- ''  व्यक्ति की सकारात्मकता और संभावनाओं में मुझे सदैव विश्वास रहा है , इसलिए इससे भी इनकार नहीं करूंगा कि भविष्य में कुमार विश्वास अच्छा नहीं लिख सकता , अगर वह अच्छा करता है तो ‘प्रसिद्धि’ और ‘श्रेष्ठता’ दोनों एक ही व्यक्ति में मिलेगी , यह भी कम खुशी की बात नहीं , पर जो सीन इस समय है उसकी कविता की , वह असंतोषजनक और आपत्तिजनक है ! लेकिन अच्छा करने के लिए उसको अपनी आलोचनाओं को सकारात्मक ढंग से लेनी चाहिए ..'' ! इसकी भी एक झलक हो जानी चाहिए !

एक झलक भर :- इसके बाद भी जो इनके प्रशंसकों का जो रुख था उसको उनके एक प्रशंसक उचित अवस्थी की ज़ुबानी में रखना ज्यादा सही होगा | JNU में हुए कुमार विश्वास के एक परफार्मेंस की याद दिलाते हुए उचित अवस्थी फरमाते हैं --- '' @अमरेन्द्र... उन्हें तो पता भी नहीं होगा आप के इस अखंड विधवा विलाप का. .........जब आप की चेतना पर डॉ साहब का जनसमूह से सत्यापित बुलडोज़र चला था. .......जल्दी ही JNU की उसी छत से शायद नया गोरख पाण्डेय मिल जाये......और हाँ डॉ साहब अगली बार आगरा में किसी को ढूंढने जायेंगे तो आप ज़रूर मिलोगे........ पुरुष ही थे तो तब एक बार ज़रा खड़े हो कर ये सब बोल देते उस दिन जब आप की ही चटाई पर आप का मुंडन कर गए थे वो , वहीँ कारसेवा हो जाती..........इलाहाबाद इतना ज़रूर सिखाता है की ले कैसी और दे कैसी.......'' .. यद्यपि ये उचित जी ही इसके पूर्व की एक टिप्पणी पर अपने नामानुरूप एक उचित बात कह चुके थे --- '' ....... और तो और आप के ही परिसर मे वो एक स्टार की तरह आये.थैले भर रूपया, तीन घंटा भर का धमाल और पीछे भागती भीड़ बटोर कर अगले मंच पर चल दिए. आप के यहाँ के एक इरफ़ान साहब हैं ,इस बार भारत आने पर उन्होंने जो सी डी दी थी JNU की उस मे तो भाई ने धुंआ कर दिया था. ......'' इसके बाद इनकी बात पर मैंने अपनी तरफ से एक टिप्पणी लिखी थी --- '' @ ……आपने लिखा – JNU में .” थैले भर रूपया, तीन घंटा भर का धमाल ” — लग रहा है कि किसी ”गुड पोयट” नहीं बल्कि किसी आइटम-बाज की हकीकत उसी के अंध-भक्त ने रख दी .. मैंने भी तो यही कहता आया हूँ कि वह ‘गुड पोयट’ नहीं बल्कि ”गुड थैला-बाज या धमाल-बाज ” है ! .. जैसे भी सही , रोष-रुदन में ही सही पर आपने कम-से-कम यह कबूला तो .. आभारी हूँ मित्र इसके लिए आपका !! '' 
यह मैंने एक नजारा पेश किया कि कुमार-प्रशंसक इतने धैर्यहत प्रजाति के हैं ! सोचने की जरूरत ही नहीं महसूस करते , ऐसी स्थिति में 'उचित अवस्थी' को एक अंधभक्तों की जाति-वर्ग  का प्रतीक माना जाना चाहिए ! उनके अन्य प्रशंसक भी प्रशंसा के सोपान-क्रम में भले ऊपर नीचे हों , पर आलोचना को लेकर अनुदारता कमोबेश सभी में है , ठीक यही अनुदारता कुमार विश्वास के अन्दर भी है , उन्होंने मेरी आलोचना के कमेन्ट को स्वयं डिलीट करके इस बात का परिचय भी दे दिया है | उनके लिए कविता बाज़ार में बेची जाने वाली वस्तु मात्र है |

कुमार विश्वास की सकारात्मक्ताएं/सफलताएं  :- कुमार विश्वास की ये सकारात्मक्ताएं भी हैं - 
१, ईश्वर ने उन्हें सुन्दर गला दिया है , जिससे वे अपनी कविताओं को कर्ण-प्रिय बना लेते हैं |  
२ , जनता के मूड के हिसाब से अपने आपको बदलने में माहिर हैं | तालियों को बटोरने के सारे हथकंडों पर अच्छी पकड़ |
३ , विज्ञान-वर्ग के छात्रों तक हिन्दी कविता (?) को पहुचाने का काम किया | बाजारी ढंग से ही सही | 
४ , बम्बइया द्वि-अर्थी संवादों की तर्ज पर ही सही पर हिन्दी कविता (?) को एक बड़े युवा-वर्ग के कानों-कानों तक घुसाया |
५ , अब तक के हिन्दी कवियों में आधुनिक तकनीक ( इन्टरनेट ..आदि ) का सबसे ज्यादा लाभ ले सकना | 
६ , स्वयं कथित अपनी कविता में कविता से इतर पुनरुक्तिदोष-पूर्ण  चुटकुलेबाजी को सफलता-पूर्वक चला देना 
७ , एक कवि से इतर परफार्मर के लक्षणों से पूर्ण होना |
८ , विदेशों में रह रहे भारतीयों की ओर 'कवि' के वेटेज के साथ तीव्रता के साथ बढ़ने की दूरदर्शिता |
९ , कुछ भावुक मसलों पर कविता लिखने की कला इनके पास है जिसमें दोयम दर्जे की कविता पर भी भावुक 'माइलेज' मिल जाता है |

