बुधवार, 26 सितंबर 2018

डॉ. कफील प्रसंग : सत्य के बजाय पक्ष चुनने की जल्दबाजी का अच्छा प्रमाण


डॉक्टर कफील का नाम तो आप लोगों के जेहन में अभी पुराना नहीं पड़ा होगा! 

ये वही डॉक्टर हैं जो बाबा राघव दास मेडिकल कालेज में डॉक्टर थे। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में स्थित यह मेडिकल कालेज वही है जहाँ पिछले साल अगस्त के दूसरे सप्ताह में लगभग साठ बच्चों की मौत हो गयी थी। वजह थी आक्सीजन की कमी। 

यह मुद्दा बड़ा था। सरकार को हरकत में आना ही था। इससे डॉक्टर कफील को गिरफ्तार किया गया और बाद में उस मेडिकल कालेज से हटा दिया गया। न्यायालय के आदेश से कई महीनों बाद वे गिरफ्तारी से बाहर आ सके। 

जब डॉक्टर कफील गिरफ्तार हुए तो पूरा मुद्दा कफील बनाम योगी हो गया। भाजपा बनाम मुसलमान की लड़ाई वाला मसला हो गया। या कहिये बना दिया गया। ऐसे में पक्ष लेना आसान हो जाता है। दिमाग की चुनौती होती है, सत्य पाने की। सत्य की जगह पक्ष पाने की सुविधा से समस्या तुरत हल हो जाती है। चुनौती खत्म। माहौल ऐसा कि यदि आप डॉक्टर कफील पर सवाल करें तो भाजपा की तरफ से बोलने वाले साबित हो उठें। इसलिये ‘करेक्टनेस’ के चलते कोई, मध्यमार्गी, यह भी नहीं बोलना चाह रहा था कि कफील के साथ कई हिन्दू डॉक्टर भी गिरफ्तार हुए हैं। वैसी ही सजा उनके साथ भी रही। इसलिए मुद्दे को जाँच तक जाना चाहिए। तब तक पक्ष चुनने की जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए। लेकिन याद कीजिये, कफील के गिरफ्तार होते ही, सोशल मीडिया पर कितनी तेजी से ‘जस्टिस फॊर कफील’ शुरू हो गया था! 

अब फिर डॉक्टर कफील चर्चा में कम हैं। लेकिन गिरफ्तारी में हैं। इसी सप्ताह वे दो बार गिरफ्तार हुए। ‘जस्टिस फॊर कफील’ लिखने वाले शान्त क्यों हैं, यह मुझे हैरान कर रहा है! उस गिरफ्तारी में और इस गिरफ्तारी में क्या बदल गया है? सरकार भी वही है। डॉक्टर भी वही है। न तो डॉक्टर की पहचान बदली है, न सरकार की। फिर लोग डॉक्टर कफील के लिए क्यों नहीं उग्र होकर बोल रहे? एक सप्ताह के भीतर दो-दो बार गिरफ्तार होने पर भी! 

इसी सप्ताह डॉक्टर कफील पहले बहराइच में गिरफ्तार हुए। यहाँ पिछले दो महीनों में साठ से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। डॉक्टर कफील बिना किसी सांस्थानिक, सरकारी, आदेश के यहाँ जिला चिकित्सालय आये, देखा-परखा और बयान दिया कि यहाँ के डॉक्टरों और व्यवस्था का दोष है। इस पर अस्पताल के डॉक्टरों से उनकी बहस-झड़प हो गयी। डॉक्टरों ने पुलिस की सहायता से गिरफ्तार कराया। जहाँ जिलाधिकारी के सामने पेश होने के बाद वे छूटे। 

फिर दूसरी बार वे गोरखपुर में गिरफ्तार हुए हैं। अपने बड़े भाई आदिल के साथ। आरोप है कि झूठ की बुनियाद पर बैंक में खाता खुलाया और लगभग दो करोड़ आदान-प्रदान किया। आरोप लगाने वाला बंदा है मुजफ्फर आलम। उसके पहचान पत्रों का इस्तेमाल करके बैंक खाता खुलाया गया और फर्जीवाड़ा किया गया। इसी बैंक खाते का इस्तेमाल दोनों भाई करते थे। 

डॉक्टर के लिए न्याय मांगने वाले अब इतने ठंडे क्यों पड़े हैं? अगर वे पहले ठीक कर रहे थे तो अब गलत कर रहे हैं। अगर अब ठीक कर रहे हैं तो तब गलत रहे होंगे! 

मेरा अपना सोचना है कि डॉक्टर कफील के इस पूरे मुद्दे में ‘पक्ष’ लेने की जल्दबाजी में सच जानने की कोशिश नहीं की गयी। सरकार, डॉक्टर और मीडिया के बीच जैसा संवाद रहा, उसे देखकर लगा कि ‘कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है’। किसी भी बहस या लड़ाई या खोज को ध्रुवीकृत करने की जो दिक्कतें हैं, यहाँ भी उसका असर दिखा। जब-जब सोच और खोज का ध्रुवीकरण हिन्दू बनाम मुस्लिम, मोदी बनाम राहुल, एक्स बनाम वाई की तरह निर्णायक होगा तब-तब सत्य के बजाय पक्ष चुनने में लोगों की प्रवृत्ति होगी। इसमें लोकतंत्र का कभी भी वह मतलब नहीं निकलेगा जिसमें कोई अकेली आवाज भी अपना सच रख पाने समर्थ हो। 

‘भक्तों’ का विरोध किया जाय, जरूर किया जाय, लेकिन हमें अपनी बौद्धिक कार्रवाइयों में ढिलाहट नहीं आने देनी चाहिए। पक्ष लेने की जल्दी या होड़ में ‘सत्य’ को देखने की चुनौती खारिज नहीं कर देनी चाहिए। यह हमारी ही लड़ाई को कमजोर करता है। जनता की निगाह में हमें अविश्वसनीय बनाता है। इसका लाभ अनेक बार वे ही लेते हैं जिन्हें हम ‘भक्त’ कहते हैं!

हाँ, यह सच है कि हम जिस समाज में रह रहे हैं वहाँ अल्पसंख्यकों के साथ जुल्म हो रहा है। एक अफराजुल को मुसलमान होने के कारण ही काट-काट कर जलाया जाता है। गाय के लिए मुसलमानों की लिंचिंग की जाती है। यही सरकार होने पर। यह जुल्म धार्मिक ‘पहचान’ के ही कारण हो रहा है। इसके खिलाफ निरंतर और उग्रतर बोलते रहने की जरूरत है। लेकिन इससे यह तय नहीं होता उस धार्मिक पहचान से ताल्लुक रखने वाला हर व्यक्ति निर्दोष हो और जाँच से परे हो। पहले ही उसके पक्ष में आ जाया जाय। नहीं तो आपके इस ‘एप्रोच’ का लाभ उस धार्मिक पहचान से संबद्ध ‘दोषी’ व्यक्ति उठाता है और नुकसान उसी पहचान से संबद्ध किसी ‘निर्दोष’ का होता है!

आखिरी बात यह कि आक्सीजन की कमी और पूर्वांचल के इस टुकड़े में बच्चों की लगातार होती मौत के प्रति मीडिया सरकार पर कोई दबाव बना सकी? लिखने-पढ़ने वाला समाज कोई दबाव बना सका? कोई ठोस पहल हो सकी? पक्ष चुनने की होड़ में क्या इन सवालों के साथ न्याय हुआ! इस सवाल से दोनों पक्ष पल्ला झाड़ लेंगे। मुद्दों-दुर्घटनाओं का क्या यही हासिल है! ~ अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी / 24-09-2018

शनिवार, 22 सितंबर 2018

फिल्म मंटो : सच के लिए लड़ते एक लेखक की काबिले-गौर कहानी

‘मंटो’ बायोपिक फिल्म की बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहा था। समय-समय पर आने वाले ट्रेलर या वीडियो के टुकड़े इंतिजार को अ-धीरज में बदल रहे थे। आज वह दिन हाथ लग ही गया। कुछ रचनाकार होते हैं जिनके लेखन के साथ-साथ उनके जीवन का भी आकर्षण किसी को खींच सकता है। यह व्यक्तिगत रुचि का मसला हो सकता है। मेरे लिए तुलसी, कबीर, ग़ालिब, निराला, मंटो जैसे रचनाकार लेखन के साथ-साथ अपने जीवन का भी आकर्षण रखते हैं। उनके लेखन से गुजरने की तरह उनके जीवन से गुजरना भी अच्छा लगता है। इसलिए यह फिल्म आते ही आज इसे देखने से खुद को न रोक सका और देखने के बाद एक काबिले-तारीफ फिल्म को देखने की खुशी हुई।

यह फिल्म मंटो की उस मूल-वस्तु की मार्मिक प्रस्तुति है जहाँ सच अकेला लड़ता है। झूठ के महाजाल में उलझे हुए, उससे लड़ते हुए, मंटो को पूरी फिल्म में देखा जा सकता है। यह झूठ का प्रपंच सत्ता का है, संस्थाओं का है, समाज का है, व्यक्ति का है, साहित्यकारों का है, साहित्यिक मानदंडों का है और उनसे लड़ने वाला मंटो एक ईमानदार लेखक की तरह अकेला दिखता है। लेकिन एक विश्वास उसमें है जो उसे निडर किये रहता है। यह सर्जक का विश्वास है। निजी जमीर का विश्वास है। यह जमीर पूरी तरह से एक कलाकार का जमीर है। कलाकार जो ‘अपने जमीर की मस्जिद का इमाम किसी दूसरे को नहीं’ बना सकता। वह अपने सच के साथ जूझ मरेगा, उसे यह गवारा है।

