बुधवार, 18 नवंबर 2009

हरि अनंत हरि कथा अनंता ...

 हरि अनंत हरि कथा अनंता ...






          0   पहला वाक्य लिखना बहुत कठिन होता है ; मेरे जैसे व्यक्ति के लिए  और भी जो एक नुक्ता भी विश्वस्त होकर नहीं रख पता | सरकार ! इस तरह पहला वाक्य तो पूरा हो गया , अब बारी दूसरे की ...
          0  बहुत सृजन हो चुका है , बहुत हो रहा है और बहुत होने को शेष है | दुनिया हर क्षण बदल रही है और बन रही है , साहित्य व अन्यान्न लेखन उसका 'साखी' ( यानी साक्षी ) है | कबीर की मानें  तो  - ' साखी साखी ज्ञान की' | इतना होने के बाद भी कुछ न कुछ बच ही जाता है कहने को | 'हरि अनंत हरि कथा अनंता' | इस बच रहे 'शेष' में हम अपनी भूमिका तलाश करते हैं | संभवतः व्यक्ति के लिए यही धर्म शेष बचता भी है |... सतत चलते रहें और ' हो रहेगा कुछ न कुछ घबराएँ क्या ' | परिचय  भी कुछ यूँ है - ' मुसलसल चल रहा हूँ , काश यही मंजिल हो ' |
          0   ब्लागिंग की दुनिया ने लोगों को व्यापक अवसर दिया है | आज हम प्रकाशन जगत की ठकुरसुहाती से अप्रभावित हैं | सीमाएँ सबकी होती हैं अतः सीमाएँ यहाँ भी हैं | ' कैसा लिखा जाय ' इसकी जुर्रत मैं नहीं कर सकता | हाँ , एक चीज मुझे अखरी , और वह है टिप्पणी करने का अवैज्ञानिक तरीका | क्या अच्छा होता (!) अगर टिप्पणियों से बहसें खड़ी होतीं यानी , एक स्वस्थ परंपरा | 'फैसनेबुल' ढंग की गयी टिप्पणियों से हल्कापन आता है | किन्तु , सुखद आश्चर्य होता है कि कुछ ' पितामह - सरीखे ' आशीर्वाद लेखकों को ऊर्जावान बनाते हैं और मार्गदर्शन भी देते हैं | ऐसे ' पितामहों ' की  संख्या दिनों - दिन बढ़े , यही अच्छा होगा |
           0   विविधता से पूर्णता में चार चाँद लगता है | कहने कि आवश्यकता नहीं कि ब्लॉग की दुनिया  में वैविध्य मौजूद है | हिंदी जगत की क्षेत्रीय भाषाएँ हिंदी की  वैविध्यवर्धक सम्पदा हैं | ब्लॉग जगत पर अभी क्षेत्रीय भाषाओं की  झांकी प्रस्तुत होना बाकी है | इससे हिंदी की  इन्द्रधनुषी आभा सामने आएगी | क्षेत्रीय भाषा - प्रेम और क्षेत्रवाद में फर्क होता है , हमें इस फर्क को जानना भी होगा और मानना भी होगा | अवधी , भोजपुरी , ब्रजी प्रभृति भाषाओँ का साहित्य सामने आये तो यह कोई अमंगलकारी बात नहीं है | ' अवधी कै अरघान '
शीर्षक से मैं अवधी में ब्लॉग बना चुका हूँ परन्तु इस नए ब्लॉग को बनाने का उद्देश्य कुछ और बातों को रखना है | ये और बातें ' कुछ अपनी' होंगी और ' कुछ औरों की'  भी |
           0  अनदेखे पहलुवों की  चर्चा मेरा अभीष्ट है | मैं यहाँ छोटी - बड़ी साहित्यिक हलचलों की सूचना यथासंभव देता रहूँगा | एक शोध - विद्यार्थी के रूप में मेरी नजदीकी साहित्य से है | अतः इस ब्लॉग पर मैं साहित्यिक - प्रस्तुतियों से निरपेक्ष नहीं रह पाउँगा | ये साहित्यिक प्रस्तितियाँ भी ' कुछ अपनी ' होंगी और ' कुछ औरों  की ' भी | बस इतना ही ...|
                                                                                          आपकी स्नेह-दृष्टि का आकांक्षी
                                                                                                  अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
नोट - मेरे इस प्रविष्टि का पहला वाक्य नोबल पुरस्कार से सम्मानित कवयित्री विस्वाव सिम्बोर्स्का से नोबल-वक्तव्य के प्रथम वाक्य से प्रभावित है ! 


    4 टिप्‍पणियां:

    1. "हिंदी जगत की क्षेत्रीय भाषाएँ हिंदी की वैविध्यवर्धक सम्पदा हैं | ब्लॉग जगत पर अभी क्षेत्रीय भाषाओं की झांकी प्रस्तुत होना बाकी है | इससे हिंदी की इन्द्रधनुषी आभा सामने आएगी | क्षेत्रीय भाषा - प्रेम और क्षेत्रवाद में फर्क होता है , हमें इस फर्क को जानना भी होगा और मानना भी होगा | "

      शत-प्रतिशत सहमत हूँ; तात...और अनगिन शुभकामनाएं इस हिंदी ब्लॉग के लिए....

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    2. आपके विचारों में खेतों की माटी सी सोंधी महक है।
      ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है।
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      क्या स्टारवार शुरू होने वाली है?
      परी कथा जैसा रोमांचक इंटरनेट का सफर।

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    3. बहुत सुन्दर स्वागत है ………………………

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    4. आपके विचारों का स्वागत है ..... आप ने इस ब्लॉग को लिखने कि शुरुआत कर दी तो अच्छा पढने को मिलेगा ही ...

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