कुमार विश्वास की नकारात्मक्ताएं/सीमाएं/असफलताएं :- ये भी बिन्दुवार ढंग से इस प्रकार हैं - 
१ , एक सफल 'परफार्मर' के तौर पर कुमार विश्वास भले लगते हैं पर खामखा को 'गुड पोयट' ( Its better to be a 'good poet ' than a bad engineer - का उद्घोष जाने कितनी बार ..को देखते हुए  ... ) कहना और उसके अनुकूल कवितायें न रख पाना / लिख पाना , उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है |
२ , एक अच्छे कवि में जो काव्य-विवेक होना चाहिए वह उनमें नहीं है | उनके लोकप्रिय होने की इच्छा ने उनके काव्य-विवेक को मार दिया है |
३ , उन्हें प्रसंगानुकूल और उचित  शब्दों का प्रयोग करना नहीं आता जो कि एक कवि के लिए बेहद जरूरी चीज है | 
४ , इस गीत ---   http://www.youtube.com/watch?v=Z01tIg6SS8A&feature=autofb  , में ऐसा देखा जा सकता है | अनूप शुक्ल जी का उचित ही कहना है - '' कवि हिमालय को ''बौना'' बनाये बिना भी शहीद को महान बता सकता था। हिमालय से अनुरोध करता तो वह शहीद के सम्मान में अपना माथा झुका देता। उससे कहते तो वह शहीद की याद में नदियों के रूप में बह जाता। लेकिन शायद कवि मजबूर है। उसका काम हिमालय को बौना बिना चल नहीं पायेगा। '' ... बाद में बात संज्ञान में आयी कि इसी गीत में उन्होंने शहीदों के लिए ''कंचनी तन '' शब्द-युग्म  का प्रयोग किया है | ''कंचनी'' शब्द का अर्थ वेश्या होता है , और इसी अर्थ में अब तक हिन्दी लेखन में प्रयुक्त होता आया है | क्या इसे भी शहीदों की शान में माना जाय ? , भयानक चूकें हैं ये सब ! , फिलहाल कुमार के पास शब्द और बिम्ब रख पाने की काबिलियत नहीं है | काव्य-दोषों से भरी है इनकी कविता ! 
५ , इस गीत ---  http://www.youtube.com/watch?v=A39xtbeaL70 , को देखा जाय | इसमें विदेश में जाकर ''आलिन्द '' शब्द के गलत अर्थ को न केवल कविता में बल्कि मुंह से बोल-बोल के बता रहे हैं कुमार विश्वास | इसका अर्थ कह रहे हैं - 'आँगन ' | गृह-स्थापत्य में आलिन्द घर के बाहर दरवाजे के बाहर की ओर के मैदान में उंचा उठा चबूतरा है ! अर्थ कितना भी खिसकेगा तब भी 'आलिन्द' दरवाजे के बाहर ही रहेगा | यह भी एक प्रमाण है उनके क्षीण शब्द ज्ञान  का ! 
६ , उनकी काव्य पंक्ति 'भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा' पर भौंरा और कुमुदनी की असंगति पर मैं पहले ही अपनी बात यहाँ रख चुका हूँ ---  ' सोच के आग्रह ' के रूप में ! 
७ , कविता में असली शक्ति के अभाव में 'नेम ड्रापिंग' का चस्का भी है कुमार विश्वास को | इस जगह देखें ---              http://www.youtube.com/watch?v=H5wtV9PpJPw&feature=related | यहाँ ग़ालिब जैसे अति लोकप्रिय शायर के बहु-उधृत  शेर को गलत पढ़ रहे हैं , उनका आत्म-विश्वास भी देखने लायक है | अज्ञानता के आत्मविश्वास को इतनी सफलता पाते मैंने और कहीं नहीं देखा था | कुमार साहब पढ़ रहे हैं --- ''  मत पूछ की क्या हाल है मेरा तेरे आगे / तू देख के क्या रंग है मेरा तेरे आगे ! '' जबकि महान शायर ग़ालिब का यह खूबसूरत शेर इसतरह है --- '' मत पूछ के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे / तू देख के क्या रंग तेरा मेरे आगे // '' | ''पीछे'' को रखे बगैर इस शेर का तुक नहीं बन रहा और यही शब्द गायब करते हैं ये |  ऐन इसी वक़्त कुमार विश्वास जी के प्रशंसक गौतम राजरिशी जी की बात को भी रखना अनुपयुक्त न होगा --- ''  ( कुमार साहब ) हिंदी के रीतिकालिन कवियों से लेकर ऊर्दु के लगभग हर उन शायरों को जिन्हें आपने पढ़ा है, वो उनकी रचनायें, उनके शेर बकायदा संदर्भ सहित सुना सकते हैं। ''
८ , कुमार विश्वास अपने समकालीन रचनाकारों का आदर करना तो दूर उनपर आपत्ति जनक कमेन्ट भी करते रहते हैं | बुकर जैसे बड़े सम्मान को पा चुकी अरुंधती राय की सृजनशीलता को देखने की इनकी दृष्टि ज़रा देखिये यहाँ ---  http://www.youtube.com/watch?v=D9uzD4jLshI  | किसी लेखिका को यह कहना कि वह अपने जीवन के अश्लील प्रसंगों को लिखकर फेमस हो कर बुकर सम्मान पा गयी , उस लेखिका के साथ अन्याय है | यह तो लांछन लगाना है , कुमार की कुंठा व्यक्त होती है यहाँ | जिन लोगों को मैं कुंठित लग रहा हूँ उनको यहाँ पर भी कुंठा को देखना चाहिए और फिर 'कुंठा' पर पुनर्विचार करना चाहिए | अरुंधती जी चाहें तो मानहानि का दावा भी कर सकती हैं | अगर विभूति नारायण राय द्वारा 'छिनाल' शब्द का प्रयोग आपत्तिजनक हो सकता है तो यहाँ भी जो कहा गया वह कम आपत्तिजनक नहीं ! ऐन इसी वक़्त पर कुमार विश्वास के प्रशंसक अपूर्व शुक्ल जी की बात रखना चाहूँगा --- '' उनकी विद्वत्ता, उनकी प्रत्युत्पन्नमति और उससे भी अधिक उनकी सरलता प्रभावित करती है.'' | क्या विद्वत्ता , सरलता आदि गुण व्यक्तित्व की सर्वांगीणता में नहीं होने चाहिए ! 
९ , प्रत्युत्पन्नमति के रूप में उनकी सराहना भी मुझे अतार्किक लगती है | उनके यहाँ सस्ती चुटकुलेबाजी दिखती है | प्रत्युत्पन्नमति वह है जो किसी भी नयी बात पर एक नए तरीके से ‘ह्यूमर’ की नवीनता के आग्रह को व्यक्त करती हुए सामने वाले को प्रभावित करे | इसमें मुख्यतया नयेपन का आग्रह है | चुटकुला जाने कितनी बार और कहाँ कहाँ बोला जाता है , इसका भी अपना महत्व है , पर यह वह नहीं है , कुमार तो एक चुटकुले को अधिकाँश परफार्मेंस में औंटते रहते हैं | उसमें प्रत्युत्पन्नमति का कमाल नहीं , सस्ती चुटकुले-बाजी का धमाल है ! इनकी चुटकुले-बाजी भी अधिकांशतः निकृष्ट कोटि की है जिसपर वह भूरि-भूरि यौनिकता/अश्लीलता की छाया रखने की कोशिश करते रहते हैं ! द्विअर्थी संवादों की कोटि का प्रयास ही रहता है उसके यहाँ |
१० , कुछ लोग कुमार विश्वास की प्रसिद्धि को उनकी श्रेष्ठता भी मान लेते हैं | तालियों की बटोर और अंतर्जालिक 'डाउनलोड' जैसी चीजों को उनकी श्रेष्ठता बताते हैं | डाउनलोड होना किसी श्रेष्ठता का सूचक नहीं , अश्लील फ़िल्में या दृश्यों के टुकड़े तो बहुत डाउनलोड होते हैं पर वे ‘श्रेष्ठ’ फिल्म या दृश्य नहीं कहे जाते | गुलशन नंदा के उपन्यास प्रेमचंद से ज्यादा बिकते हों तो इसका मतलब यह नहीं कि गुलशन नंदा प्रेमचंद से बड़े या श्रेष्ठ कथाकार भी हुए | ‘प्रसिद्धि’ और ‘श्रेष्ठता’ दो अलग अलग चीजें हैं |
११ , कुमार विश्वास मंचीय कविता की उस गौरवशाली परम्परा के साथ भी अन्याय कर बैठे हैं , जिसमें लोकप्रियता के साथ जन-पक्ष-धरता थी | ६२' के चाइना युद्ध पर सफल मंचीय कवि गोपाल सिंह नेपाली की पंक्तियाँ जनता के लिए कंठहार बन गयी थीं | कुमार की कविता में प्रसिद्धि होने के बाद भी सामाजिक सकारात्मकता नहीं है | कुमार , बच्चन-नेपाली-नीरज-रमानाथ अवस्थी-सोम ठाकुर आदि की सफल और उपयोगी मंचीय परम्परा के वाहक नहीं हैं | कुमार को अगर किसी की परम्परा से जोड़ा जा सकता है तो गुलशन नंदा - वेद प्रकाश शर्मा के ऐयारी गद्य की काव्यात्मक प्रवृत्ति के तौर पर बनने वाली परम्परा से जोड़ा जा सकता है जिसके लिए कविता विशुद्ध ऐशो-आराम की चीज रही हो | हुल्लड़ और कुल्हड़ कविता के दाय नहीं हो सकते | 
१२ ,  कुमार को चाहिए कि जैसा मन कहे वैसा लिखें पर स्वयं को 'कबिरा दिवाना था , मीरा दिवानी थी' की परम्परा में रखकर हिन्दी का 'गुड पोयट' कहकर इस परम्परा के साथ अन्याय न करें | कबीर तो 'निंदक नियरे राखिये' कहते थे और ये तो अपनी की गयी समालोचना को भी बर्दाश्त नहीं कर पाते | कविताई पर प्रश्न खडा करने वाले कमेन्ट तक डिलीट कर देते हैं | 
--- कुमार की कवितायें मैंने कविताकोश पर देखीं पर उनमें श्रेष्ठता का नितांत अभाव लगा और अब प्रसंग लंबा हो रहा है , और अगर इतनी आलोचना किसी को समझ में नहीं आ पाए तो शास्त्रीय आलोचना भी समझ से परे होगी | और इसके लिए मैं कुमार से पहले हिन्दी ब्लॉग जगत में ही मौजूद  जाने कितने कवियों को चुनूंगा , जो ज्यादा दावा रखते हैं अपनी कविता पर बात होने के लिए | मेरा यह प्रयास कुमार की 'प्रसिद्धि' और 'श्रेष्ठता' का 'मिसमैच' कर रहे लोगों में सोच के आग्रह भर का था और यह मुद्दा मैं गौतम जी की पोस्ट से उठाये हुए था , इसलिए भी आज इस पोस्ट तक चला आया |