वह मंटो जब स्त्री-दुनिया का सच लिखता है तो लोगों से पचता नहीं। जबकि वह कटु सच्चाई है। जब वह विभाजन का बेबाक सच लिखता है तो वह भी नागवार गुजरता है। साहित्यकारों के लिए वह ‘गुड़ घारी हँसिया’ है जिसे वे न लील पा रहे, न उगल पा रहे। इधर मंटो डंके की चोट पर कहता है कि ‘ये अफसाने इस दुनिया की सच्चाई हैं। अगर आप इन्हें नहीं बर्दाश्त कर पा रहे तो यह दुनिया ही नाकाबिले-बर्दाश्त है!’ मुझे कुँवर नारायण (Kunwar Narain) की ‘बिजूका’ कविता की पंक्तियां यह फिल्म देखते हुए याद आ रही थीं। पूरी कविता आप देखें –

“बोलो – ज़रा ज़ोर से बोलो
ताकि वे भी सुन सकें
जो ज़रा ऊँचा सुनते हैं

डरो मत
अगर तुम सच कह रहे हो
तो तुम आफ़त नहीं
एक सच्ची ताक़त हो।

जानता हूँ ज़ोर से बोलोगे
तो असभ्य माने जाओगे

यह हक़ सिर्फ़ झूठ को है
कि वह ज़ोर से बोले
और विशिष्ट बना रहे।

यह फुसफुसाकर धीरे बोलने वाली सभ्यता
बेहद फुसफुसी है।

कौओं का अड्डा है
यह बिजूका!”

‘मंटो’ देखते हुए ‘बिजूका’ (प्रपंच) पर मंडराने वाले अड्डा जमाए एक से एक कौओं को देख सकेंगे। इनमें वे ही नहीं है जिन्हें खल और कसूरवार कहा जाता है, बल्कि वे भी हैं जो समझदार कहे जाते हैं। बिजूका की संस्कृति में फुसफुसाकर बोलने वाले इन मौकापरस्त समझदारों का कम योगदान नहीं है।

Manto with wife Safia (left), sister-in-law Zakia Hamid Jala
फुसफुसाकर बोलने वाली मौकापस्त ‘प्रगतिशीलता’ की हकीकत ‘मंटों’ फिल्म में उजागर हुई है। आजादी और भारत-विभाजन के बाद मंटो पाकिस्तान चले गये लेकिन उनके आइने में दोनों देशों की हकीकत चीखती है। चाहे भारत के तरक्कीपसंद हों, चाहे पाकिस्तान के तरक्कीपसंद हों, उन्हें मंटो नहीं पच रहे। बंबई का तरक्कीपसंद लेखक भी उनको लेकर सहज नहीं है। पाकिस्तान में फैज अहमद फैज जैसा प्रगतिशील भी उन्हें साहित्यिक विशिष्टता के बरअक्स कम-साहित्यिक पा रहा है। वह भी अदालत में! जहाँ तेज-तर्रार होकर सत्ता के खिलाफ और साहित्यकार के साथ आना है, वहाँ किन्तु-परन्तु के साथ हाजिर हैं कर्नल फैज अहमद फैज। इस पर मंटो का यह कहना उनके बेकाक स्वभाव, और फैज के मूल्यांकन, का प्रमाण है कि ‘बेहतर होता कि फैज अहमद फैज भी मुझे फह्हाश (अश्लील) लिखने वाला बोल देते।’

फिल्म के लिए निर्देशक ने जो विषय-वस्तु उठायी है वह बीती, बीसवीं, सदी की है। विगत से हम जो भी व्यक्ति-घटना-वस्तु-संदर्भ लाते हैं, उसकी एक ‘रचना’ कर रहे होते हैं। इस अर्थ में फिल्म मंटो एक रचना है। इस रचना में लाजमी तौर पर अपने वर्तमान के सवालों की मौजूदगी होती है। ऐसा मंटो में भी है। लेकिन यह मौजूदगी सहज संभव हुई है। आज का कोई संदर्भ चस्पा करके नहीं। प्रासंगिकता इससे और सघन होती है। यों भी एक ईमानदार जीवन कब प्रासंगिक नहीं होता! हर युग में यह जीवन जीना चुनौती बना होता है। मंटो होना तब ही कठिन नहीं था, आज भी कठिन है और आगे भी रहेगा।

इस फिल्म में जो सवाल आपको मथते हैं वे आज भी हमारे सामने हैं। ‘पहचान’ का सवाल आज भी उतना ही उग्र है। ‘राष्ट्रीयता’ के सोच की भयंकर सीमाएँ हमारे वर्तमान की जिंदगी का भी सच हैं। सांप्रदायिकता का जहर क्या भारत विभाजन के बाद खत्म हो गया! धर्मांधता की समस्या किस कदर कहर ढा रही, प्रतिदिन का हमारा जीवन इसका गवाह है। ‘अभिव्यक्ति की आजादी’, जिसे मंटो मुकदमे-दर-मुकदमे झेल रहे थे, वह आज भी संकट में है। एक फिल्म-रचना के रूप में यह फिल्म नित-नवीन है। अगर वर्तमान की समस्याओं से आप ऊँघे हैं, तो यह फिल्म आपको झकझोरती है।

निर्देशक ने बड़ी कुशलता से अभिव्यक्ति के प्रति ईमानदार एक रचनाकार की त्रासदी और पूरे समाज की त्रासदी को एक दूसरे में मिला दिया है। जोकि मिली है भी। इसे अलग-अलग देख पाना संभव नहीं है। सिस्टम से लड़ते हुए व्यक्ति के रूप में निराश-हताश और जर्जर हो रहे मंटो के निजी दुख का कौन सा सिरा है जो सामाजिक विडंबना से नहीं मिला है! इस दुख के सागर में पूरे समाज की विकृत चेहरा डूब-उतिरा रहा है। परिवार के बीच में मंटो का दुख देखें या श्याम की मित्रता के संबंध में मंटो का दुख देखें; समाज के घटिया मूल्य और मान्यताएँ कहाँ नहीं बेड़ा गर्क कर रहीं!
  
Manto with his friend Shyam from film Manto
मार्मिक स्थलों को इस फिल्म में महत्व दिया गया है, या कहें कि उन्हें सिनेमाई सघनता दी गयी है। जैसे, ‘आइडेंटिटी’ के सवाल को फिल्म में सिनेमायित होते देखते हैं। समाज में ‘पहचान’ का संकट कितने सूक्षम स्तर पर काम करता है, समस्या पैदा करता है, इसे बताने के लिए मंटो और श्याम की दोस्ती पर्याप्त है। मंटो बंबई नहीं छोड़ने वाले थे। उनकी मां, पिता और बेटा वही दफ़्न हैं। उन्हें बंबई से गहरा लगाव है जिसे जीवन भर नहीं भूल पाते। लेकिन क्या हुआ कि उन्हें बंबई छोड़ना पड़ा। जब अपने प्यारे कलाकार दोस्त श्याम ने भी उनकी पहचान एक मुसलमान ही के रूप में की तब वे टूट गये। भले उसने रोष में बात कही हो। किन्तु यह बात दूसरे कलाकार को तोड़ गयी। ‘मारने भर को तो मुसलमान हूँ ना!’ यह बात एक गहरी चोट और कचोट देती है। यह कील जितनी दोस्ती में गड़ी है, उतनी ही समाज में भी।

सधे हुए संवादों को रखने के मामले में भी यह फिल्म उत्कृष्ट साबित हुई है। वे संवाद क्लासिक हैं ही जिन्हें मंटो के लेखन से लिया गया है। उनकी चमक हमारी आज की रोजमर्रा की जिंदगी में भी फीकी नहीं। ये संवाद जितने ‘बोलते’ हैं उतने ही सोचने के लिए कुरेदने वाले भी हैं। ये संवाद इंसान के पाखंड को बेपर्द करते हैं और पाखंड हर दिशा में फैला है, इसलिए हर तरफ़ सही साबित होते दिखायी देते हैं। जैसे एक संवाद है, जिसमे जन-रुचि के ठेकेदार बनने वाले से मंटो मुखातिब होते हैं - ‘तुम हरगिज यह नहीं तय कर सकते कि इसे पढ़ कर लोग कैसा महसूस करेंगे।’ आज देखिये तो जन-रुचि के ठेकेदारों का यह बड़ा प्रिय तर्क है कि लोग यह सोचेंगे, लोगों की भावना इस तरह आहत होगी, आदि। इसी तर्क से वे कभी किसी रचना या फिल्म पर लोगों से बवाल खड़ा करवाते हैं तो कभी किसी खास तरह की रचना या फिल्म के ‘ढर्रे’ को मजबूती से जनता के ऊपर थोपते जाते हैं। न सोच में नयापन आ पाता है, न ही कला में। जनता यही देखती है या इसी के साथ अच्छा महसूस करती है या यही जनता की माँग है, ऐसा कह कर फिल्मिस्तान ने वाहियात फिल्मों का ढर्रा लंबे समय तक जारी रखते हुए जनता से जो कमाही की और यह ट्रेंड थोड़ी टूट-फूट के बावजूद जारी है, स्वयं में इस बात का गवाह है। प्रयोग और नये-पन को हतोत्साहित करता ‘ट्रेंड’। ‘मंटो’ फिल्म रूढ़ फिल्मिस्तानी ढर्रों पर भी चोट करती है।