निष्कर्ष  :- निष्कर्ष के तौर पर मैं  अनूप भार्गव जी की बात को रखना चाहूँगा --- 
१) '' मुझे शिकायत सिर्फ़ इस बात से है कि वह कवि सम्मेलनों में भीड़ तो जुटा रहे हैं लेकिन कवि सम्मेलनों को कविता से दूर ले जा रहे हैं । यदि आप यह मानते हैं कि उन की प्रस्तुति में जो ९०% से अधिक होता है , वह कविता है तो मुझे आप से कुछ नहीं कहना है । ''
२) ''अजीब बात है कि वह ’ प्रतुत्त्पन्मति’ से उसी परिहास को हर कवि सम्मेलन में बार बार जन्म दे देते हैं । कुछ परिहास तो पहले से ही अन्य कवियों द्वारा रचे हुए होते हैं , उन्हें सिर्फ़ दोहराना होता है । कविता को तो कवि से जोड़ा जा सकता है लेकिन इन परिहासों को किस से जोड़ा जाये ? जिस नें पहले सुना दिया उसी के हो गये । नीरज जी भी ’कारवां गुज़र गया’ को बार बार सुनाते हैं लेकिन
१) वह गीत उन का अपना होता है और
२) अच्छी कविता को कई बार सुना जा सकता है , ’मैं आप को आगरा में ढूँढ रहा था’ पर बार बार हँसना मुश्किल होता है । ''
--- इसप्रकार कुमार विश्वास को कोई सफल परफार्मर कहे , कोई आपत्ति नहीं पर हिन्दी का 'श्रेष्ठ कवि' कहने में मुझे आपत्ति है | कविता का वह दाय नहीं है जो कुमार विश्वास निभा रहे हैं | उनकी 'कविता' (?) पर कुछ समझदारों  को भी लहालोट होते देखकर कहना ही पड़ता है .............. 'या इलाही ये माजरा क्या है ' !! 
kavi - gorakh pandey.. 
अंत में,  उन्हीं कवि गोरख पांडे , जिनका ऊपर उचित अवस्थी ने मजाक उड़ाते हुए जिक्र किया है , उनकी एक कविता रखूंगा | गोरख JNU के प्रतिभावान छात्र थे , असमय काल-कवलित हुए | इनके लिखे गीत आज भी भोजपुरी इलाके की श्रमशील महिलाओं के कंठों से कूजित होते हैं | कविता के हेतु के लिए उचित अवस्थी और कुमार विश्वास दोनों को कवि गोरख की इस कविता से प्रेरणा लेनी चाहिए .. .. .. 
'' उलटे अर्थ विधान तोड़ दो ,
शब्दों में बारूद जोड़ दो ,
अक्षर अक्षर पंक्ति पंक्ति को ,
छापामार करो ---
कविता युग की नब्ज धरो ! ''(~ कवि गोरख पांडे )



नोट :-
१) मैंने कुछ बातें/सन्दर्भ , टीप - प्रतिटीप आदि के तौर पर श्री अनूप शुक्ल जी के ब्लॉग से साभार लिया है |कविता में बिम्ब-विधान आदि औचत्य के लिए अनूप जी की इस पोस्ट - कल्पना का घोड़ा,हिमालय की ऊंचाई और बिम्ब अधिकार आयोग - को देखना समीचीन होगा ! 
२) मैंने पोस्ट में श्री गौतम राजरिशी जी का नाम लिया है जो मेरे प्रिय ब्लागर हैं जिनसे लड़ना-सीखना भी होता है |
३) मैंने पोस्ट में श्री अपूर्व शुक्ल जी का नाम लिया है , ये मेरे प्रिय कवियों में हैं , उस दिन की कल्पना मात्र से ही दुखी हो जाता हूँ जब ब्लॉग जगत इनकी कविताओं से वंचित होने लगे | इनका व्यक्तित्व भी कवितामय है | पर जब इनकी कविता कुमार-गी होने लगेगी तो सर्वाधिक दुखी होउंगा मैं , और अपनी मंद-मति से डाटून्गा भी ! 
४) पोस्ट में मैंने जिन वीडियोज का लिंक दिया है , अधिकाँश को डाउनलोड भी कर लिया है , ताकि साक्ष्य की दृष्टि से पुख्ता रहा जाय |
५) चित्र साभार गूगल से |   


56 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी साफ़गोई प्रेरक है।
    यथार्थबोध के साथ कलात्मक जागरूकता भी स्पष्ट है। बेहद तरतीब और तरक़ीब से अपनी बात रखी है। सार्थक शब्दों के साथ तार्किक ढ़ंग से विषय के हरेक पक्ष पर प्रकाश डाला गया है।

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  2. कुमार विश्वास जैसे मंचीय कवि जब बुद्धिजीवी समाज में जगह पाने को बेचैन होने चल जाते हैं तब उऩकी स्थिति ज्यादा हास्यास्पद हो जाती है। ऐसे में उन्हें या तो कलेजा ठोककर ये मानना चाहिए कि वो कविता लोगों का मनोरंजन करने और अपने लिए समृद्धि( ये अलग बात है कि इस समृद्धि का अर्थ लोहे-लक्कड की चीजें जुटाना भर है) पाने के लिए करते हैं। जब तक कवि में ये विश्वास नहीं पनपने पाता है जब तक विश्वास सिर्फ सर्टिफिकेट में ही दर्ज नाम होगा,व्यक्तित्व में नहीं। अगर यही हाल रहा तो भविष्य में भद्द पिटने की जमीन और मजबूत होगी।
    आपने जिस शोधपरक नजरिए से पोस्ट लिखी है,माफ कीजिएगा विश्वासजी उस लायक नहीं है। आपको इतनी मेहनत राजेश जोशी जैसे कवियों पर करनी चाहिए। इन्हें तो कमेंट दे-लेकर चलता कर देने का है।..बहरहाल,आपकी मेहनत को सलाम।.

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  3. मैंने बहुत कम सुना है कुमार विश्वास को लेकिन जितना सुना है (यू ट्यूब से) उसके आधार पर यही कह सकता हूं कि बहुत अच्छा लिखा है। सुन्दर।किसी के मूल्यांकन के लिये ब्लॉगजगत में अंध-भक्ति या अंध-घृणा का चलन है। यह लेख उससे अलग एक पापुलर लेकिन कमजोर कवि की ताकत और कमजोरियों पर निगाह डालता है।

    जो अंदाज कवि का है उससे लगता है उनकी मंच-आयु हिन्दी सिनेमा की अभिनेत्रियों की तरह रहेगी। जवानी और कविता एक साथ विदा होगीं। कामना है कि वे चिरयुवा रहें।

    दो व्यक्तियों की तुलना करना अच्छा नहीं होता लेकिन कल मैंने रमानाथ अवस्थीजी को को सुना। क्या अस्सी वर्ष की उमर में (अगर कुमार विश्वास उस समय तक मंच पर रहे) इस तरह से गीत पढ़ सकेंगे जिसमें कवि अपना वक्तव्य भी पढ़ रहा है तो लगता है कविता है जिसे सुनते रहना ही अच्छा है।

    चूंकि हाल-फ़िलहाल इस मुद्दे पर तुम्हारी टिप्पणियां लोगों के मन में हैं इसलिये सहज ही है कि लोग कहें /सोचे कि यह कुमार विश्वास के प्रति तल्खी का विस्तार है। लेकिन उनके प्रशंसक भी शायद तसल्ली से यह न बताना चाहें कि इसमें गलत क्या है? वे असहमत कहां हैं।

    विनीत कुमार की टिप्पणी के इस अंश से असहमत कि कुमार विश्वास पर पोस्ट नहीं लिखनी चाहिये। अपने समय के लोकप्रिय व्यक्तित्व की पड़ताल तो होनी ही चाहिये। यह कारण जानना भी जरूरी है कि कविता के स्तर पर बहुत अच्छा न होने के बावजूद कोई कवि/पर्फ़ारमर इतना लोकप्रिय कैसे है।

    कुल मिलाकर अच्छा लेख। अन्य कविता की प्रवत्तियों पर ऐसे ही लेख लिखते रहो।

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. मेरी नजर में कुमार विश्वास कुल मिलाकर 'एक कविता' के कवि हैं। जो कि कच्ची भावुकता से ओतप्रोत है। अपने काव्य-दोषों के बावजूद अच्छी भी लगती है। मुझे आपका विश्लेषण संतुलित लगा।

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  6. यह संयोग मात्र ही है कि इस प्रकरण से संबंधित मेल का बोझिल प्रत्युत्तर अभी-अभी आपके मेलबाक्स के हवाले किया है..और तभी पोस्ट पर यह नजर पड़ी..अपनी कहने योग्य बातें यथा शक्ति पहले ही आपको लिख चुका हूँ..यहां कहूँगा कि कवि के कृतित्व संबंधी आपकी आपत्तियों से सहमत हूँ..लोकप्रिय होने के फलस्वरूप कवि का अपनी कविता के प्रति व प्रशंसकों के प्रति उत्तरदायित्व बढ़ जाता है..और काव्य की व्याकरण/तथ्यात्मक त्रुटियाँ अक्षम्य भी..(यदि मात्र लोकप्रिय होना ही एकमात्र उद्देश्य न हो तो) ..मगर मुझे लगता है कि किसी कवि के कुल साहित्यिक योगदान से भी अधिक विमर्श का बेवजह विषय बनाये जाने की इतनी जरूरत नही..यह भी ध्यान रखना होगा कि विमर्श वैयक्तिक अहम्‌ का विषय बन कर न रह जाये..
    बाकी आपसे कह चुका हूँ!!..(और मेरी किसी बात को गंभीरता से लेने पर उत्तरदायित्व भी आपका ही होगा) ;-)

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  7. और कहना भूल गया कि सल्वाडोर डाली साब की यह पेंटिंग ’पर्सिस्टेंस ऑफ़ मेमोरीज’ यहाँ पर सेमीचीन भी है..और मेरी पसंदीदा भी..

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  8. अपनी बात तर्कपूर्वक व शालीनता से रखने का स्वागत ही होना चाहिए.

    `मित्र संवाद' में ढेर उदाहरण हैं कि केदार बाबू की कुछ कविताओं पर कैसी कैसी प्रतिक्रया और खिंचाई उनके सर्व प्रिय स्नेही ने ही की; किन्तु केदार बाबू ने इसे मन भेद के रूप में नहीं लिया, मतभेद के रूप भी नहीं. सहृदय पाठक को अपनी राय देने का अधिकार है; और वह स-तर्क भी हो.

    कविता के शास्त्रीय पक्ष का तो अभी यहाँ उदघाटन भी / ही नहीं हुआ.... मुद्दा है.

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  9. मैनें हिंदी साहित्य को विधिवत नहीं पढा है और शायद उस की बारीकियों को न समझने के कारण अच्छी और बुरी कविता में भेद न कर पाऊँ लेकिन क्या कविता है और क्या चुटकुला/परिहास/प्रतुत्त्पन्मति, इस में तो अंतर कर सकता हूँ ।

    कुमार विश्वास जो मंच से सुनाते हैं उस का ९०% कविता नहीं है ।

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  10. @ मनोज कुमार जी , मंतव्य पर आपकी सहमति से खुशी हुई !
    @ विनीत कुमार जी , मामला यही हुआ है कि कुछ ठीक-ठाक लोग भी कुमार-राग अलापने लगे हैं , पाखी के एक अंक में एक जोशी जी ने बड़े जोश से उनके काव्यत्व का गुणगान किया है | कुमार बहुत ताव में साहित्यिक मौके को भंजाने में लालायित हैं ( कारण है - बिना कुछ किये धरे ग्लोबल होने की चाह ) , कविता स्तरीय नहीं इसलिए हास्यास्पद होना उनकी नियति है | यह सब इसलिए लिख गया क्योंकि लोगों से इस मुद्दे को लेकर काफी बतकहीं हो चुकी थी , और आवश्यक लगा कुछ इस तरह कहना | वह पापुलर धारा के भी माने जांय इसकी भी संभावना उनमें कम दिखती है | चूंकि लोग बड़ा मान रहे हैं उन्हें , इसलिए कुछ चीजों पर बात रखना जरूरी सा लगा | अपनी कहूँ तो उनकी कवितायें पढ़ना और उनको सुनना अपने आप में एक 'टॉर्चर' है | कोशिश करूंगा कि कभी राजेश जोशी प्रभृति कवियों पर भी लिखूं | आभार !

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  11. @ अनूप जी , आपकी टिप्पणी से सुकून मिला | रमानाथ जी के गीत को कई बार सुना | स्पष्ट हो जाता है कि वह कविता जो हाँथ पर बजवाई जाती है और वह कविता जो दिल में पहुंचाई जाती है , दोनों में बड़ा अंतर है | एक हैं अवस्थी जी जिन्हें तालियाँ नहीं चाहिए , काव्य-हेतु का पूर्णत्व चाहिए और एक कुमार साहब हैं जिन्हें तालियाँ प्राथमिक रूप से पसंद हैं | अवस्थी जी मांगते नहीं देते हैं और एक कुमार हैं देते नहीं सिर्फ मांगते हैं | प्रविष्टि की प्रासंगिकता को आपने समझा , इसके लिए आभारी हूँ |
    @ रंगनाथ जी , आपको विश्लेषण सही लगा , इसका शुक्रिया !
    @ अपूर्व जी , / @ यह भी ध्यान रखना होगा कि विमर्श वैयक्तिक अहम्‌ का विषय बन कर न रह जाये..
    --- अपनी तरफ से इसबार सायास यही कोशिश किया हूँ कि ऐसी छायाएं न आयें ! इतने ने तो बहुत संतोष दिया है कि कभी भी आपने यह नहीं कहा कि मैं 'मूलतः कुमार विरोधी हूँ और उनके विरोधी 'खेमे' का आदमी हूँ ' ! अन्य लोगों ने तो जाने क्या क्या कहा !
    --- पेंटिंग पर आपने जो भी कहा , जितना भी कहा वह मेरे लिए एकदम नया है ! अब आपको पेंटिंग की कुछ बारीकी बताना ही होगा मुझे , मैं इस फील्ड का क , ख, ग . भी नहीं जानता ! आभारी हूँ !

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  12. @ डॉ. कविता वाचक्नवी जी , --- '.... गुणी च गुणरागी च विरलो सरला जनाः ' | शास्त्रीय पक्ष में बहुत से मुद्दे हैं जो साहित्य के परम्परागत मानदंडों से जुड़े हैं , कुमार की कविता वहाँ बहुत नहीं ठहर पाती , उस गंभीर समीक्षा को लोग उतने ही हलके में लेंगे , मसलन प्रेम के स्वरूप को लेकर ही बात की जाय तो कुमार सुप्त-चेतन मन की निर्मिति करते हैं , उदार-चेतन और उर्वर-चेतन की नहीं ! बड़ा सतही स्तर है वहाँ , नायक , नायिका बिना खुद को 'गद्दार' की कोटि में जा बैठाता है | कविता का स्तर भी आलोचना का स्तर निर्धारित करता है | किसी रचना की महज प्रसिद्धि आलोचना / आलोचक में स्वस्थ आकर्षण नहीं पैदा करती जब तक उस रचना में श्रेष्ठता की भी उपस्थिति न हो ! शास्त्रीय आलोचना के आकर्षण में तो यह बात और लागू होती है ! आभार !
    @ अनूप भार्गव जी ,....... कविता , परिहास , चुटकुलेबाजी , प्रत्युत्पन्नमति इन सबमें अंतर है | अंतर इस तरह का कि कुछ विशिष्ट लक्षण उसी के पद की परिभाषा में हैं , अन्य में वे नहीं पाए जाते | आपकी इस बात से सहमत हूँ कि 'कुमार विश्वास जो मंच से सुनाते हैं उस का ९०% कविता नहीं है ।' आगमन का शुक्रिया !

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  13. भाई, यह बन्दा कुमार विश्वास को नहीं जानता। कभी सुना भी नहीं, पढ़ा भी नहीं। यहाँ आप ने यू ट्यूब या जो भी लिंक दिए हैं, वे कच्छपगति पर नहीं खुलते। इसलिए कुछ कहना ठीक नहीं है।

    लेकिन आप का सन्दर्भों के साथ विस्तृत विमर्श एकदम से लुभा गया। यह ब्लॉग जगत में दुर्लभ है। आभार।
    कभी किसी साथी के लिए उसी दिल्ली में कह पड़ा था - अगर इनका सिविल सर्विसेज प्रॉपर में चयन नहीं हुआ तो किसी का नहीं होगा। बहुत लोगों ने यूँ कहना बुरा माना। खुद वह बेचारा भी ... परिणाम था सत्तावनवीं रैंक। हिन्दी माध्यम से।
    अब आगे कुछ नहीं कहना चाहता। :)
    हिन्दी पर अगले रविवार प्रतीक्षा रहेगी।

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    प्रिय अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी,

    एकदम सीधी-साफ अमरेन्द्र टाइप पोस्ट...मैं पूर्णरूपेण सहमत हूँ आपसे...

    पर मेरे दोस्त हम आजकल एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जब सतही चीजों का तो मोल है और वजनी चीजें चलन से ही बाहर बनी हुई हैं... एक सबसे बड़ी विडम्बना यह हो गई है कि नासमझ बहुत मुखर हैं... और तमाम तर्क व तरीके हैं उनके पास एक सही बात को बुलडोज करने के... पब्लिक की पसंद या डिमांड के नाम पर...