फिल्म के एक सीन में नवाजुद्दीन
नंदिता दास को इस बेहतरीन फिल्म को निर्देशित करने के लिए बहुत-बहुत बधाई! नवाजुद्दीन में अभिनय की जो ‘रेंज’ है, वह इस फिल्म में भी बखूबी देखी जा सकती है। मंटो के किरदार को बहुत कायदे से उन्होंने उतारा है। पूरा साध लिया है। गजब का ‘परफेक्शन’ लिए हुए। पर्दे पर जो देश-काल दिखाया गया है, वह मंटो के समय को प्रत्यक्ष करने में समर्थ हुआ है। फिल्म में बंबई और लाहौर दोनों को देखना दिलचस्प है। सबका नाम नहीं ले सकता लेकिन लगभग सारे अभिनय करने वालों ने बहुत सफाई से किरदार निभाया है। मुझे कहीं कोई चूक नहीं दिखी। अंततः मैं यह जरूर कहूँगा कि आप भी इसे देख आइए। जरूरी फिल्म है।

नोट : मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं हूँ। फिल्म देखते हुए मुझे जैसा महसूस हुआ और जैसी मेरी तुरंता प्रतिक्रिया हुई, उसे मैंने शब्दबद्ध कर दिया है। ~ अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी / 22-09-2018

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

जीता रहे यह साहस!

तीन-चार दिन पहले पाकिस्तान के जाने माने पत्रकार हामिद मीर पर हुए जानलेवा हमले की खबर मैंने सुनी। इस समय थोड़ा सुकून इस बात का है कि उन पर हुए प्राणघातक हमले के बाद भी उनकी जान सुरक्षित है और खुद पर हुए इस हमले को बहादुराना ढंग से जीतते हुए वे पुनः ऊर्जावान होंगे; इससे एक किस्म की आश्वस्ति या ढ़ाँढस भी मन में है। उस कार चलाने वाले ड्राइवर का शुक्रगुजार होना होगा जिसने हामिद साहब को बचाने के लिए कार की ड्राइविंग ऐसी की कि गोलियाँ सटीक प्राणघातक स्थलों से अलग जा लगीं। उम्मीद है कि आँत में लगी इन गोलियों से हुई क्षति की भरपाई के बाद पाकिस्तानी जियो-न्यूज के संपादक हामिद मीर पूर्ववत सक्रिय होंगे। आमीन! 

अजीब इत्तेफाक है हामिद मीर से परिचित होने का! मैं जगन्नाथ आजाद की शायरी खोज रहा था यू-ट्यूब पर, तभी एक किनारे की तरफ मैने देखा कि प्रस्तावित वीडियो प्रस्तुतियों में एक ऐसी है जिसमें पाकिस्तान के पहले कौमी तराने के ताल्लुक किन्हीं हामिद मीर की तकरीर है। क्लिक करके मैंने पूरी प्रस्तुति देखी, और जिस पहली चीज ने मन पर गहरा प्रभाव डाला वह यह थी कि पाकिस्तान में तकलीफों की बगैर परवाह किए सच बोलने वालों का जुनून क्या खूब है! इस प्रस्तुति में हामिद मीर एक तरफ थे और दूसरी तरफ वह भीड़ थी जो यह सच मानने के लिए तैयार नहीं थी कि पाकिस्तान का पहला कौमी तराना  कोई जगन्नाथ आजाद लिख सकता है। एक ओर हामिद मीर थे दूसरी ओर राष्ट्रवाद, जो कि प्रायः बदमाशों का झूठ हुआ करता है। सरहद के उस पार हो या इस पार। 

और इस तरह दोस्ती हुई एक दिलेर पत्रकार से। आगे फिर हामिद मीर की कई प्रस्तुतियों को सुनता और सराहता रहा। धीरे धीरे पाकिस्तान के ऐसे कई पत्रकारों को मैंने जाना जो संकट की खांईं में भी सच बोलने के लिए प्रतिबद्ध हैं, बगैर इस बात की चिन्ता किए कि इसकी क्या कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी। ऐसे पत्रकारों से परिचित होना पाकिस्तान के बारे में इस गलत राय को दुरुस्त करता है कि वहाँ मुल्लाइयत/तालिबानियत का ही राज है और उसके खिलाफ बोलने वाला कोई नहीं। सच तो यह है कि वहाँ के बहुत से पत्रकार जीवन की बाजी लगाकर मजहबी रूढियों का विरोध कर रहे हैं और शिकार हो रहे हैं। इसी का प्रमाण है कि वर्ष २०१३ में पाँच पत्रकार और वर्ष १९९० के बाद अब तक पचास से अधिक महत्वपूर्ण पत्रकार शहीद हो चुके हैं। क्या भारत में पाकिस्तान की एक रूढ़ छवि बनाए हुए लोग पाकिस्तान की इस समृद्ध प्रतिरोधी धारा, जिसे अपने जान-माल की कोई परवाह नहीं है, का सम्मान कर सकेंगे। यदि हाँ, तो वे पाकिस्तान को किसी स्टीरियो टाइप इमेज से अलग देख सकेंगे और भारतीय पत्रकारिता के लिए साहस के एक प्रेरणा-स्रोत को देख सकेंगे। इस दृष्टि से सरकार के सत्ता में आने की संभावना देख कर कभी कांग्रेसी तो कभी भाजपाई हो जाने वाली हमारी मौका-परस्त हिन्दुस्तानी मीडिया इन पाकिस्तानी पत्रकारों से कुछ रीढ़-सा पा सके तो यह कम बड़ी बात नहीं होगी। 

खतरों से खौफ न खाने वाले पत्रकार हामिद मीर पर यह कोई पहला कायराना कट्टर-पंथी हमला नहीं है। कुछ ही साल पहले उनकी कार में तालिबानियों ने बम फिट कर दिया था, जिसे संयोगवश देख कर निष्क्रिय कर दिया गया। लेकिन ऐसी घटनाओं के बावजूद, तब से लेकर अब तक हामिद मीर सच को निर्भीक ढंग से रखते हुए तालिबानियों और तालिबानियत-पसंद हुकूमती शक्तियों की आँख की किरकिरी बने हुए हैं। गौर-तलब है कि इस हमले के होने के पहले हामिद मीर ने यह बात कह दी थी कि उन पर हमला होगा और उस हमले की जिम्मेदार आई.एस.आई. होगी। इस बात का उल्लेख उनके परिवार के लोग और जियो-न्यूज के प्रेसीडेंट इमरान असलम भी करते आ रहे हैं। इन बातों के मद्देनजर मौजूदा सरकार की काबिलियत और सामर्थ्य का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह आई.एस.आई पर कुछ नहीं बोल पा रही उल्टे पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय की तरफ से इसकी कड़ी प्रतिक्रिया आई है और चैनल का लाइसेंस रद्द करने की सिफारिस की गई है। इससे पहले भी आई.एस.आई. की तरफ से अपने ऊपर हमले की स्थितियों/संभावनाओं को लेकर वहाँ के कई और विद्वानों-पत्रकारों ने ऐसी बातें कही हैं। चाहे वह आसमां जहाँगीर हों या मारवी सिरमद। या नजम सेठी। पर क्या नवाज सरकार में इतनी कुव्वत है कि वह आई.एस.आई. से लोहा ले सके। बिल्कुल नहीं। और ऐसी स्थिति में पाकिस्तान से तमाम यातनाएँ सहने के बाद अब कनाडा में रह रहे पत्रकार तारेक फतेह का यह कहना सही है कि ‘या तो आप पाकिस्तानी सेना-आई.एस.आई. को बचा लें या फिर पाकिस्तान को! दोनों एक साथ नहीं बच पाएँगे।’ जाहिर सी बात है कि इन कठिन स्थितियों में जो पत्रकार वहाँ रह कर सच बोलने का साहस कर रहे हैं, वे तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन काम कर रहे हैं। 

फिलहाल, हम हामिद मीर की सलामती की दुआ करते हैं। पाकिस्तान के वर्तमान माहौल में हामिद मीर जैसे पत्रकारों का सक्रिय और बुलंद रहना वहाँ की तमाम उपेक्षित और शोषित तबकों की आवा्जों को मजबूत करना है जो अपने हक के लिए जूझ रही हैं और जो ऐसे पत्रकारों के अभाव में बे-आसरा हो जाएँगी। हामिद मीर का रहना पत्रकारिता के उस साहस का जिन्दा रहना है जो बलोचिस्तान के साथ न्याय की गुहार करते हुए सीने में गोलियाँ खाने के लिए तैयार है, जो ‘नाइन इलेवन’ के बाद ओसामा का साक्षात्कार लेने से पीछे नहीं हटता, जो मलाला यूसुफजई के हक में आवाज बुलंद करने से नहीं कतराता जबकि उस समय तमाम पत्रकार तालिबानी धमकी के सामने डरे हुए मलाला को अमेरिकी/अंग्रेजी एजेंट बोल रहे हों! जीते रहें हामिद मीर और जीता रहे उनके संपादन में जारी जियो-न्यूज! जागे पाकिस्तानी आवाम और इस साहस से प्रेरणा ले हिन्दुस्तानी मीडिया! विकराल रात में इन चिरागों की बड़ी अहमियत है:

“इसी खंडहर में कहीं कुछ दिये हैं टूटे हुए,
इन्हीं से काम चलाओ बड़ी उदास है रात!”(फिराक़)
________________________________________

अपडेट: इस आलेख का जिक्र ‘हिन्दुस्तान’ और ‘जनसत्ता’ दोनों अखबारों में हुआ था। दोनों का आभार!