    सीधा-सीधा कनेक्शन तो नहीं पर अपनी बात समझाने के लिये बता रहा हूँ... Afro Hair रखने वाले दक्षिण के एक बाबा जी ने अपना पूरा कैरियर तो बनाया मंचीय जादूगरों के द्वारा अक्सर दिखाई जाने वाली ट्रिकों के माध्यम से... कभी भभूत, कभी सोने की चेन या कभी देवमूर्ति हवा से पैदा कर भक्त के हाथ में थमा कर... न्यायमूर्तियों, खिलाड़ियों से लेकर पूर्वप्रधानमंत्री तक भक्त हैं उनके... परंतु यह सवाल उठाने पर सीधा जवाब देने की बजाय या तो आपको शब्दजाल में उलझा दिया जायेगा या बाबा के बनाये अस्पताल व विश्वविद्मालय के गुण गाये जाने लगेंगे या आपको ईशद्रोही कहा जाने लगेगा... पर यह कोई नहीं मानेगा कि बाबा जी एक घटिया ट्रिकस्टर हैं...

    क्या किया जाये... अब तो बाबाजी के अगले जन्म की तैयारी भी होने लगी है...

    यही नियति आपकी पोस्ट के विषय बने कवि की भी होनी है... धर्म को समझना मुश्किल है... पर बाबाजी की फोटो को हाथ जोड़ना आसान... उस कवि के भक्त रहेंगे और बाकियों से अधिक भी...क्योंकि कविता को समझने के लिये समझ का होना पहली शर्त है... जो कुछ के लिये मुश्किल है...और कोई यह भी स्वीकार नहीं करेगा कि यह महज कुछ मंचीय ट्रिक्स का नतीजा है!... इंतजार कीजिये कवि के क्लोन भी आने वाले होंगे बाजार में...

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  15. एक असफ़ल कवि और असफल गायक टाइप बंदे में मंचीय गीतकार बनने की प्रबल संभावनाएं निहित होती हैं. ’डॉ.’ कुमार विश्वास उसी अर्थ में ’संभावनाशील’ अर्धगीतकार प्रजाति के बन्दे हैं जो जीवन भर एक ही गीत लिखने के अभिशाप के साथ जन्मे हैं.

    अच्छे साहित्यिक गीतों से सर्वथा अपरिचित हिंदी-प्रदेशों की कैरियरोन्मुख काव्य-बुभुक्षित,प्रेम-बुभुक्षित,प्रेम-प्रतीक्षारत वेलेंटाइनी पीढ़ी ने उनके प्रेम-प्रयोजनीय गीतों को लपक लिया है.

    कुमार विश्वास भी अपने क्लाइंट्स की मांग को एक अच्छे व्यवसायी की तरह ताड़ गये हैं और फिर-फिर उसी उत्पाद की रिसाइकिलिंग कर आपूर्ति में संलग्न हैं.भवानी भाई ऐसों के बारे में बहुत पहले कह गये हैं : ’जी हां हुज़ूर ! मैं गीत बेचता हूं ’

    कुमार विश्वास बेचें,कमाएं,आमदनी पर ईमानदारी से जायज टैक्स भरें और प्रसन्न रहें.पर साहित्य के विशाल और उदात्त परिसर में उनकी कोई जगह न थी, न है और न होगी.

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  16. कुमार विश्वास जी को मैंने नहीं पढ़ा है, पर आपकी पोस्ट में उद्धृत टिप्पणियों की भाषा से यही लगता है कि उनके प्रशंसक उनके अंधभक्त हैं.
    बहरहाल, आपकी समीक्षा हमेशा की तरह संतुलित,सटीक और तार्किक है. आपकी साफगोई की तो मैं आरम्भ से प्रशंसक हूँ, जिससे आमतौर पर लोग चिढ़ जाते हैं.
    अंत में यही कहूँगी कि अगर कोई स्वयं को एक कवि के रूप में स्थापित करना चाहता है, तो उसे अपनी आलोचना के लिए तैयार रहना चाहिए, बल्कि प्रशंसा से कहीं ज्यादा आलोचना सुननी चाहिए, अन्यथा प्रतिभा होने पर भी उसकी संभावनाएँ संकुचित हो जाती हैं. प्रसिद्धि मात्र के लिए भूखा कवि या साहित्यकार मात्र अपने श्रोताओं और पाठकों के लिए रचनाएँ करने लगता है, व्यापक सरोकारों को ताक पर रख देता है.

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  17. आपके पक्ष से सहमत हूँ। व्यक्तिपूजा हमारी एक बडी कमज़ोरी है।

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  18. कुमार विश्वास को मैं भी नहीं पढ पाया हूँ पर स्मार्ट इंडियन पर भरोसा कर रहा हूँ !
    हिमालय के बौनेपन पर अनूप जी के ब्लाग पर बहस देखी तो थी पर अनभिज्ञता के चलते हाथ नहीं आजमाया !
    बिम्ब के स्थायी भाव ? पर कुछ लिखने की इच्छा है, पर कब ? पता नहीं !
    आपने अपनी बात साफ सुथरे ढंग से कही , वे बुरा क्यों मान रहे हैं ? आलोचना सहज स्वीकार्य नहीं तो उन्हें क्या समझूं मैं ?

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  19. आपनी बात रखने का बहुत संतुलित आधार रखा है ...बाकी कुछ ज्यादा विस्तार से मुझे पता नहीं है ..अत:कुछ भी कहना उचित नहीं है ...

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  20. मुझे जब भौंरे के कुमुदिनी पर बैठने की खबर मिली तभी मैंने कुमार विश्वास जी को गाते हुए यू-ट्यूब पर देखा. दूसरे दिन फी उन्हें वही पर देखा. दो-तीन दिन की देख-रेख के बाद पाया कि वे तो कॉमेडी सर्कस में परफार्म करने लायक बन्दे हैं जी. दस-ग्यारह साल पहले जो चुटकुले सैलेश लोढ़ा सुनाते थे उन्ही को कुमार जी ने विरासत में अपने नाम करवा लिया है. शायद बरस्ते वसीयत. मुझे ज़रा भी आश्चर्य नहीं होगा अगर अगले तीन-चार साल में वे हास्य टीवी सीरियल में काम करते हुए मिल जाएँ तो.

    वैसे मैं विनीत कुमार जी सहमत हूँ कि कम से कम कुमार विश्वास इतनी बढ़िया पोस्ट डिजर्व नहीं करते.

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  21. यह जरुरी था, जैसा की प्रिय मित्र विनीत कह रहे हैं, चुपचाप बिना विरोध के बर्दाश्त करते जाने की भी सीमा होती है..व्यक्तिगत संवादों में भी.
    यहाँ बात व्यक्ति की नही परम्परा की हो रही है,आपसे सहमत हूँ.
    आगे ...
    अधिनायकवाद भावुक समाज का सबसे बड़ा दुर्गुण होता है इसका विरोध होते रहना चाहिए ..भले ही वह किसी (खास ) को अरण्यरोदन लगे...भला हम इसकी परवाह क्यों करे ?
    चीजों को सही दिशा न दी जाये तो वे खुद - ब - खुद गलत दिशा की और अग्रसर हो जाती हैं.

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  22. मुझे तार्किक, विश्लेषणपरक और साक्ष्यों के साथ की गयी आलोचना अच्छी लगती रही है.
    सभी खूबियाँ आपकी इस समालोचना में है.
    दूसरी बात, सृष्टि में जो एक बार जन्म पा जाता है वह जैसा भी क्यों न हो, उल्लेखनीय होता है.
    मुझे कुमार विश्वास इसलिये पसंद नहीं क्योंकि उसके पास भीड़ जुटी हुई है जो मेरे पास नहीं.
    इस कारण मैंने अपने जीवन में एक आदर्श वाक्य को आश्रय दिया —
    "कविता करो,
    कविता का स्वतः स्वाद लो,
    यदि वह वास्तव में स्वादिष्ट होगी
    तो अन्यों को भी लगेगी,
    इसलिये कवि बनकर मत जिओ.
    तुम उस क्षण-विशेष तक ही कवि थे
    जब तक कविता के निर्माण की दशा में रहे.
    तुरंत अपनी कविताओं के श्रोता बनो
    और उसकी मानसिक विवेचना करो.
    उसको परिवक्व होने तक बाज़ार में खरीददारी मत करने दो.
    उसको प्रशंसा के ठग रास्ता भरमा देंगे.
    मीडिया के कैमरे
    उसे नंगा होने को उकसायेंगे.
    बस तुम एकान्तिक साधना करो."