हिन्दुस्तान में  २९-अप्रैल’२०१४ को:

जनसत्ता में ५ मई-२०१४ को: 



मंगलवार, 18 मार्च 2014

चचा ग़ालिब (४) : मेरी दृष्टि में__शमशेर

कल होली थी, तो सोचा यही फोटो साँट दूँ, शमशेर होली के रंग में, फोटो: यहाँ से
[तकरीबन दो साल पहले मैंने ‘चचा ग़ालिब’ श्रृंखला के अंतर्गत तीन पोस्टें लिखी थीं। आज एक लंबे अंतराल के बाद इसी सिलसिले को बढ़ाते हुए यह चौथी प्रस्तुति है। अस्त-व्यस्त जीवन, ठौरे-ठिकाने से दूरी और तितर-बितर मन के चलते कुछ प्रस्तुत कर पाने/सकने का यह सुयोग बहुत विलंब से बन रहा है। कुछ ड्राफ्ट अभी आधे-अधूरे लिखे हुये हैं, उन्हें मौका पाकर प्रस्तुति-योग्य रूप देकर प्रस्तुत करता रहूँगा; जैसी ‘बतकही’ की प्रकृति है - ‘कुछ औरों की कुछ अपनी’, उसी के अनुरूप। आज चौथी प्रस्तुति के रूप में शमशेर बहादुर सिंह द्वारा लिखा यह लघु आलेख प्रस्तुत है, ‘ग़ालिब: मेरी दृष्टि में’।: संपादक] 

“ग़ालिब: मेरी दृष्टि में”__शमशेर

ग़ालिब खुद एक बड़ा हीरो है अपनी व्यापकता के केन्द्र में, जो कि स्पष्ट एक आधुनिक चीज है। व्यक्ति का निर्बाध अपनापन। हर बात में अपने व्यक्तित्व को – अपने निजी दृष्टिकोण को - सामने रखना। मैं खुद किस पहलू से सोचता हूँ, किस ढंग से महसूस करता हूँ, यह उसके लिए महत्व की बात है। 

हर बात की तह में जाने की – विशिष्ट तौर पर उसका मर्म समझने की – उसकी कोशिश सर्वत्र प्रकट है।

उसकी मुसीबतें, उसका संघर्ष, जिसको वह कभी छिपाता नहीं… उसके शब्दों में हू-ब-हू आधुनिक सा लगता है। अजब बात है। उसमें आज के, आधुनिक साहित्यकार की-सी पूरी तड़प और वेदना के बीच, एक तटस्थ यथार्थवादी दृष्टि है। उसका यथार्थवाद निर्मम है। मुक्तिबोध और निराला, अपने भिन्न संस्कारों के अस्त-व्यस्त परिवेश में, उसको कुछ-न-कुछ प्रतिबिंबित करते हैं। निराला का यह प्रिय शेर था:

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।

क्या ताज्जुब है जो उसके युग ने उसको नहीं पहचाना।

अगलों के काव्य-शिल्प को वह अंदर से ग्रहण करता है: उस शिल्प की आंतरिक, प्रातिभ, योजना को मात्र शब्दों और मुहावरों को, उसके प्रयोग की रीतियों को, उन उस्तादों के जीवंत प्रयोगों से ग्रहण करता था, अपने खास तेवर के साथ।

लोगों ने सही कहा है कि जो शख्स एक अर्से से अंग्रेजी अलमदारी और कानून-व्यवस्था और नीतियों को निकट से और विचारपूर्ण दृष्टि से देखता आ रहा हो, जो कलकत्ते के वातावरण को भी अच्छी खासी तरह सूँघ आया हो, वह जीविका के लिए मुग़ल दरबार से बँधा रहकर भी, अपनी चेतना में पिछले युग से जुड़ा हुआ नहीं रह सकता। इस अर्थ में ग़ालिब अपने युग में अकेला था। 

वह कसीदे वह कसीदे लिखता है तो अपने आश्रयदाताओं की प्रशस्ति – जो कसीदे का बहरहाल आवश्यक अंग है – उसका मुख्य उद्देश्य नहीं होती। बल्कि अपनी प्रतिभा का ओज, काव्यकला पर अपना पूर्ण अधिकार, अर्थात्‍ कसीदे की विधा का सांगोपांग पूर्ण स्वरूप प्रस्तुत करना – अपने समकालीनों को दिखाना: यह होता था उसका काव्यात्मक उद्देश्य। 

कुछ जैसे निराला को रवीन्द्रनाथ से होड़-सी रही, ग़ालिब भी पूर्ववर्ती उस्तादों की श्रेणी में सगर्व अपने को रखता था।

कभी-कभी क्या, अक्सर ऐसा लगता है कि वह समाज में, अपने जीवन में, प्रायः हर ओर विरोधाभास देखता है। हर चीज एक विडंबना का भाव लिए हुए होती है। हर वस्तु प्रश्न से चिह्नित। हर बात जो सही सोची जाती है, वह उल्टी निकलती है। …ग़ालिब जैसे खरे और सच्चे लोगों के लिए क्या यही नियति है? ईमानदारी का कोई मतलब नहीं? सौंदर्य और प्रेम का भी अंत क्या? सारी व्यवस्थाएँ एक तमाशा जैसी हैं। रीति-नीति, आचार, दर्शन-दृष्टि, लौकिक संबंध … सब।

शायद एक चीज जो स्थायी है वह कला है – और वह ग़ालिब के लिए ग़ालिब की अपनी कला। इस कला में* मर्म में स्थित कवि पूर्णतया आश्वस्त निर्द्वंद्व और अमर-सा दिखता है। कम-से-कम स्वयं को, अपनी दृष्टि में। …और बहुत बाद में हमको भी वह वैसा ही दिखता है। 

ग़ालिब का सूफी भाव सूफियों की परंपरा से एकदम भिन्न और मात्र उसका एकदम अपना ही मालूम होता है। अगर ग़ालिब के सूफी भाव की स्थिति का विश्लेषण किया जाय तो वह शायराना रिवायत कतई न होते हुए भी, कहीं अनीश्वरवादी और कुछ-कुछ अस्तित्ववादी सूफीवाद निकलेगा!! यह पारिभाषिकता आधुनिक है। 

अपनी कला पर ग़ालिब का कितना दृढ़ विश्वास है। अपने सर्वोपरि होने से उसे किंचित भी संदेह नहीं। देखिये, उसका सेहरा देखिये। उसकी फारसी ग़ज़ल, जिसमें उसने भविष्यवाणी की है कि आगामी युगों में ही उसकी सही पहचान हो सकेगी, हालाँकि तब बहुत से मूर्ख भी उसको समझने-समझाने का दावा करेंगे। अपने समकालीन विद्वान मौलाना आजुर्दा को वह तमककर कहता है – अगलों के गुणगान करते तुम नहीं थकते, मगर तुम्हारी आँखों के सामने जो महाकवि बैठा अपनी रचना सुना रहा है, उसको पहचानने की शक्ति नहीं रखते, कितने आश्चर्य की बात है!

मुझे ऐसा लगता है कि ग़ालिब की दिलचस्पी किसी प्रकार के आदर्शवाद में नहीं थी। थी तो केवल इंसान में। उसके विडंबनापूर्ण मगर हौसलेमंद जीवंत नाटक में। और इसलिए कि आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्साँ होना! वह स्वयं कितना बड़ा इंसान था, हाली के मार्मिक शब्द इसकी पुष्टि करते हैं।

इतनी निर्भीकता से अपनी और परिवेश की यथार्थ स्थिति को स्पष्ट, ज्यों-का-त्यों रखने वाला गद्यकार उर्दू में आगे फिर नहीं हुआ। और उसके सबके यहाँ तकल्लुफ़ात के पर्दे हैं। एक केवल इसके यहाँ नहीं। उसके पत्र इसका सबूत हैं। 

यह कम कौतुक की बात नहीं कि हिंदी-संसार में ग़ालिब के लिए अलग ही ख़ाना है और शेष उर्दू के लिए अलग। जहाँ उर्दू से बिलगाव की भावना है, ग़ालिब से नहीं। इतने दुरूह कवि होते हुए भी ग़ालिब हिन्दी पाठकों के अपने हो गये। ऐसा क्यों है; इसका जवाब देना आसान नहीं है।

संदर्भ:
तु अय्‌ कि मह्‌वे-सुख़नगुस्तराने-पेशीनी
मबाश मुन्किरे ‘ग़ालिब’ कि दर ज़्मानए तुस्त।

साभार: पुस्तक - “कुछ और गद्य रचनाएँ”_शमशेर बहादुर सिंह / राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली

मंगलवार, 7 मई 2013

रीतिकाल की कविता का एक गहरा ऐतिहासिक और राजनीतिक पक्ष भी है__मैनेजर पाण्डेय

[दिल्ली विश्वविद्यालय के वेंकटेश्वर कॊलेज में १९ फरवरी-२०१३ को ‘मध्यकालीन हिन्दी कविता’ पर एक व्याख्यान आयोजित किया गया था। यह व्याख्यान प्रख्यात आलोचक मैनेजर पाण्डेय ने दिया था। इस व्याख्यान को लिखित रूप में यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। व्याख्यान में विशेष रूप से मध्यकाल के अंतर्गत समाविष्ट रीतिकाल (उत्तर-मध्यकाल) पर कुछ ऐसी महत्वपूर्ण बातें कही गयी हैं जो रीतिकाल पर अब तक के मूल्यांकन को प्रश्नविद्ध करती हैं और हिन्दी साहित्येतिहास के इस कालखंड पर नए सिरे से सोचने को बाध्य करती हैं। यह व्याख्यान अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। : संपादक]
______________________________________________________________________________

रीतिकाल की कविता का एक गहरा ऐतिहासिक और राजनीतिक पक्ष भी है!
*मैनेजर पाण्डेय 

ध्यकाल जिसे कहते हैं उसको दो संदर्भों में देखना चाहिए। साहित्य के इतिहास का काल विभाजन प्रायः समाज के इतिहास के काल विभाजन के आधार पर ही होता है। इसमें कभी-कभी विडंबनापूर्ण स्थितियाँ भी होती हैं। जो स्वाभाविक है उसकी चर्चा बाद में और जो विडंबना है उसकी चर्चा पहले। हिन्दी साहित्य में एक काल आदिकाल है। आदिकाल कहने से समाज के इतिहास के प्रसंग में ऐसा अर्थ निकलता है कि जैसे यह तब का काल होगा जब हम लोग यानी भारत का समाज जंगलों में रहता होगा। ऐसा नहीं है। यहाँ आदिकाल शुद्ध साहित्य से जुड़ा हुआ आदिकाल है। लेकिन हिन्दी साहित्य का जो मध्यकाल है वह भारतीय समाज का भी मध्यकाल है। मतलब, मध्यकाल जो हिन्दी साहित्य का है उसके दो हिस्से हैं। पहला हिस्सा भक्तिकाल का है और दूसरा हिस्सा रीतिकाल का है। समाज के इतिहास के हिसाब से देखिये, हिन्दी वालों के लिए मैं कह रहा हूँ देश भर के नहीं, तो एक तरह से जो भक्तिकाल का साहित्य है वह लगभग विद्यापति से शुरू होता है, और यह बहुत लोगों को भ्रम है न जानने के कारण कि भक्ति कविता एक तरह से मुगल काल के साथ खत्म हो गयी। ऐसा नहीं है। वैसे स्वयं मुगलकाल भी उन्नीसवीं सदी तक आता है। आप लोगों में से सबको यह तो मालूम ही होगा कि अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर थे, १८५७ ई. के विद्रोह के समय जिनको अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया, उनके सारे परिवार को मार डाला और स्वयं बहादुर शाह जफर को रंगून भेज दिया। यह ऐसा प्रसंग है जिसको याद करते ही थोड़ी भी देश के प्रति प्रेम-भक्ति का भाव होगा तो खून खौलने लगता है। हम जब इस समय आपसे बात कर रहे हैं उस समय उसी देश का प्रधानमंत्री हमारे देश के महान नेताओं से वार्ता के लिए आया हुआ है। ब्रिटेन का प्रधानमंत्री आया हुआ है। खैर, मैं जो मूल बात आपसे कह रहा था वह यह कि रामचंद्र शुक्ल ने एक बात लिखी है और ठीक लिखी है, उन्होंने कहा है कि हिन्दी साहित्य की एक विशेषता यह है कि इसमें साहित्य की जो एक परंपरा शुरू हो जाती है वह कभी मरती नहीं है। पर नामकरण तो प्रधानता के आधार पर होता है कि जो प्रवृत्ति प्रधान होती है उसके आधार पर उस काल का नाम रख दिया जाता है। जाहिर है कि भक्तिकाल विद्यापति से लेकर और लगभग समझिए कि मुगल काल के मध्य तक, शाहजहाँ तक, भक्तिकाल के सारे बड़े कवि समाप्त हो चुके थे पर भक्ति कविता हिन्दी साहित्य के रीतिकाल में भी मौजूद थी और उन्नीसवीं सदी तक आती है। अब भी हिन्दी में कुछ कवि मिल जाएंगे आपको वृंदावन में, अयोध्या में जो उसी ढ़ाचा-खाका में कविता लिखते हैं। मेरे पास अभी कुछ दिन पहले आगरा विश्वविद्यालय से डी.लिट. का एक शोध-प्रबंध आया था, आज के किसी भक्त कवि की कविता का इतना बड़ा पोथा था, जाहिर है कि मैं न उस कवि को जानता था न उसकी कविता को जानता था इसलिए मैने थीसिस लौटा दी, कि मैं जिसको जानता नहीं उस पर लिखी हुई थीसिस का मूल्यांकन नहीं करूँगा। खैर, यह जो मध्यकाल है उसकी अनेक विशेषताएँ हैं। मैं उसकी विस्तार से बात नहीं करूँगा, विस्तार से बात आपके सामने मैं थोड़ी देर में इसी के एक हिस्से रीतिकाल की करूँगा। वैसे ही आपका विश्वविद्यालय रीतिकाल का गढ़ माना जाता है। मुझे नहीं मालूम कि रीतिकाल की बाकी विशेषताएँ बाकी विश्वविद्यालय में हैं कि नहीं पर रीतिकालीन कविता को पढ़ने-पढ़ाने और उसी को कविता मानने की परंपरा नगेंद्र जी से शुरू होकर अब तक मौजूद है, उनके जो भी शिष्य और शिष्य के शिष्य हैं वे सब उसी रीतिकाल में ही घूमते हैं। इसलिए उस पर बात करना मुझे ठीक लगा और मैने वही विषय चुना है। पर व्यापक रूप से मध्यकाल जिसमें भक्तिकाल और रीतिकाल दोनों आते हैं, उसकी दो एक विशेषताओं की चर्चा करके मैं रीतिकाल पर आउँगा। 

पहली विशेषता यह है, पता नहीं आप लोगों ने कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि नहीं कि भक्तिकाल की और भक्ति काव्य की अखिल भारतीय स्तर पर पहली और बुनियादी विशेषता यह है कि प्रत्येक भक्त कवि अपनी मातृभाषा का कवि है। प्रत्येक भक्त कवि कह रहा हूँ, मुझे आज तक कोई अपवाद मिला नहीं है। एक तरह के अपवाद तो हैं जो अपनी मातृभाषा के अलावा दूसरी भाषा में भी कविता लिखते हैं। जैसे स्वयं विद्यापति। विद्यापति तीन भाषाओं में कविता लिखते थे, संस्कृत में, अवहठ्ठ या अपभ्रंश में और अपनी मातृभाषा मैथिली में। पर महाकवि किसके हैं, संस्कृत के महाकवि नहीं हैं, अपभ्रंश के भी महाकवि नहीं है, महाकवि वो मैथिली के ही हैं। उसी तरह तुलसीदास अवधी में कविता लिखते थे और ब्रजभाषा में भी, पर ब्रजभाषा के महाकवि वो नहीं हैं। ब्रजभाषा के महाकवि सूरदास हैं। तुलसीदास अवधी के ही महाकवि हैं। इसलिए मैने कहा कि कुछ प्रतिभाशाली कवि अपनी मातृभाषाओं के अलावा दूसरी भाषाओं में भी कविता लिखते हैं पर बुनियादी महत्व तो उनकी मातृभाषा वाली कविता का है।
     