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  24. सुबह - सुबह अच्छा सैर कराया आपने, यहाँ अपूर्व का नाम देख कर दुखी हुआ... इसलिए नहीं कि मैं उनका मित्र हूँ इसलिए कि बहुत पहले ही इस मसले पर मुझसे बात कर चुके हैं और एक आम आदमी के हिसाब से उन्होंने बस उनकी वाक् पटुता की तारीफ की थी. फुरसतिया जी के लेख के बाद ही मैंने कुमार विश्वास को सुना (यों भी मैं लिखने में दिल से जल्दी किसी से प्रभावित नहीं हो पाता) लेकिन उनके इस लेख के बाद सारे लिंक, कविता पाठ देखना जरुरी लगा और निराश हुआ... हाँ वे सफल मंच संचालक हैं... कहीं यह भी पढ़ा की स्व. धरमवीर भारती उनमें एक उज्जवल सम्भावना देखते हैं किन्तु मुझे लगता है आज वे इस बात पर कायम नहीं रहते...

    यह अजीब विडंबना है कि आलोचना करने पर या अपने मन कि बात कहने पर लोग उसे तुरंत विरोधी खेमे का बताने लगते हैं... हिंदी साहित्य कि हालत और बुरी है, लॉबी में रहना, राजनीति, जुगाड़, गाली- गलौज और खुद को साहित्य का ठेकेदार मानना यह सब यहाँ सबकी रगों में दौड़ता है.... रावण का "एक्योहन द्वितियों नास्ति (माफ़ कीजिये टाइप शुद्ध नहीं हो रहा ) वाली सोच है. हिंदी ब्लॉग्गिंग कि हालत भी बुरी है... कमेन्ट कि ताक में सभी रहते हैं पर महान हैं, कमाल हैं, बेमिसाल है, अद्भुत है, निशब्द हैं से ऊपर उठाना नहीं चाहते.

    वापस कुमार साब पे चलते हैं,
    जो भी मैंने सुना कविता कि बात नहीं करूँगा (मुझे उतनी समझ नहीं ) थर्ड क्लास आदमी हूँ पर चुटकुले भी थर्ड क्लास थे, और हम संयोग से थर्ड क्लास में ही सुनते-सुनाते थे... कुछ भी नया नहीं..

    वे हाजिरजवाब हैं, वाक् पटु हैं, ऐसे कवि बेबाक होकर अपना निर्णय आपके बारे में नहीं देते, वो आपका कदम देख कर आपकी तारीफ़ या बुराई करते हैं और दरअसल जो सबकी तारीफ़ करे वो किसी कि तारीफ़ नहीं करता (ऐसा मेरा मानना है)
    विश्वास के प्रसंशक अंधभक्त ज्यादा लगे, वे शायद दिल से सुनते हैं... कोई बुराई नहीं लेकिन आलोचना सो सुनने कि हिम्मत होनी चाहिए..

    चलते-चलते ...

    यहाँ मैंने भी अपने मन कि बात रखी है, अवसरवादी और औकात बताने वालों का स्वागत है, देखना दिलचस्प होगा कि मुझे अपने ब्लॉग पर मोडरेशन लगाना पढता है या इ-मेल से गालियों मुफ्त में बांटी जाएँगी... क्योंकि कईयों के पास इन सब के लिए फुर्सत ही फुर्सत है.

    कुमार विश्वास को शुभकामनाएं, आमीन कि वो आगे जाएँ, अभी तो युवा हैं. इश्वर उन्हें और निर्बलों, असहायों और उपेक्षितों कि आवाज़ दे और अपने सर्जन कर्म से वे समाज को बदलें... जवानी में आलोचना का कलेजा नहीं होगा तो आगे तो और नहीं होगा.. इतिहास गवाह है इसका... उम्र के साथ इगो भी बढ़ता है ... सुन रहे हैं कुमार साब !
    (कहीं किसी को बुरा लगा हो तो माफ़ करेंगे, जैसा लगा है वैसा कहा है )

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  25. @ गिरिजेश जी , आपकी प्रेरणाप्रद टिप्पणी से खुशी हुई ! आर्य , अगले रविवार को 'हिन्दी' पर हाज़िर रहूंगा |
    @ ललित जी , शुक्रिया !
    @ प्रवीण जी , | :) | , आपने कम में ही बहुत कुछ कह दिया है , अगर मैं कुछ पकड़ पा रहा हूँ तो वह वही बाबा हैं जो मुंह से शिवलिंग निकालते हैं , अगर यह बात किसी समीप वाले को पता चलती है तो वह उसे वहीं भेज देते हैं जहां उनके नरक वाले ईश्वर हैं | लोगों की अंधभक्ति ऐसी ही है , हमारे मंत्री भी राजनयिक निर्णय ऐसे बाबाओं की 'दिव्य शक्ति' से परामर्श लेकर लेते हैं | ....... और यह होता आया है कि हाशिये ने विद्रोह किया है , केन्द्रीय होती अपसंस्कृति का ! इसलिए यह काम चलता ही रहेगा | दोनों ओर से |
    @ chaupatswami जी , आपने संक्षेप में ही कुमार की 'सफलता' (?) की रीढ़ बता दी , रीढ़ पर बड़ी कमजोर .. ''अच्छे साहित्यिक गीतों से सर्वथा अपरिचित हिंदी-प्रदेशों की कैरियरोन्मुख काव्य-बुभुक्षित,प्रेम-बुभुक्षित,प्रेम-प्रतीक्षारत वेलेंटाइनी पीढ़ी ने उनके प्रेम-प्रयोजनीय गीतों को लपक लिया है.'' | आपने कहा , '' ......पर साहित्य के विशाल और उदात्त परिसर में उनकी कोई जगह न थी, न है और न होगी '' , हमारा प्रयास लोगों को इस बात/सोच के प्रति जागृत करने का है !

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  27. @ मुक्ति जी , सहमत हूँ आपसे | आलोचना को सकारात्मकता ढंग से लेना उन्हें सीखना चाहिए जो सृजन की बात करते हैं , पर वही है कि क्या वे 'सृजन' का मतलब भी समझते हैं !
    @ स्मार्ट इंडियन जी , राजनीति , धर्म , साहित्य हर तरफ इसी व्यक्ति पूजा ने बंटाधार किया है ! हमारे समाज को मूल्यहीनता की ओर ले जाने वाला कटु-सत्य है यह !
    @ अली जी , बिम्ब पर लिखिए आर्य , पढ़ने की मेरी भी इच्छा है | @ आलोचना सहज स्वीकार्य नहीं तो उन्हें क्या समझूं मैं ?>> शंका सही जगह जा रही है , दाल में काला नहीं बल्कि , काले में दाल है , :-)
    @ संगीता स्वरूप जी , शुक्रिया !
    @ शिव जी , अगर लोढ़ा भी ऐसे ही थे तो कहना ही होगा कि ई बड़े 'लोढ़ा'-कवि हैं ! हाँ , वे हास्य टी.वी. सीरियल में ज्यादा न्याय करेंगे खुद के साथ !
    @ एल. गोस्वामी जी , समाज भावुक ज्यादा है ( मैं तो इसे भावुक भी नहीं सतही भावुक ज्यादा कहता हूँ ) ! ऐसे में व्यक्ति पूजा खूब फलती-फूलती है ! इसी एवज में अयोग्य , योग्यता से इतर हथकंडे अपनाकर , समाज में अपने आप को योग्य साबित कराते रहते हैं ! इसपर लोगों को बोलते रहना चाहिए !
    @ प्रतुल जी , आपका कविता में कथित प्रयोजन और कुमार विश्वास के वर्तमान के आयोजन में बड़ा वैपरीत्य है ! वह इतना नहीं सोचने वाले | नहीं अमल करने वाले !