Photo: Amrendra N. Tripathi 
दूसरी विशेषता मध्यकाल की यह है कि जो मातृभाषाओं में कविता लिखी गयी तो संस्कृत के पंडितों और फारसी के मुल्लाओं ने इसका बहुत विरोध किया। पता नहीं आपको मालूम है कि नहीं, अपना देश दो चीजों के लिए बहुत प्रसिद्ध है, पहली बात तो यही है कि यहाँ अश्लीलता को रेशमी चादर से ढक कर उसको शालीनता कहते हैं और संस्कृति भी। इस दिल्ली शहर में कैसे अश्लीलता को रेशमी चादर से ढकते हैं इसका प्रमाण इस दिल्ली शहर में औरतों के साथ हुई एक हजार ज्यादतियाँ हैं। एक साथ दोनों काम करते हैं, मंत्र भी जपते हैं ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ..’ और स्त्रियों की पूजा करने के नाम पर उनके साथ जो जो करते हैं उनमें से अधिकांश तो कहने लायक नहीं है। इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि अश्लीलता को शालीनता की रेशमी चादर में ढक कर उसे संस्कृति कहते हैं। दूसरा क्या है, सच को छुपाना और झूठ को मुलम्मा लगा कर पेश करना, यह एक पुरानी आदत है। यह जो विरोध हुआ वह कितनी दूर तक गया, उसके दो प्रमाण मैं दूँगा, ज्यादे नहीं। पचासों मेरे पास हैं। मराठी के एक भक्त कवि थे, संतकवि ज्ञानदेव। उनकी प्रसिद्ध रचना है, ज्ञानेश्वरी। मराठी का महान काव्य माना जाता है उसे। असल में ज्ञानेश्वरी ओबी छंद में है। इस ओबी छंद का ईजाद किया था ज्ञानेश्वर ने। ओबी छंद इसके पहले मराठी में नहीं था, देश में भी नहीं था। उन्होंने इस छंद को गढ़ा। उन्होंने ओबी छंद में और मराठी भाषा में गीता का अनुवाद किया है अर व्याख्या भी की है। उसके तीसरे अध्याय की सत्रहवीं ओबी में ज्ञानेश्वर ने एक ऐसी बात लिखी है जिसे भारतीय समाज, संस्कृति और भाषाओं के इतिहास का सबसे क्रांतिकारी वाक्य मैं मानता हूँ। यह मैं पहले आपसे हम चुका हूँ कि वह गीता का अनुवाद है तो यह भी आप जानते ही हैं कि गीता अर्जुन और कृष्ण के बीच संवाद है। उस तीसरे अध्याम में अर्जुन कृष्ण से कहते हैं, ध्यान रखिए ज्ञानेश्वर के अर्जुन संस्कृत के अर्जुन नहीं, कि आप जो कुछ कह रहे हैं वह बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन बहुत गूढ़ है। मेरी समझ में नहीं आ रहा है। इसलिए इसको सरल मराठी में समझा कर कहिए। पहली बार एक मनुष्य ने, अर्जुन कुलमिलाकर एक मनुष्य ही तो थे ईश्वर तो कृष्ण थे, ईश्वर से कहा कि मेरी भाषा बोलो। आप जिस भाषा में कह रहे हो वह बहुत मुश्किल है इनलिए मेरी भाषा बोलो। तो इसका परिणाम क्या हुआ जानते हैं? यह जो कठन उनहोंने किया यानी कि संस्कृत से महत्वपूर्ण अपनी मातृभाषा को बनाया, परिणाम यह हुआ कि पंडितों ने इक्कीस वर्ष की आयु में ज्ञानेश्वर को जीवित समाधि लेने के लिए मजबूर किया। यह तो हत्या करना है और बुरी तरह हत्या करना है। हत्या तो एक मिनट में हो सकती है, पर जीवित समाधि में जो आदमी होगा वह तो दो एक दिन में मरेगा। 

उसी तरह से मराठी के संत तुकाराम के साथ हुआ। मराठी संत तुकाराम जाति के माली थे। ब्राह्मण तो थे नहीं। इनसे कहा गया कि ये माली-वाली को अधिकार नहीं है कि ज्ञान का उपदेश दे इसलिए अपना यह लिखा पढ़ा फेंको। एक कवि अपनी बात कह रहा है वह चाहे जुलाहा कवि कबीर हो या माली कवि तुकाराम, वह फेंक काहे दे। तो पंडितों ने एक चाल चली और कहा कि तुम इसको नदी में डुबो दो और ईश्वर की कृपा होगी तो यह ऊपर आ जाएगा, नहीं तो हम मान लेंगे कि यह डूबने लायक थी। अब आपसे अलग से क्या यह बताने की जरूरत है कि ऋगवेद से लेकर भगवत्‌ गीता तक की किताबें नदी में डुबोयी जाएं तो सब डूब जाएगी। कौन नहीं डूबेगी! उसमें तो स्वयं भगवान ही मौजूद हैं। वो भी डूब जाएंगे उसी में। यह चाल चली उन्होंने। कहा जाता है कि, बाकी तो कथा है, तुकाराम ने पंडितों के कहने पर फेंका – मुझे तो हमेशा लगता है कि पंडितों ने तुकाराम से जबदस्ती छीनकर नदी में फेक दिया – लेकिन डूबा नहीं वह। जो भी हुआ, बाद में तुकाराम घर में रहने के बदले जंगलों में घूमने लगे और कभी घर लौटे ही नहीं। मेरा अपना अनुमान यह है कि उनको मार दिया जंगल में। मराठी में जानते हैं कथा क्या चलती है, फिल्म बनी है तुकाराम पर जो हर साल दिखायी जाती है जिसमें दिखाया जाता है, सीधे स्वर्ग से विमान आया और तुकाराम को सशरीर स्वर्ग ले गया। जिन लोगों ने मारा वे सभी क्यों नहीं गये, स्वर्ग तो सब लोग जाना चाहते हैं! यह जो प्रवृत्ति है यह भी आपके यहाँ की ही प्रवृत्ति है। 

मैं एक घटना आपको सुनाऊं चलते चलते। मैं जब कोई काम करता हूँ तो काफी गहरी खुदाई करता हूँ। जब मैने ज्ञानेश्वरी पढ़ी और जब यह वाक्य, अर्जुन का कृष्ण से कथन, दिखाई पड़ा तो मुझे यह वाक्य बहुत ही महत्वपूर्ण लगा, अभी थोड़ी देर पहले आपसे मैने कहा था कि मेरी जानकारी में भारतीय समाज में भाषाओं के इतिहास का सबसे क्रांतिकारी वाक्य है। मैंने इसका हिन्दी अनुवाद खरीदा जो साहित्य अकादमी से छपा है और अंग्रेजी अनुवाद खरीदा जो भारतीय विद्याभवन बंबई से छपा है। दोनों में दो काम एक साथ हुए हैं। दोनों अनुवाद करने वाले मराठी लोग हैं। दोनों की भूमिकाओं में ज्ञानेश्वर को लगभग ईश्वर जैसा दर्जा दिया गया है पर दोनों अनुवादों में यह वाक्य बदल दिया गया है कि ‘सरल मराठी में समझा कर कहिए’। इसके बदले लिखा हुआ है कि ‘सरल भाषा में समझा कर कहिए’। माने, संस्कृत से जो प्रेम है वह भारी पड़ा ज्ञानेश्वर से प्रेम पर। यह अपने यहाँ की जानी पहचानी प्रवृत्ति है। पर ऐसी इतनी प्रवृत्तियाँ हैं कि मैं उसी पर ध्यान दूं तो आज का भाषण उसी पर हो जाएगा। पर वह मैं नहीं करूँगा। 

यह जो मध्यकाल है, उसका जो रीतिकाल है, उसके बारे में जो कहना है उसे मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ। पहली बात तो यह कि हिन्दी आलोचना में महावीर प्रसाद द्विवेदी और बाद में रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकाल के विरोध में बहुत सारा लिखा और दृष्टिकोण बनाया। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी नवरत्न की समीक्षा लिखी थी। बाकी उनका छोड़ भी दीजिए, उसको देखिए तो उनका जो रीतिकाल विरोधी दृष्टिकोण है वह दिखाई देगा। यही काम अचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया। ये दो हिन्दी के इतने बड़े आलोचक थे कि बाद के लोगों ने उन्हीं की बातों को मिर्च मसाला लगा कर कभी थोड़ा घटा कर कभी थोड़ा बढ़ा कर पेश किया। नया किसी ने लिखा हो, नगेंद्र जी समेत, ऐसा नहीं है। रामचंद्र शुक्ल का आरोप क्या था? पहला आरोप यह था कि इस कविता में श्रृंगारिकता बहुत है। यद्यपि आचार्य शुक्ल मन से स्वयं श्रृंगारिक व्यक्ति थे।एक महिला से प्रेम भी करते थे। इसलिए, ठाकुर का एक छंद उनको बहुत प्रिय था, मुझे लगता है उनके मन से मिलता होगा, बार बार उसको दुहराया है। मैं अपको सुना से रहा हूँ:

“वा निरमोहिनि रूप की रासि जऊ उर हेतु न मानति होइहैं। 
आवत जात घरी घरी मेरो सूरति तो पहिचानति होइहैं। 
ठाकुर या मन की परतीति है, जो पै सनेह न मानति होइहैं। 
आवत हैं नित मेरे लिए इतना तो विशेष के जानति होइहैं।।” 

इसको आचार्य शुक्ल ने अपने चार लेखों में उद्धृत किया है, इतिहास के साथ। इससे उनकी मानसिकता का पता चलता है। लेकिन यही काम जब रीतिकाल के कवि कर रहे थे तो शुक्ल जी को पसंद नहीं था। 

आचार्य शुक्ल को दो और बातें पसंद नहीं थीं। उनके नापसंद करने का आधार है, ऐसा नहीं कि उन्होंने निराधार कहा लेकिन जो है वही मैं कह रहा हूँ। एक बात उनको पसंद नहीं थी और यह रीतिकाल की कमजोरी है; नायिका-भेद का विस्तार। अपार है वह। सात बरस की बच्चियों से लेकर सत्तर बरस की बुढ़ियाओं तक सब नायिकाएं हैं। अरे कोई स्त्री भी होगी! जो नायिका के अलावे हो। आचार्य शुक्ल को सबसे अधिक नाराजगी इसी बात से थी इसीलिए आचार्य शुक्ल ने बहुत कड़ा वाक्य रीतिकाल के बारे में लिखा है। लिखा है, रीतिकाल में कविता बँधी नालियों में बहने लगी। लेकिन इसका एक दुश्परिणाम यह हुआ कि हिन्दी के बाद के आलोचकों ने रीतिकाल की कविता को समग्रता में पढ़ने-समझने और मूल्यांकन करने के बदले रामचंद्र शुक्ल की बातों को दुहराना शुरू किया। अब कह गये हैं आचार्य शुक्ल, अरे आचार्यस शक्ल ने पढ़-वढ़ के कहा था। बाद के बहुत लोगों ने बिना पढ़े ही कहा, क्योंकि पढ़ते तो कुछ और ऐसा दिखाई देता जो मैं आपके सामने अभी रखने वाला हूँ। 

रीतिकाल के बारे में मेरी पहली बात यह है कि अपने समय के समाज और इतिहास से जैसा संबंध रीतिकाल की कविता का है वैसा संबंध भक्तिकाल में भी नहीं है। प्रमाण क्या है? मैं कोई रीतिकाल का प्रेमी नहीं हूँ। अभी ठीक बताया गया कि मैने पूरी किताब लिखी है, ‘भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य’। मैं स्वयं भक्तिकाल का प्रेमी हूँ। पर जो जहाँ है उसके बारे में बात की जाएगी न, जो वास्तविकता है, सच्चाई है। देखिए, रीतिकाल के सबसे बड़े कवि माने जाते हैं केशव दास। अपने समय और समाज के इतिहास से केशव दास की कविता का क्या संबंध है? केशव दास की दो रचनाएं हैं, जो सीधे इतिहास से जुड़ी हुई हैं मित्रों! मैं बाकी रामचंद्रिका आदि की बात नहीं कर रहा हूँ। एक उनका प्रबंध काव्य है, ‘वीर सिंह देव चरित’। मैं दावे के साथ आपसे कह रहा हूँ कि रीतिकाल के बहुत सारे प्रेमियों ने इसे देखा ही नहीं है, बस नाम गिना देंगे। क्या है उसमें, उसमें मध्यकाल के इतिहास की जटिल समस्याएं हैं। मुगल काल के इतिहास की खास तौर से। आप में से जो इतिहास के छात्र होंगे, उनको यह मालम होगा कि अकबर के समय से और उनके राज्य-काल से संबंधित दो बड़ी घटनाएँ हुईं। पहली घटना यह हुई कि उनके पुत्र सलीम ने, जो बाद में जहाँगीर बना, विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह की घटना ‘वीर सिंह देव चरित’ में है। उसी विद्रोह का एक और नतीजा हुआ कि सलीम ने वीर सिंह, जो ओरछा का राजा था बहुत शक्तिशाली और प्रभाव शाली, की मदद से अबुल फजल की हत्या करवाई। यह सब वीर सिंह देव चरित में है। आप बताइये, हमारा हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग माना जाता है भक्तिकाल, केशव दास और तुलसीदास बहुत दूर तक समकालीन थे मतलब दोनों अकबर के जमाने में जीवित थे, भक्तिकाल के किस कवि ने मुगल शासन के बारे में लिखा है। किस कवि ने? हमारे जो परम आदरणीय बाबा तुलसीदास हैं, उन्होंने तो यह घोषित कर दिया – कीन्हें प्राकृत जन गुनगाना / सिर धुनि गिरा लागि पछिताना। यानि, अपने समय के किसी मनुष्य की कविता में चर्चा करना सरस्वती का अपमान है, तो राम का गुणगान करेंगे। सारा भक्तिकाव्य परलोकवाद की चिंता से लिखा गया है। सारा रीतिकाल अपने समय और अपने समाज की चिंता से लिखा गया है। उसमें कोई परलोकवाद नहीं है। और जो परलोकवादी हैं उनके बारे में रीतिकाल के ही एक कवि ने कहा कि ‘राधा कन्हाई सुमिरन को बहानो है’, वास्तविक भक्ति नहीं है, बहाना है वह। कहना तो है किसी स्त्री और पुरुष के बारे में कुछ, तो डर लगता है कि ज्यादा कहेंगे तो पिटाई-विटाई होने लगेगी। परसाई जी ने एक व्यंग्य लिखा था कि कविता में सर्वनामों का प्रयोग क्यों होता है। अधिकांश कविताएं ‘वह’ में लिखी जाती हैं। परसाई जी ने कहा कि वह में न लिखा जाय, संज्ञा में नाम लेकर लिखा जाय तो कोई चप्पल लेकर पहुँच जाएगी न घर पर! इसलिए सर्वनाम ही बचाता है। वही हाल है, अपने समय और समाज की चिंता नहीं है। खैर, हिन्दी में केवल एक आलोचक ने, आप लोगों के जो छात्र हैं उनकी मदद के लिए कह रहा हूँ, केशव दास के इस काव्य के ऐतिहासिक महत्व पर विचार किया है। मिल जाए किताब कहीं तो पढ़िए। किताब मैं लेकर आया हूँ आपको दिखाने के लिए। यह किताब है चंद्रबली पांडेय की ‘केशव दास’ नाम से। कोई हिन्दी का आलोचक इसका नाम नहीं लेता। जानते भी नहीं हैं लोग। उसके बाद केशवदास की दूसरी किताब है, यह थोड़ी छोटी है, ‘जहाँगीर जस चंद्रिका’। मुझे लगता है कि इसके बारे में बिना बताए भी आप सीधे समझ जाएंगे कि सीधे मुगल इतिहास से जुड़ी है। मैं केशव दास के बारे में बहुत कुछ सोच कर आया था, मेरे पास नोट्‌स हैं, वह भी आपसे कहना चाहता था पर अब समय नहीं है। दूसरी एकाध बातें और कहूँगा। 

केशव दास ने इसी ‘वीर सिंह देव चरित’ में राजनीति की विस्तार से चर्चा की है। रूपक में। यानि, केशव दास एक राजनीतिक कवि भी हैं। केश दास ने एक ऐसे शब्द का उपयोग अपनी कविता में किया है जिसका उपयोग आज के कवि करते हैं, ‘जनपद’। मैंने भक्ति काव्य बहुत पढ़ा है लेकिन मेरी जानकारी में किसी ने जनपद शब्द का उपयोग किया हो, मुझे नहीं मालूम। उसका संदर्भ लेकर आया हूँ आपके सामने लेकिन पढ़ूँगा नहीं। उसी ‘वीर सिंह देव चरित’ में। जनपद जैसे एकदम आधुनिक शब्द है, कोई नहीं जानता कि यह वहीं से आया है। आप लोगों को मालूम है कि आज कल जिला को या सब डिवीजन को जनपद भी कहा जाता है। जनपद वैसे बहुत पुराना शब्द है। हिन्दी के एक कवि हैं त्रिलोचन, उनकी कविता की किताब ही है, ‘उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है!’ इसलिए केशव दास पर ठीक से पुनर्विचार करने की जरूरत है। उनकी ऐतिहासिक दृष्टि, उनकी राजनीतिक-चेतना पर नए सिरे से काम करने की जरूरत है पर उसके लिए मेहनत करनी पड़ेगी। आज कल लड़के-लड़कियाँ रिसर्च के नाम पर यात्रा कहाँ से कहाँ तक करते हैं, ‘एक हॊस्तल से दूसरे हॊस्टल तक’। माने, लड़के लड़कियों के हॊस्टल तक और लड़कियाँ लड़कों के हॊस्टल तक, बस।इससे ‘वीर सिंह देव चरित’ नहीं मिलेगा। ‘वीर सिंह देव चरित’ या चंद्रबली पांडेय की किताब किसी पुरानी लाइब्रेरी में मिलेगी। 

दूसरे इस काल के कवि जिनका सीधे इतिहास से संबंध है वे हैं भूषण। भूषण औरंगजेब के जमाने के कवि हैं। भूषण शिवा जी के समय के कवि हैं। मेरा ख्याल है यह तो आप लोगों को मालूम होगा कि उनके तीन ग्रंथ हैं और तीनों का संबंध इतिहास से है। ‘शिवराजभूषण’, यह शिवा जी पर है। ‘शिवाबावनी’, यह भी शिवा जी पर है। और उस समय ही मध्य प्रदेश के एक बहादुर राजा थे छत्रसाल, उनपर उनकी एक काव्य पुस्तक है, ‘छत्रसाल प्रकाश’। इसका सीधे संबंध इतिहास से है। इस बात को और भी कम लोग जानते हैं, मित्रों थोड़ी देर में उसकी और चर्चा करूंगा मैं, कि जिस समय औरंगजेब शासन कर रहा था (आप लोगों को मालूम है कि १७०७ ई. में मरा वह) तब तक इस देश में अंग्रेज आ गये थे। रीतिकाल के चार कवि ऐसे हैं जो अंग्रेजों के आने से चिंतित थे। रामचंद्र शुक्ल ने भारतेंदु के प्रसंग में लिखा है कि जीवन दूसरी ओर जा रहा था और कविता दूसरी ओर जा रही थी यानि कि छाती पर अंग्रेजी साम्राज्यवाद चढ़ रहा था और कवि नायिका भेद की कविता कर रहे थे, यह पूरा सच नहीं है मित्रों। आप लोगों में से जिसको फुरसत हो, मैं किताब का नाम और छंद का नाम बता रहा हूँ भूषण के, उनकी किताब है ‘शिवराज भूषण’ उसमें छंद संख्या ११६ और २६१ इन दोनों में अंग्रेजों की चिंता है। ‘शिवाबावनी’ में छंद नं. १५ में अंग्रेजों की चिंता मौजूद है। 