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  28. @ सागर जी ,
    --- इतना गमागम लिख गए आप ! ई बिना दिल से चालित हुए नहीं हो सकता ! आपने कह भी दिया है !
    --- अपूर्व भाई के एक मत को ही मैंने उद्धृत मात्र किया है | सत्य मानिए , अपूर्व जी बड़े वाजिब ढंग से अपनी बात रखते हैं , अमूमन इस मुद्दे को छोड़ बैठा था पर राजरिशी जी की पोस्ट पर अपूर्व जी द्वारा बड़े वाजिब ढंग से रखी गयी असहमतियों ने आज इस पोस्ट तक की यात्रा कराई ! अपूर्व जी का काव्यत्व और काव्यत्व-ग्राहिता दोनों असंदिग्ध हैं ! ये सब बस कुछ बातें ही तो हैं !
    --- धर्मवीर भारती द्वारा कुमार साब के सन्दर्भ में कही गयी बातें इसलिए भी हैरत में डालती हैं कि किसी संभावनाशील की परिणति इतनी इतनी अधोगामी होनी चाहिए ! एक शक यह भी है कि ये बात कुमार की निजी वेबसाईट पर है जिसपर सत्य और झूंठ के दावों को बराबर बराबर देख रहा हूँ | किसी पत्रिका आदि में होता तो सन्दर्भ माना जाता , यह उनका आत्म कथन भी हो सकता है |
    --- @ वे हाजिरजवाब हैं, वाक् पटु हैं,--- पर एक ख़ास अंगल को लेकर ही ! अपनी कहूँ तो मैं इसपर भी सहमति कम ही कर पाता हूँ , इसलिए आप द्वारा कहे गए इन शब्द - युग्मों के बीच पर्याप्त दूरी करके पढता हूँ | इसके लिए अपेक्षित मौलिकता और उसका सात्विक निर्वाह उनके यहाँ नहीं है |
    --- वे सब अब नहीं आयेंगे , उनके अस्त्र चूक गए हैं , गाली-अस्त्र का प्रयोग राजरिशी जी की प्रविष्टि के बाद किये थे , पर उसको प्रभावहीन जान सम्हल गए | पता नहीं आप तक क्या प्रतिक्रया होगी , नहीं जानता पर प्रतिक्रया होगी - इसकी उम्मीद कम ही है | वे इस लायक भी नहीं बचे |
    --- आपकी टीप में अंतिम में कही बात पर मैं भी कहूंगा - आमीन !!!

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  29. अमरेन्द्र जी,

    साहित्य में मेरी सामान्य रूचि होने और अपनी एक औसत साहित्यिक समझ के बावजूद अनूप जी की बिंब वाली पोस्ट से पहले तक मैंने कुमार विश्वास जी का कहीं कोई नाम तक नहीं सुना था फिर उनकी कवितई और मंचात्मकता के बारे में तो जानने का सवाल ही नहीं उठता। इसलिए उन पर मैं कुछ कह नहीं पाउंगा।

    बाद में यू ट्यूब खोल- खाल कर देखता हूँ...अभी लंच टाईम हो गया है और जैसा कि आपने फरमाया है उस स्तर की यदि कवितई है तो उस कवित्त के मुकाबले मुझे अभी भोजन करना ज्यादा श्रेयस्कर लग रहा है :)

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  30. सहज ही अतिशय बधाई के पात्र हैं आप. आपने जाने-अनजाने ब्लॉग-जगत में एक समालोचना की परम्परा का श्रीगणेश कर दिया है. समय केसाथ लोग याद रखेंगे इस पोस्ट को. आधुनिक माध्यमों के लोक(प्रिय) कवि हैं कुमार विश्वास और आपने उनकी समालोचना एक आधुनिक माध्यम(ब्लॉग) में की है. जब JNU में कुमार विश्वास आये थे तो उस कार्यक्रम का संचालन मैंने किया था, मुझे लगभग वही प्रतीति हुई थी जो आपने कही है. एक बात यह भी तो है, कुमार विश्वास जी को क्यूँ ना मानक कसौटियों पर कसा जाय ? दावा जितना बड़ा होगा प्रतिनिधित्व का , कसौटी भी उतनी ही सामयिक-अनुकूल होनी चाहिए.
    अमरेन्द्र जी, आप वाकई बधाई के हक़दार हैं, आपके नैतिक साहस की मै सराहना करता हूँ. आपने जिस संयत-संतुलित ढंग से अपनी बात कही, कुछ संदेहवादियों अथवा अंध-प्रशंसको के अतिरिक्त शायद ही कोई इससे सहमत ना हो. आपने अपना धैर्य नही खोया, जो सहज अपेक्षित भी है. किसी बड़े या छोटे कवि, लेखक, कहानीकार, पत्रकार से उपयुक्तता व शास्त्रीयता की उम्मीद करना कहाँ गलत है..? यह आलोचकीय परम्परा तो दर्शक, लेखक एवं आलोचक सभी के लिए हितकारी होती है. मै व्यक्तिगत तौर पर आपकी सराहना करता हूँ.

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  32. गहन विवेचना। कविता के मंचों पर हो रही प्रक्रियाओं पर अच्छी चर्चा। बहुत कम सुना है अतः कहना कठिन।

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  33. यहां जो लिंक दिया है, वह वाला यू ट्यूब भी देखा, दो चार और भी कुमार विश्वास वाले विडियो देखे .....कुल मिलाकर एक ठीकठाक बंदा लगा जिसके लिए स्टैंड अप कॉमेडी में बहुत संभावनाएं हैं....लेकिन साहित्य में तो कत्तई नहीं।

    कविता की जितनी भी थोड़ी बहुत समझ मुझे है, उस हिसाब से तो इस तरह की कवितई को दूर से ही सलाम।

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  34. वैसे, अमरेन्द्र! एक बात और जोड़ दूँ कि अरुंधती प्रसंग वाले वीडियो में दुनिया की जनसंख्या का आंकड़ा साढ़े आठ अरब बताया गया है, जो कि वस्तुतः आज की तिथि में भी लगभग साढ़े छह अरब है.चाहें तो गूगल कर के देखा जा सकता है
    :)

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  35. अमरेन्द्र,
    ’कोई दीवाना कहता है’ इनकी अकेली कविता है जो मैंने सुनी और देखी है। गालिब के शेर वाली विसंगति जब मैंने प्वायंट आऊट की, तो जिस मित्र के सौजन्य से यह कविता सुनी थी, उसने हमें गंगू तेली बताया। लेकिन, फ़िर भी और पहले भी आपकी पोस्ट पर मान चुका हूं कि कुमार विश्वास जी का प्रशंसक हूँ। इसकी वजह यह भी हो सकती है कि कभी खुद गंभीर नहीं रहा, साहित्य का छात्र नहीं रहा और गंभीर छात्र तो कभी भी नहीं रहा।
    आपको आलोचना करते हुये देखना ऐसा ही लगता है जैसे अर्जुन शर-वर्षा कर रहे हों। हम तो भाई, उनकी कविता भी मजे लेकर सुनेंगे और आप जो लिखेंगे उसे भी मजे लेकर पढ़ेंगे। इस मंथन से जो भी निकलेगा, आशा करते हैं अच्छा ही निकलेगा।

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  36. @ सतीश जी , धन्यवाद , चुटकी लेने की इतनी मर्यादित और मारक शैली कहाँ से पाई है आपने , हम कुछ ऐसा करते हैं तो 'तिक्त' होते चले जाते हैं ! लाजिम है की हम भी सिख्खेंगे ! :)
    @ श्रीश जी , | :) | आपको लेख संतुलित लगा , हम इसी में खुश हैं , नहीं तो बार बार मुझे ऐसा ही लग रहा था कि कहीं असंयत न हो कुछ ! No - AAbhaaR :) !
    @ प्रवीण जी , शुक्रिया हुजूर !
    @ कविता वाचक्नवी जी , कहीं उनका कोई प्रशंसक यह तर्क न दे दे कि कविताई के माहौल में गलत आंकड़े भी चलते हैं :) | जनता तो ताली बजाने में दिमाग गिरवी रख देती है !
    @ 'मो सम कौन' जी , आपकी इमानदार स्वीकारोक्ति सम्माननीय है !

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  37. my unicode hindi converter is not working..so i have to post it in english, cud not wait any more.

    Amrendra ji, your post is like a well worked synopsis. Can be considered for further research :). You have worked for it and that is a call for appreciation. I havent seen or heard any of his performances but your comprehensive dealing with the issue has made me think that yes blogging is not just a passtime for you. It should not be.

    All the people above have said so much, i may not intervene a serious discussion of well versed people.

    Best,
    Manoj Khatri

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  38. आपकी तरह कविता का आकलन करने की क्षमता तो मुझमें नहीं है पर इतना जरूर कह सकता हूँ कि मुझे आज तक ये समझ नहीं आया कि कविता समझने वाले लोग भी उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर उनकी कविताओं को इतना उच्च दर्जे का क्यूँ बना देते हैं? तारीफ उनके मजबूत पक्षों की जरूर की जानी चाहिए पर हिंदी कविता के आज के स्वरूप को अगर कुमार विश्वास की लेखनी में ढूँढा जाए तो मेरी अदनी सी समझ से ये हिंदी का दुर्भाग्य होगा।

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  39. भाई अमरेंद्रजी.. आपके ब्लौग पर जो कुछ पढ़ा उसके बारे में इतना ही कह सकता हूँ कि बाज़ारीपना और उसके लिए सारी बाज़ीगरी कोई नई बात नहीं है. प्रदर्शनप्रियता कितनों को बहा ले जाती है. वो सभी मजमा भी इकट्ठा कर लेते हैं. लेकिन कहा है न ..’आज के कवि खद्योतसम जहँ-तहँ करत प्रकास..’
    मैं इस तरह की दुनिया से अनजान हूँ.. ऐसे लोगों के बीच मेरी पैठ नहीं है.. छपासू रोग से भी अलहदा रहा. किन्तु, ऐसे मंचीय प्राण को खूब समझा-जाना है. आपका जुझारूपन आश्वस्त करता है. पर चुपना मत.. चूकना भी मत.

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  40. देर रात गये इस पोस्ट का आनंद उठा रहा हूँ। कायदे से मुझे सो जाना चाहिये कि कल का दिन बहुत लंबा खिंचने वाला है आज की तरह ही।

    आलोचना किंतु फिर से संतुलित नहीं लगी मुझे। कुमार विश्वास से एक बार मिला मै और मैं उनका प्रशंसक हूँ इन तमाम टिप्पणियों को पढ़ने के बाद भी। उनके प्रशंसकों द्वारा आपको आपतिजनक मेल भेजा जाना अशोभनीय और दुखद था। इसी संदर्भ में अपने प्रिय टेनिस खिलाड़ी स्टेफी ग्राफ की याद आयी। मोनिका सेलेस के उभरते साम्राज्य से बौखलाये स्टेफी के एक प्रशंसक ने मोनिका को सरेआम चाकू मार कर घायल कर दिया था, उसके बाद मोनिका का टेनिस-कैरियर जग-जाहिर है। शायद कुमार साब को आपके भेजे इन मेलों की बाबत जानकारी भी न हों।

    खैर उस शाम जब मैं कुमार साब के सानिध्य में तीन घंटे बैठा था वो कुमार विश्वास एक अलग ही शख्सियत था- इस पोस्ट में वर्णित कुमार से बिल्कुल भिन्न। मैंने तो उसी कुमार विश्वास को जाना है। शेष कोई कुछ कहता रहे। आप कितनी भी धज्जियां उड़ाये अमरेन्द्र जी "भ्रमर कोई कुमुदनी पर" की, हम तो उसे उतने ही शौक से गुनगुनाते हैं अब भी जितना आज से तीन साल पहले :-)

    वैसे अभी आपके मेल ने चौंकाया जरूर था मुझे।

    खैर, आप जानते हैं कि मैं आपको कितना पसंद करता हूँ। आपने अपनी बात कह दी है, अब इस प्रकरण का पटाक्षेप करें।

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  41. अमरेन्द्रनाथ जी , बहुत श्रमपूर्वक आपने यह विश्लेषण किया है और यह इस मायेन में भी सार्थक है कि इस बहाने मौजूदा दौर की काव्यप्रवृतियों की भी आप पड़ताल कर रहे हैं ।
    यद्यपि अब ऐसा मान लिया गया है कि मंचीय कविता (?) और कविता में विवाद की स्थिति नहीं है लेकिन यदा-कदा यह बात उभर कर आ ही जाती है । विगत दिनों छत्तीसगढ़ में एक मंचीय हास्य कवि को पद्मश्री प्रदान की गई है ,इसे भी इस सन्दर्भ मे देखा जाना ज़रूरी है ।
    काफी पहले मैने अपने ब्लॉग "आलोचक "पर प्रमोद वर्मा जी का एक व्याख्यान जो इसी मुद्दे पर था,पोस्ट किया था , पता नहीं आपने देखा या नही ?

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  42. आपने जिस सचाई से ... बिना किसी लाग लपेट के कुमार विश्वास की रचनाओं का विश्लेषण किया है वो कविता को देखने, सोचने और परखने का नया दृष्टिकोण देता है ... अपूर्व जी की बात से सहमत हूँ की लोकप्रियता के साथ साथ दायित्व और भी बढ़ जाता है कवि का ...

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  43. ऐसा स्तरीय और पुख्ता विचार-विमर्श
    आपकी मेहनत का ही परिणाम है
    अभिवादन स्वीकारें ....
    और आप की साफ़गोई को
    सलाम करता हूँ

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  44. बहुत गहन विश्लेषण किया है आपने
    आप भविष्य के समर्थ समालोचक दिखाई पड्ते है मुझे, मेरी मंगलकामनाये आपके साथ है-

    कुमार विश्वास बेचें,कमाएं,आमदनी पर ईमानदारी से जायज टैक्स भरें और प्रसन्न रहें.पर साहित्य के विशाल और उदात्त परिसर में उनकी कोई जगह न थी, न है और न होगी.

    उपर लिखी हुई एक टिप्पडी का यह अंश गागर मे सागर है, मै सहमत हूं इससे

    और तालियां बज्वाने के लिये बार-बार जनता को हुक्म देने की बात तो आप लिखना भूल ही गये

    अरुन्धती राय का अपमान तो अक्षम्य है
    साहित्य का अपमान तो और ज्यादा अक्षम्य है
    गलतियां तो अनेक है,जो कुमार को साहित्यकारो की श्रेणी से पूर्णतया खारिज करती है

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  45. ऐसी वैसी बैटन से तो ख़ामोशी ही अच्छी है
    या फिर ऐसी बात करे जो ख़ामोशी से अच्छी है

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  46. अमरेन्द्र मैं तो कुमार विश्वास को इस लायक ही नहीं समझता कि उन पर आलोचना लिखी जाये, वह एक बासी गलेबाज हैं…हिन्दी की काव्य परंपरा में ऐसे लोगों के लिये न कोई जगह थी न है…रहा सवाल लोकप्रियता का तो ऐसी क्षणभंगुर लोकप्रियता तो लाफ़्टर चैलेंज वालों के पास भी है…इससे ज़्यादा क्या कहूँ?

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  47. एक अजीबोग़रीब मंज़र कल रात देखने को मिलता है :-

    एक यूथ आईकॉन नामक व्यक्ति बड़ी तन्मयता से ओल्डों की धज्जियाँ उड़ाता जा रहा है;

    परम आदरणीय अन्ना हजारे जी को जबरन अपने झंडे तले ला रहा है;

    अपने आपको इलाहाबादी अदब की प्रचारगाह बतला रहा है और बच्चन साहब को जड़ से भुलवा रहा है;

    अपने एकदम सामने बैठे हुए स्थानीय बुज़ुर्ग नेताओं, मध्य प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष आदि पर तबियत से अपने हलाहली शब्दवाण चला रहा है;

    विनोबा बाबा की प्रिय संस्कारधानी के मँच पर खड़ा या कह सकते हैं सिरचढ़ा होकर, कहता जा रहा है कि मैं उपहास नहीं, परिहास करता हूँ और उपहास ही करता जा रहा है;

    जमूरों का स्व्यंभू उस्ताद बनकर अपने हर वाक्य पर ज़बरदस्ती तालियाँ पिटवा रहा है;
    (इतनी तालियाँ अपनी ही एक-दूसरी हथेलियों पर पीटने से बेहतर था कि तालियाँ पिटवाने वाले के सर पर बजा दी जातीं, जिससे उसे लगातर ये सुनाई देतीं जातीं और उसे बार आग्रह करने की ज़हमत न उठाना पड़ती, समय भी बचता और ............. ख़ैर)


    उसे जाकर कोई कह दे भाई के,
    मैं मैं मैं मैं मैं मैं मैं,
    सिर्फ़ बकरी के प्यारे बच्चे के मुँह से ही कर्णप्रिय लगती है, आदमी के (दंभी) मुँह से नहीं।

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  48. गज़ब की समीक्षा की है अमरेन्द्र भाई.. आपने और टिप्पणियों ने कई हकीकत बताईं... एक सुन्दर समालोचना के लिए बधाई..

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  49. Aamrendra Ji,

    aapki sashakt tarkik prastuti ne mujhe is post ko bar bar padhne ko vivash kiya..
    Kisi bhi rachnakaar ke baare me kuch nahi kahunga kyunki wo jaise bhi hain..mujhse uttam hain..lekin aapke tark shat pratishat satya hain..mancheey kalaakar hona ek baat hai aur sahityakaar hona ek..halanki buraai dono men hi nahi hai yadi sweekarokti kar li jaye to.

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  50. आलेख और सभी गुणीजनों की समस्त टिप्पणियां पढ़ कर अच्छा लगा

    अच्छा लगा ये जान कर कि ब्लॉग जगत में ऐसी सार्थक चर्चाएँ भी होती हैं

    सभी को नमन

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  51. aacharya............ye to 'vishwasji' ke liye lifetime 'dastavez' tank diya aapne.......jai ho


    aabhar

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  52. कल 10/05/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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