रीतिकाल के आखिरी महत्वपूर्ण कवि थे पद्माकर। मैं आपको पद्माकर का एक पूरा छंद पढ़ कर सुना रहा हूँ और तब आपको मालूम होगा कि रीतिकाल के कवि किस तरह से अंग्रेजों के आने से चिंतित थे। उस समय ग्वालियर का राजा था सिंधिया, बहुत प्रसिद्ध, माना जाता था बहादुर भी था, (माना जाता था इसलिए कह रहा हूँ कि मध्यकाल में बहादुर होने का एक ही अर्थ था कि कौन कहाँ से कितनी औरतों को भगा कर ले गया है, यही बहादुरी का एक प्रमाण था, वहाँ हर लड़ाई में यही होता था, मुझे नहीं मालूम सिंधिया ने यह भी किया था या नहीं, खैर) पद्माकर ने उनको एक चिट्ठी लिखी कविता में, मैं वही चिट्ठी या कविता पढ़ रहा हूँ(कविता से मालूम होगा कि पद्माकर को मालूम था कि अंग्रेज कहाँ कहाँ अपनी जड़ जमा रहे हैं धीरे धीरे): 

“मीनागढ़, बंबई, सुमंद, मंदराज, बंग, 
बंदर को बंद कर बंदर बसाओगे। 
कहैं पद्माकर कसक कश्मीर हूँ को, 
पिंजर सो घेरि के कलिंजर छुड़ाओगे। 
बाका नृप दौलत अलीजा महराज कभौ, 
साजि दल पकड़ फिरंगिन भगाओगे। 
दिल्ली दहपट्टि, पटना हू को झपटि कर, 
कबहूँ लत्ता कलकत्ता की उडाओगे॥ 

यह ललकारा था उन्होंने। पर कवि ललकार ही सकते हैं न। आज कल बहुत सारे कवि मनमोहन सिंह को ललकार रहे हैं। पर उन पर किसी चीज का फर्क नहीं पड़ता। पता नहीं सिंधिया पर कुछ फर्क पड़ा कि नहीं, कुछ किया तो नहीं उन्होंने पर कवि ने अपना काम किया। मैं आपसे यह कह रहा था कि क्या साबित होता है इससे! और भी मेरे पास कविताएं हैं जो सीधे मुगल काल के इतिहास से जुड़ी हुई हैं। मैं उन सब को पढ़ नहीं रहा हूँ। 

यह जो प्रवृत्ति है उससे लगता है कि रीतिकाल के कवि अपने समय के इतिहास से दो तरह से जुड़े थे, पहला तो यह कि सीधे उनका काल मुगल काल था उससे जुड़े हुए थे, उसका चित्रण-वर्नन अपने साहित्य में कर रहे थे और दूसरे आने वाली आफत अंग्रेजी राज की भी आपत्तियों-विपत्तियों को पहचानते थे, उसकी भी चर्चा कर रहे थे। घासीराम नाम के उस जमाने के एक कवि थे, आप गों में से कुछ को मालूम होगा कि उन्हीं के नाम पर विलासपुर में एक विश्वविद्यालय है, घासीराम ने लिखा सो पढ़ रहा हूँ आपसे, छंद का हिस्सा, उनकी किताब है – पथ्यापथ्य। १८३५ ई. की। इसमें लिखा उन्होंने: 

छांड़ि के फिरंगिन को राज में सुधर्म काज 
जहाँ पुण्य होत आज चलो उस देश को। 

यानी, फिरंगियों के राज को छोड़कर वहाँ चलो जहाँ पुण्य का काम होता हो, यहाँ तो सब पाप का काम होता है। 

एक और कवि हैं रीतिकाल के, बहुत लोकप्रिय कवि हैं, आप लोग उन्हें जानते होंगे- दीनदयाल गिरि। बाबा दीनदयाल भी उनको कहा जाता है, उन्होंने लिखा है: 

पराधीनता दुख महा, सुखी जगत स्वाघीन। 
सुखी रमत सुक बन बिसय, कनक पींजरा दीन। 

यह जो दोहा है, यह आधुनिक काल का लगता है। इस तरह की बात आज का कोई कवि कहेगा। जो तोता है, वह बन में तो सुख से रहता है लेकिन सोने के पिंजरे में भी रख दीजिए तो वह दीन हो जाता है। जंगल में स्वतंत्र रहता है। इससे ज्यादा चिन्ता मैथिलीशरण गुप्त के पास भी नहीं थी। स्वाधीनता के महत्व का गान कर रहे थे दीनदयाल गिरि। ऐसी कविता और ऐसे काल को रामचंद्र शुक्ल के कह देने से गरियाने का काम पिछले सौ साल से हो रहा है। ये कवि तो अपनी अंग्रेजी राज की पहचान कर रहे हैं, विरोध कर रहे हैं और रीतिकाल पर लिखी हुई एक किताब में भी क्या मजाल कि यह कहीं मिले। इसलिए मैं यह कह रहा हूँ। अभी दो एक उदाहरण और दूँगा। सीधे इतिहास से संबद्ध। 

एक राजस्थान के कवि हैं, बूंदी में राज कवि थे, सूर्जबल मीसण नाम है। वंश भाष्कर नाम का उनका महान ग्रंथ है। आठ खंडों में साहित्य अकादमी से छपा हुआ है। उसकी भाषा थोड़ी मुश्किल है, उसमें प्राकृत और राजस्थानी मिली-जुली है इसलिए प्रायः आज के छात्रों को समझ में नहीं आएगी। हम लोगों को ही कम ही समझ में आती है। मेहनत करके उसमें से कुछ निकालते हैं। उसमें एक तो बूंदी राज घराने का पूरा इतिहास है। दूसरा औरंगजेब और दारा शिकोह के बीच जो बादशाहत के लिए सारी लड़ाई हुई, उसका इतिहास है उसमें। दारा शिकोह मध्यकाल बड़े ही ट्रैजिक और महान पात्र थे, उनका संदर्भ रीतिकाल की अनेक कविताओं में है। भूषण की अनेक कविताओं में है। इसके साथ ही यह इतनी महत्वपूर्ण किताब है कि एक इतिहासकार हैं कानूनगो, पूरा नाम उनका भूल रहा हू, कानूनगो अंत में आता है, वे दारा शिकोह के इतिहासकार हैं, यदुनाथ सरकार के शिष्य थे, ढाका में प्रोफेसर थे इतिहास के, उन्होंने दारा शिकोह पर एक किताब लिखी है और वंश भाष्कर का उल्लेख किया है। हिन्दी क्षेत्र में क्या है कि साहित्य और इतिहास के सारे संबंध खत्म हो गये हैं। इतिहास वाले साहित्य नहीं जानते। वीर सिंह देव चरित के संबंध में चंद्रबली पाण्डेय ने लिखा है कि अकबर के शासन के बारे में और सलीम के विद्रोह के बारे में बहुत सारी ऐसी बातें केशव दास ने लिखी हैं जो बहुत सारे इतिहासकार को नहीं मालूम। क्योंकि उनके समय के कवि थे। जानते थे, क्योंकि राज दरबारों में रहते थे। पुराने और जो महत्वपूर्ण इतिहासकार थे वे साहित्य भी पढ़ते थे। हिन्दुस्तान में क्या है, साहित्य पढ़ते तो हैं लेकिन केवल वही साहित्य पढ़ते हैं जिस समय का कोई इतिहास नहीं मालूम है। मान लीजिए कि आप वैदिक काल के समाज का इतिहास खोजने चलिए तो ऋगवेद के अलावा कुछ नहीं मिलेगा आपको। ऋगवेद ही पढ़कर काम करेंगे। रोमिला थापर भी यही करती हैं और उनके विरोधी भी यही करते हैं। जब एक जगह आप साहित्य का उपयोग करते हैं तो बाद के दिनों में क्यों नहीं करते। मध्यकाल का इतिहास लिखने वालों को केशव दास को पढ़ना चाहिए। पर कौन समझाए उनको, जब हिन्दी वाले नहीं पढ़ते तो इतिहासकार क्यों पढ़े। इसलिए मित्रों, रीतिकाल पर नये ढ़ंग से सोचने, समझने और विचार करने की जरूरत है। तब आपको मालूम होगा कि रीतिकाल की कविता के बारे में जो प्रायः धारणाएं बनायी गयी हैं उनमें से अनेक गलत हैं। इस कविता का एक गहरा ऐतिहासिक पक्ष है और एक गहरा राजनीतिक पक्ष भी है।
 ______________________________________________________________________बी.डी./8-A
डी.डी.ए. फ्लैट्‌स, मुनीरका
नई दिल्ली - 110067
मो.   9868511770
(प्रस्तुति: अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी)