मंगलवार, 18 मार्च 2014

ग़ालिब: मेरी दृष्टि में__शमशेर

कल होली थी, तो सोचा यही फोटो साँट दूँ, शमशेर होली के रंग में, फोटो: यहाँ से
[तकरीबन दो साल पहले मैंने ‘चचा ग़ालिब’ श्रृंखला के अंतर्गत तीन पोस्टें लिखी थीं। आज एक लंबे अंतराल के बाद इसी सिलसिले को बढ़ाते हुए यह चौथी प्रस्तुति है। अस्त-व्यस्त जीवन, ठौरे-ठिकाने से दूरी और तितर-बितर मन के चलते कुछ प्रस्तुत कर पाने/सकने का यह सुयोग बहुत विलंब से बन रहा है। कुछ ड्राफ्ट अभी आधे-अधूरे लिखे हुये हैं, उन्हें मौका पाकर प्रस्तुति-योग्य रूप देकर प्रस्तुत करता रहूँगा; जैसी ‘बतकही’ की प्रकृति है - ‘कुछ औरों की कुछ अपनी’, उसी के अनुरूप। आज चौथी प्रस्तुति के रूप में शमशेर बहादुर सिंह द्वारा लिखा यह लघु आलेख प्रस्तुत है, ‘ग़ालिब: मेरी दृष्टि में’।: संपादक] 

“ग़ालिब: मेरी दृष्टि में”__शमशेर

ग़ालिब खुद एक बड़ा हीरो है अपनी व्यापकता के केन्द्र में, जो कि स्पष्ट एक आधुनिक चीज है। व्यक्ति का निर्बाध अपनापन। हर बात में अपने व्यक्तित्व को – अपने निजी दृष्टिकोण को - सामने रखना। मैं खुद किस पहलू से सोचता हूँ, किस ढंग से महसूस करता हूँ, यह उसके लिए महत्व की बात है। 

हर बात की तह में जाने की – विशिष्ट तौर पर उसका मर्म समझने की – उसकी कोशिश सर्वत्र प्रकट है।

उसकी मुसीबतें, उसका संघर्ष, जिसको वह कभी छिपाता नहीं… उसके शब्दों में हू-ब-हू आधुनिक सा लगता है। अजब बात है। उसमें आज के, आधुनिक साहित्यकार की-सी पूरी तड़प और वेदना के बीच, एक तटस्थ यथार्थवादी दृष्टि है। उसका यथार्थवाद निर्मम है। मुक्तिबोध और निराला, अपने भिन्न संस्कारों के अस्त-व्यस्त परिवेश में, उसको कुछ-न-कुछ प्रतिबिंबित करते हैं। निराला का यह प्रिय शेर था:

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।

क्या ताज्जुब है जो उसके युग ने उसको नहीं पहचाना।

अगलों के काव्य-शिल्प को वह अंदर से ग्रहण करता है: उस शिल्प की आंतरिक, प्रातिभ, योजना को मात्र शब्दों और मुहावरों को, उसके प्रयोग की रीतियों को, उन उस्तादों के जीवंत प्रयोगों से ग्रहण करता था, अपने खास तेवर के साथ।

लोगों ने सही कहा है कि जो शख्स एक अर्से से अंग्रेजी अलमदारी और कानून-व्यवस्था और नीतियों को निकट से और विचारपूर्ण दृष्टि से देखता आ रहा हो, जो कलकत्ते के वातावरण को भी अच्छी खासी तरह सूँघ आया हो, वह जीविका के लिए मुग़ल दरबार से बँधा रहकर भी, अपनी चेतना में पिछले युग से जुड़ा हुआ नहीं रह सकता। इस अर्थ में ग़ालिब अपने युग में अकेला था। 

वह कसीदे वह कसीदे लिखता है तो अपने आश्रयदाताओं की प्रशस्ति – जो कसीदे का बहरहाल आवश्यक अंग है – उसका मुख्य उद्देश्य नहीं होती। बल्कि अपनी प्रतिभा का ओज, काव्यकला पर अपना पूर्ण अधिकार, अर्थात्‍ कसीदे की विधा का सांगोपांग पूर्ण स्वरूप प्रस्तुत करना – अपने समकालीनों को दिखाना: यह होता था उसका काव्यात्मक उद्देश्य। 

कुछ जैसे निराला को रवीन्द्रनाथ से होड़-सी रही, ग़ालिब भी पूर्ववर्ती उस्तादों की श्रेणी में सगर्व अपने को रखता था।

कभी-कभी क्या, अक्सर ऐसा लगता है कि वह समाज में, अपने जीवन में, प्रायः हर ओर विरोधाभास देखता है। हर चीज एक विडंबना का भाव लिए हुए होती है। हर वस्तु प्रश्न से चिह्नित। हर बात जो सही सोची जाती है, वह उल्टी निकलती है। …ग़ालिब जैसे खरे और सच्चे लोगों के लिए क्या यही नियति है? ईमानदारी का कोई मतलब नहीं? सौंदर्य और प्रेम का भी अंत क्या? सारी व्यवस्थाएँ एक तमाशा जैसी हैं। रीति-नीति, आचार, दर्शन-दृष्टि, लौकिक संबंध … सब।

शायद एक चीज जो स्थायी है वह कला है – और वह ग़ालिब के लिए ग़ालिब की अपनी कला। इस कला में* मर्म में स्थित कवि पूर्णतया आश्वस्त निर्द्वंद्व और अमर-सा दिखता है। कम-से-कम स्वयं को, अपनी दृष्टि में। …और बहुत बाद में हमको भी वह वैसा ही दिखता है। 

ग़ालिब का सूफी भाव सूफियों की परंपरा से एकदम भिन्न और मात्र उसका एकदम अपना ही मालूम होता है। अगर ग़ालिब के सूफी भाव की स्थिति का विश्लेषण किया जाय तो वह शायराना रिवायत कतई न होते हुए भी, कहीं अनीश्वरवादी और कुछ-कुछ अस्तित्ववादी सूफीवाद निकलेगा!! यह पारिभाषिकता आधुनिक है। 

अपनी कला पर ग़ालिब का कितना दृढ़ विश्वास है। अपने सर्वोपरि होने से उसे किंचित भी संदेह नहीं। देखिये, उसका सेहरा देखिये। उसकी फारसी ग़ज़ल, जिसमें उसने भविष्यवाणी की है कि आगामी युगों में ही उसकी सही पहचान हो सकेगी, हालाँकि तब बहुत से मूर्ख भी उसको समझने-समझाने का दावा करेंगे। अपने समकालीन विद्वान मौलाना आजुर्दा को वह तमककर कहता है – अगलों के गुणगान करते तुम नहीं थकते, मगर तुम्हारी आँखों के सामने जो महाकवि बैठा अपनी रचना सुना रहा है, उसको पहचानने की शक्ति नहीं रखते, कितने आश्चर्य की बात है!

मुझे ऐसा लगता है कि ग़ालिब की दिलचस्पी किसी प्रकार के आदर्शवाद में नहीं थी। थी तो केवल इंसान में। उसके विडंबनापूर्ण मगर हौसलेमंद जीवंत नाटक में। और इसलिए कि आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्साँ होना! वह स्वयं कितना बड़ा इंसान था, हाली के मार्मिक शब्द इसकी पुष्टि करते हैं।

इतनी निर्भीकता से अपनी और परिवेश की यथार्थ स्थिति को स्पष्ट, ज्यों-का-त्यों रखने वाला गद्यकार उर्दू में आगे फिर नहीं हुआ। और उसके सबके यहाँ तकल्लुफ़ात के पर्दे हैं। एक केवल इसके यहाँ नहीं। उसके पत्र इसका सबूत हैं। 

यह कम कौतुक की बात नहीं कि हिंदी-संसार में ग़ालिब के लिए अलग ही ख़ाना है और शेष उर्दू के लिए अलग। जहाँ उर्दू से बिलगाव की भावना है, ग़ालिब से नहीं। इतने दुरूह कवि होते हुए भी ग़ालिब हिन्दी पाठकों के अपने हो गये। ऐसा क्यों है; इसका जवाब देना आसान नहीं है।

संदर्भ:
तु अय्‌ कि मह्‌वे-सुख़नगुस्तराने-पेशीनी
मबाश मुन्किरे ‘ग़ालिब’ कि दर ज़्मानए तुस्त।

साभार: पुस्तक - “कुछ और गद्य रचनाएँ”_शमशेर बहादुर सिंह / राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली

मंगलवार, 7 मई 2013

रीतिकाल की कविता का एक गहरा ऐतिहासिक और राजनीतिक पक्ष भी है__मैनेजर पाण्डेय

[दिल्ली विश्वविद्यालय के वेंकटेश्वर कॊलेज में १९ फरवरी-२०१३ को ‘मध्यकालीन हिन्दी कविता’ पर एक व्याख्यान आयोजित किया गया था। यह व्याख्यान प्रख्यात आलोचक मैनेजर पाण्डेय ने दिया था। इस व्याख्यान को लिखित रूप में यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। व्याख्यान में विशेष रूप से मध्यकाल के अंतर्गत समाविष्ट रीतिकाल (उत्तर-मध्यकाल) पर कुछ ऐसी महत्वपूर्ण बातें कही गयी हैं जो रीतिकाल पर अब तक के मूल्यांकन को प्रश्नविद्ध करती हैं और हिन्दी साहित्येतिहास के इस कालखंड पर नए सिरे से सोचने को बाध्य करती हैं। यह व्याख्यान अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। : संपादक]
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रीतिकाल की कविता का एक गहरा ऐतिहासिक और राजनीतिक पक्ष भी है!
*मैनेजर पाण्डेय 

ध्यकाल जिसे कहते हैं उसको दो संदर्भों में देखना चाहिए। साहित्य के इतिहास का काल विभाजन प्रायः समाज के इतिहास के काल विभाजन के आधार पर ही होता है। इसमें कभी-कभी विडंबनापूर्ण स्थितियाँ भी होती हैं। जो स्वाभाविक है उसकी चर्चा बाद में और जो विडंबना है उसकी चर्चा पहले। हिन्दी साहित्य में एक काल आदिकाल है। आदिकाल कहने से समाज के इतिहास के प्रसंग में ऐसा अर्थ निकलता है कि जैसे यह तब का काल होगा जब हम लोग यानी भारत का समाज जंगलों में रहता होगा। ऐसा नहीं है। यहाँ आदिकाल शुद्ध साहित्य से जुड़ा हुआ आदिकाल है। लेकिन हिन्दी साहित्य का जो मध्यकाल है वह भारतीय समाज का भी मध्यकाल है। मतलब, मध्यकाल जो हिन्दी साहित्य का है उसके दो हिस्से हैं। पहला हिस्सा भक्तिकाल का है और दूसरा हिस्सा रीतिकाल का है। समाज के इतिहास के हिसाब से देखिये, हिन्दी वालों के लिए मैं कह रहा हूँ देश भर के नहीं, तो एक तरह से जो भक्तिकाल का साहित्य है वह लगभग विद्यापति से शुरू होता है, और यह बहुत लोगों को भ्रम है न जानने के कारण कि भक्ति कविता एक तरह से मुगल काल के साथ खत्म हो गयी। ऐसा नहीं है। वैसे स्वयं मुगलकाल भी उन्नीसवीं सदी तक आता है। आप लोगों में से सबको यह तो मालूम ही होगा कि अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर थे, १८५७ ई. के विद्रोह के समय जिनको अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया, उनके सारे परिवार को मार डाला और स्वयं बहादुर शाह जफर को रंगून भेज दिया। यह ऐसा प्रसंग है जिसको याद करते ही थोड़ी भी देश के प्रति प्रेम-भक्ति का भाव होगा तो खून खौलने लगता है। हम जब इस समय आपसे बात कर रहे हैं उस समय उसी देश का प्रधानमंत्री हमारे देश के महान नेताओं से वार्ता के लिए आया हुआ है। ब्रिटेन का प्रधानमंत्री आया हुआ है। खैर, मैं जो मूल बात आपसे कह रहा था वह यह कि रामचंद्र शुक्ल ने एक बात लिखी है और ठीक लिखी है, उन्होंने कहा है कि हिन्दी साहित्य की एक विशेषता यह है कि इसमें साहित्य की जो एक परंपरा शुरू हो जाती है वह कभी मरती नहीं है। पर नामकरण तो प्रधानता के आधार पर होता है कि जो प्रवृत्ति प्रधान होती है उसके आधार पर उस काल का नाम रख दिया जाता है। जाहिर है कि भक्तिकाल विद्यापति से लेकर और लगभग समझिए कि मुगल काल के मध्य तक, शाहजहाँ तक, भक्तिकाल के सारे बड़े कवि समाप्त हो चुके थे पर भक्ति कविता हिन्दी साहित्य के रीतिकाल में भी मौजूद थी और उन्नीसवीं सदी तक आती है। अब भी हिन्दी में कुछ कवि मिल जाएंगे आपको वृंदावन में, अयोध्या में जो उसी ढ़ाचा-खाका में कविता लिखते हैं। मेरे पास अभी कुछ दिन पहले आगरा विश्वविद्यालय से डी.लिट. का एक शोध-प्रबंध आया था, आज के किसी भक्त कवि की कविता का इतना बड़ा पोथा था, जाहिर है कि मैं न उस कवि को जानता था न उसकी कविता को जानता था इसलिए मैने थीसिस लौटा दी, कि मैं जिसको जानता नहीं उस पर लिखी हुई थीसिस का मूल्यांकन नहीं करूँगा। खैर, यह जो मध्यकाल है उसकी अनेक विशेषताएँ हैं। मैं उसकी विस्तार से बात नहीं करूँगा, विस्तार से बात आपके सामने मैं थोड़ी देर में इसी के एक हिस्से रीतिकाल की करूँगा। वैसे ही आपका विश्वविद्यालय रीतिकाल का गढ़ माना जाता है। मुझे नहीं मालूम कि रीतिकाल की बाकी विशेषताएँ बाकी विश्वविद्यालय में हैं कि नहीं पर रीतिकालीन कविता को पढ़ने-पढ़ाने और उसी को कविता मानने की परंपरा नगेंद्र जी से शुरू होकर अब तक मौजूद है, उनके जो भी शिष्य और शिष्य के शिष्य हैं वे सब उसी रीतिकाल में ही घूमते हैं। इसलिए उस पर बात करना मुझे ठीक लगा और मैने वही विषय चुना है। पर व्यापक रूप से मध्यकाल जिसमें भक्तिकाल और रीतिकाल दोनों आते हैं, उसकी दो एक विशेषताओं की चर्चा करके मैं रीतिकाल पर आउँगा। 

पहली विशेषता यह है, पता नहीं आप लोगों ने कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि नहीं कि भक्तिकाल की और भक्ति काव्य की अखिल भारतीय स्तर पर पहली और बुनियादी विशेषता यह है कि प्रत्येक भक्त कवि अपनी मातृभाषा का कवि है। प्रत्येक भक्त कवि कह रहा हूँ, मुझे आज तक कोई अपवाद मिला नहीं है। एक तरह के अपवाद तो हैं जो अपनी मातृभाषा के अलावा दूसरी भाषा में भी कविता लिखते हैं। जैसे स्वयं विद्यापति। विद्यापति तीन भाषाओं में कविता लिखते थे, संस्कृत में, अवहठ्ठ या अपभ्रंश में और अपनी मातृभाषा मैथिली में। पर महाकवि किसके हैं, संस्कृत के महाकवि नहीं हैं, अपभ्रंश के भी महाकवि नहीं है, महाकवि वो मैथिली के ही हैं। उसी तरह तुलसीदास अवधी में कविता लिखते थे और ब्रजभाषा में भी, पर ब्रजभाषा के महाकवि वो नहीं हैं। ब्रजभाषा के महाकवि सूरदास हैं। तुलसीदास अवधी के ही महाकवि हैं। इसलिए मैने कहा कि कुछ प्रतिभाशाली कवि अपनी मातृभाषाओं के अलावा दूसरी भाषाओं में भी कविता लिखते हैं पर बुनियादी महत्व तो उनकी मातृभाषा वाली कविता का है।
     
Photo: Amrendra N. Tripathi 
दूसरी विशेषता मध्यकाल की यह है कि जो मातृभाषाओं में कविता लिखी गयी तो संस्कृत के पंडितों और फारसी के मुल्लाओं ने इसका बहुत विरोध किया। पता नहीं आपको मालूम है कि नहीं, अपना देश दो चीजों के लिए बहुत प्रसिद्ध है, पहली बात तो यही है कि यहाँ अश्लीलता को रेशमी चादर से ढक कर उसको शालीनता कहते हैं और संस्कृति भी। इस दिल्ली शहर में कैसे अश्लीलता को रेशमी चादर से ढकते हैं इसका प्रमाण इस दिल्ली शहर में औरतों के साथ हुई एक हजार ज्यादतियाँ हैं। एक साथ दोनों काम करते हैं, मंत्र भी जपते हैं ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ..’ और स्त्रियों की पूजा करने के नाम पर उनके साथ जो जो करते हैं उनमें से अधिकांश तो कहने लायक नहीं है। इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि अश्लीलता को शालीनता की रेशमी चादर में ढक कर उसे संस्कृति कहते हैं। दूसरा क्या है, सच को छुपाना और झूठ को मुलम्मा लगा कर पेश करना, यह एक पुरानी आदत है। यह जो विरोध हुआ वह कितनी दूर तक गया, उसके दो प्रमाण मैं दूँगा, ज्यादे नहीं। पचासों मेरे पास हैं। मराठी के एक भक्त कवि थे, संतकवि ज्ञानदेव। उनकी प्रसिद्ध रचना है, ज्ञानेश्वरी। मराठी का महान काव्य माना जाता है उसे। असल में ज्ञानेश्वरी ओबी छंद में है। इस ओबी छंद का ईजाद किया था ज्ञानेश्वर ने। ओबी छंद इसके पहले मराठी में नहीं था, देश में भी नहीं था। उन्होंने इस छंद को गढ़ा। उन्होंने ओबी छंद में और मराठी भाषा में गीता का अनुवाद किया है अर व्याख्या भी की है। उसके तीसरे अध्याय की सत्रहवीं ओबी में ज्ञानेश्वर ने एक ऐसी बात लिखी है जिसे भारतीय समाज, संस्कृति और भाषाओं के इतिहास का सबसे क्रांतिकारी वाक्य मैं मानता हूँ। यह मैं पहले आपसे हम चुका हूँ कि वह गीता का अनुवाद है तो यह भी आप जानते ही हैं कि गीता अर्जुन और कृष्ण के बीच संवाद है। उस तीसरे अध्याम में अर्जुन कृष्ण से कहते हैं, ध्यान रखिए ज्ञानेश्वर के अर्जुन संस्कृत के अर्जुन नहीं, कि आप जो कुछ कह रहे हैं वह बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन बहुत गूढ़ है। मेरी समझ में नहीं आ रहा है। इसलिए इसको सरल मराठी में समझा कर कहिए। पहली बार एक मनुष्य ने, अर्जुन कुलमिलाकर एक मनुष्य ही तो थे ईश्वर तो कृष्ण थे, ईश्वर से कहा कि मेरी भाषा बोलो। आप जिस भाषा में कह रहे हो वह बहुत मुश्किल है इनलिए मेरी भाषा बोलो। तो इसका परिणाम क्या हुआ जानते हैं? यह जो कठन उनहोंने किया यानी कि संस्कृत से महत्वपूर्ण अपनी मातृभाषा को बनाया, परिणाम यह हुआ कि पंडितों ने इक्कीस वर्ष की आयु में ज्ञानेश्वर को जीवित समाधि लेने के लिए मजबूर किया। यह तो हत्या करना है और बुरी तरह हत्या करना है। हत्या तो एक मिनट में हो सकती है, पर जीवित समाधि में जो आदमी होगा वह तो दो एक दिन में मरेगा। 

उसी तरह से मराठी के संत तुकाराम के साथ हुआ। मराठी संत तुकाराम जाति के माली थे। ब्राह्मण तो थे नहीं। इनसे कहा गया कि ये माली-वाली को अधिकार नहीं है कि ज्ञान का उपदेश दे इसलिए अपना यह लिखा पढ़ा फेंको। एक कवि अपनी बात कह रहा है वह चाहे जुलाहा कवि कबीर हो या माली कवि तुकाराम, वह फेंक काहे दे। तो पंडितों ने एक चाल चली और कहा कि तुम इसको नदी में डुबो दो और ईश्वर की कृपा होगी तो यह ऊपर आ जाएगा, नहीं तो हम मान लेंगे कि यह डूबने लायक थी। अब आपसे अलग से क्या यह बताने की जरूरत है कि ऋगवेद से लेकर भगवत्‌ गीता तक की किताबें नदी में डुबोयी जाएं तो सब डूब जाएगी। कौन नहीं डूबेगी! उसमें तो स्वयं भगवान ही मौजूद हैं। वो भी डूब जाएंगे उसी में। यह चाल चली उन्होंने। कहा जाता है कि, बाकी तो कथा है, तुकाराम ने पंडितों के कहने पर फेंका – मुझे तो हमेशा लगता है कि पंडितों ने तुकाराम से जबदस्ती छीनकर नदी में फेक दिया – लेकिन डूबा नहीं वह। जो भी हुआ, बाद में तुकाराम घर में रहने के बदले जंगलों में घूमने लगे और कभी घर लौटे ही नहीं। मेरा अपना अनुमान यह है कि उनको मार दिया जंगल में। मराठी में जानते हैं कथा क्या चलती है, फिल्म बनी है तुकाराम पर जो हर साल दिखायी जाती है जिसमें दिखाया जाता है, सीधे स्वर्ग से विमान आया और तुकाराम को सशरीर स्वर्ग ले गया। जिन लोगों ने मारा वे सभी क्यों नहीं गये, स्वर्ग तो सब लोग जाना चाहते हैं! यह जो प्रवृत्ति है यह भी आपके यहाँ की ही प्रवृत्ति है। 

मैं एक घटना आपको सुनाऊं चलते चलते। मैं जब कोई काम करता हूँ तो काफी गहरी खुदाई करता हूँ। जब मैने ज्ञानेश्वरी पढ़ी और जब यह वाक्य, अर्जुन का कृष्ण से कथन, दिखाई पड़ा तो मुझे यह वाक्य बहुत ही महत्वपूर्ण लगा, अभी थोड़ी देर पहले आपसे मैने कहा था कि मेरी जानकारी में भारतीय समाज में भाषाओं के इतिहास का सबसे क्रांतिकारी वाक्य है। मैंने इसका हिन्दी अनुवाद खरीदा जो साहित्य अकादमी से छपा है और अंग्रेजी अनुवाद खरीदा जो भारतीय विद्याभवन बंबई से छपा है। दोनों में दो काम एक साथ हुए हैं। दोनों अनुवाद करने वाले मराठी लोग हैं। दोनों की भूमिकाओं में ज्ञानेश्वर को लगभग ईश्वर जैसा दर्जा दिया गया है पर दोनों अनुवादों में यह वाक्य बदल दिया गया है कि ‘सरल मराठी में समझा कर कहिए’। इसके बदले लिखा हुआ है कि ‘सरल भाषा में समझा कर कहिए’। माने, संस्कृत से जो प्रेम है वह भारी पड़ा ज्ञानेश्वर से प्रेम पर। यह अपने यहाँ की जानी पहचानी प्रवृत्ति है। पर ऐसी इतनी प्रवृत्तियाँ हैं कि मैं उसी पर ध्यान दूं तो आज का भाषण उसी पर हो जाएगा। पर वह मैं नहीं करूँगा। 

यह जो मध्यकाल है, उसका जो रीतिकाल है, उसके बारे में जो कहना है उसे मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ। पहली बात तो यह कि हिन्दी आलोचना में महावीर प्रसाद द्विवेदी और बाद में रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकाल के विरोध में बहुत सारा लिखा और दृष्टिकोण बनाया। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी नवरत्न की समीक्षा लिखी थी। बाकी उनका छोड़ भी दीजिए, उसको देखिए तो उनका जो रीतिकाल विरोधी दृष्टिकोण है वह दिखाई देगा। यही काम अचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया। ये दो हिन्दी के इतने बड़े आलोचक थे कि बाद के लोगों ने उन्हीं की बातों को मिर्च मसाला लगा कर कभी थोड़ा घटा कर कभी थोड़ा बढ़ा कर पेश किया। नया किसी ने लिखा हो, नगेंद्र जी समेत, ऐसा नहीं है। रामचंद्र शुक्ल का आरोप क्या था? पहला आरोप यह था कि इस कविता में श्रृंगारिकता बहुत है। यद्यपि आचार्य शुक्ल मन से स्वयं श्रृंगारिक व्यक्ति थे।एक महिला से प्रेम भी करते थे। इसलिए, ठाकुर का एक छंद उनको बहुत प्रिय था, मुझे लगता है उनके मन से मिलता होगा, बार बार उसको दुहराया है। मैं अपको सुना से रहा हूँ:

“वा निरमोहिनि रूप की रासि जऊ उर हेतु न मानति होइहैं। 
आवत जात घरी घरी मेरो सूरति तो पहिचानति होइहैं। 
ठाकुर या मन की परतीति है, जो पै सनेह न मानति होइहैं। 
आवत हैं नित मेरे लिए इतना तो विशेष के जानति होइहैं।।” 

इसको आचार्य शुक्ल ने अपने चार लेखों में उद्धृत किया है, इतिहास के साथ। इससे उनकी मानसिकता का पता चलता है। लेकिन यही काम जब रीतिकाल के कवि कर रहे थे तो शुक्ल जी को पसंद नहीं था। 

आचार्य शुक्ल को दो और बातें पसंद नहीं थीं। उनके नापसंद करने का आधार है, ऐसा नहीं कि उन्होंने निराधार कहा लेकिन जो है वही मैं कह रहा हूँ। एक बात उनको पसंद नहीं थी और यह रीतिकाल की कमजोरी है; नायिका-भेद का विस्तार। अपार है वह। सात बरस की बच्चियों से लेकर सत्तर बरस की बुढ़ियाओं तक सब नायिकाएं हैं। अरे कोई स्त्री भी होगी! जो नायिका के अलावे हो। आचार्य शुक्ल को सबसे अधिक नाराजगी इसी बात से थी इसीलिए आचार्य शुक्ल ने बहुत कड़ा वाक्य रीतिकाल के बारे में लिखा है। लिखा है, रीतिकाल में कविता बँधी नालियों में बहने लगी। लेकिन इसका एक दुश्परिणाम यह हुआ कि हिन्दी के बाद के आलोचकों ने रीतिकाल की कविता को समग्रता में पढ़ने-समझने और मूल्यांकन करने के बदले रामचंद्र शुक्ल की बातों को दुहराना शुरू किया। अब कह गये हैं आचार्य शुक्ल, अरे आचार्यस शक्ल ने पढ़-वढ़ के कहा था। बाद के बहुत लोगों ने बिना पढ़े ही कहा, क्योंकि पढ़ते तो कुछ और ऐसा दिखाई देता जो मैं आपके सामने अभी रखने वाला हूँ। 

रीतिकाल के बारे में मेरी पहली बात यह है कि अपने समय के समाज और इतिहास से जैसा संबंध रीतिकाल की कविता का है वैसा संबंध भक्तिकाल में भी नहीं है। प्रमाण क्या है? मैं कोई रीतिकाल का प्रेमी नहीं हूँ। अभी ठीक बताया गया कि मैने पूरी किताब लिखी है, ‘भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य’। मैं स्वयं भक्तिकाल का प्रेमी हूँ। पर जो जहाँ है उसके बारे में बात की जाएगी न, जो वास्तविकता है, सच्चाई है। देखिए, रीतिकाल के सबसे बड़े कवि माने जाते हैं केशव दास। अपने समय और समाज के इतिहास से केशव दास की कविता का क्या संबंध है? केशव दास की दो रचनाएं हैं, जो सीधे इतिहास से जुड़ी हुई हैं मित्रों! मैं बाकी रामचंद्रिका आदि की बात नहीं कर रहा हूँ। एक उनका प्रबंध काव्य है, ‘वीर सिंह देव चरित’। मैं दावे के साथ आपसे कह रहा हूँ कि रीतिकाल के बहुत सारे प्रेमियों ने इसे देखा ही नहीं है, बस नाम गिना देंगे। क्या है उसमें, उसमें मध्यकाल के इतिहास की जटिल समस्याएं हैं। मुगल काल के इतिहास की खास तौर से। आप में से जो इतिहास के छात्र होंगे, उनको यह मालम होगा कि अकबर के समय से और उनके राज्य-काल से संबंधित दो बड़ी घटनाएँ हुईं। पहली घटना यह हुई कि उनके पुत्र सलीम ने, जो बाद में जहाँगीर बना, विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह की घटना ‘वीर सिंह देव चरित’ में है। उसी विद्रोह का एक और नतीजा हुआ कि सलीम ने वीर सिंह, जो ओरछा का राजा था बहुत शक्तिशाली और प्रभाव शाली, की मदद से अबुल फजल की हत्या करवाई। यह सब वीर सिंह देव चरित में है। आप बताइये, हमारा हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग माना जाता है भक्तिकाल, केशव दास और तुलसीदास बहुत दूर तक समकालीन थे मतलब दोनों अकबर के जमाने में जीवित थे, भक्तिकाल के किस कवि ने मुगल शासन के बारे में लिखा है। किस कवि ने? हमारे जो परम आदरणीय बाबा तुलसीदास हैं, उन्होंने तो यह घोषित कर दिया – कीन्हें प्राकृत जन गुनगाना / सिर धुनि गिरा लागि पछिताना। यानि, अपने समय के किसी मनुष्य की कविता में चर्चा करना सरस्वती का अपमान है, तो राम का गुणगान करेंगे। सारा भक्तिकाव्य परलोकवाद की चिंता से लिखा गया है। सारा रीतिकाल अपने समय और अपने समाज की चिंता से लिखा गया है। उसमें कोई परलोकवाद नहीं है। और जो परलोकवादी हैं उनके बारे में रीतिकाल के ही एक कवि ने कहा कि ‘राधा कन्हाई सुमिरन को बहानो है’, वास्तविक भक्ति नहीं है, बहाना है वह। कहना तो है किसी स्त्री और पुरुष के बारे में कुछ, तो डर लगता है कि ज्यादा कहेंगे तो पिटाई-विटाई होने लगेगी। परसाई जी ने एक व्यंग्य लिखा था कि कविता में सर्वनामों का प्रयोग क्यों होता है। अधिकांश कविताएं ‘वह’ में लिखी जाती हैं। परसाई जी ने कहा कि वह में न लिखा जाय, संज्ञा में नाम लेकर लिखा जाय तो कोई चप्पल लेकर पहुँच जाएगी न घर पर! इसलिए सर्वनाम ही बचाता है। वही हाल है, अपने समय और समाज की चिंता नहीं है। खैर, हिन्दी में केवल एक आलोचक ने, आप लोगों के जो छात्र हैं उनकी मदद के लिए कह रहा हूँ, केशव दास के इस काव्य के ऐतिहासिक महत्व पर विचार किया है। मिल जाए किताब कहीं तो पढ़िए। किताब मैं लेकर आया हूँ आपको दिखाने के लिए। यह किताब है चंद्रबली पांडेय की ‘केशव दास’ नाम से। कोई हिन्दी का आलोचक इसका नाम नहीं लेता। जानते भी नहीं हैं लोग। उसके बाद केशवदास की दूसरी किताब है, यह थोड़ी छोटी है, ‘जहाँगीर जस चंद्रिका’। मुझे लगता है कि इसके बारे में बिना बताए भी आप सीधे समझ जाएंगे कि सीधे मुगल इतिहास से जुड़ी है। मैं केशव दास के बारे में बहुत कुछ सोच कर आया था, मेरे पास नोट्‌स हैं, वह भी आपसे कहना चाहता था पर अब समय नहीं है। दूसरी एकाध बातें और कहूँगा। 

केशव दास ने इसी ‘वीर सिंह देव चरित’ में राजनीति की विस्तार से चर्चा की है। रूपक में। यानि, केशव दास एक राजनीतिक कवि भी हैं। केश दास ने एक ऐसे शब्द का उपयोग अपनी कविता में किया है जिसका उपयोग आज के कवि करते हैं, ‘जनपद’। मैंने भक्ति काव्य बहुत पढ़ा है लेकिन मेरी जानकारी में किसी ने जनपद शब्द का उपयोग किया हो, मुझे नहीं मालूम। उसका संदर्भ लेकर आया हूँ आपके सामने लेकिन पढ़ूँगा नहीं। उसी ‘वीर सिंह देव चरित’ में। जनपद जैसे एकदम आधुनिक शब्द है, कोई नहीं जानता कि यह वहीं से आया है। आप लोगों को मालूम है कि आज कल जिला को या सब डिवीजन को जनपद भी कहा जाता है। जनपद वैसे बहुत पुराना शब्द है। हिन्दी के एक कवि हैं त्रिलोचन, उनकी कविता की किताब ही है, ‘उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है!’ इसलिए केशव दास पर ठीक से पुनर्विचार करने की जरूरत है। उनकी ऐतिहासिक दृष्टि, उनकी राजनीतिक-चेतना पर नए सिरे से काम करने की जरूरत है पर उसके लिए मेहनत करनी पड़ेगी। आज कल लड़के-लड़कियाँ रिसर्च के नाम पर यात्रा कहाँ से कहाँ तक करते हैं, ‘एक हॊस्तल से दूसरे हॊस्टल तक’। माने, लड़के लड़कियों के हॊस्टल तक और लड़कियाँ लड़कों के हॊस्टल तक, बस।इससे ‘वीर सिंह देव चरित’ नहीं मिलेगा। ‘वीर सिंह देव चरित’ या चंद्रबली पांडेय की किताब किसी पुरानी लाइब्रेरी में मिलेगी। 

दूसरे इस काल के कवि जिनका सीधे इतिहास से संबंध है वे हैं भूषण। भूषण औरंगजेब के जमाने के कवि हैं। भूषण शिवा जी के समय के कवि हैं। मेरा ख्याल है यह तो आप लोगों को मालूम होगा कि उनके तीन ग्रंथ हैं और तीनों का संबंध इतिहास से है। ‘शिवराजभूषण’, यह शिवा जी पर है। ‘शिवाबावनी’, यह भी शिवा जी पर है। और उस समय ही मध्य प्रदेश के एक बहादुर राजा थे छत्रसाल, उनपर उनकी एक काव्य पुस्तक है, ‘छत्रसाल प्रकाश’। इसका सीधे संबंध इतिहास से है। इस बात को और भी कम लोग जानते हैं, मित्रों थोड़ी देर में उसकी और चर्चा करूंगा मैं, कि जिस समय औरंगजेब शासन कर रहा था (आप लोगों को मालूम है कि १७०७ ई. में मरा वह) तब तक इस देश में अंग्रेज आ गये थे। रीतिकाल के चार कवि ऐसे हैं जो अंग्रेजों के आने से चिंतित थे। रामचंद्र शुक्ल ने भारतेंदु के प्रसंग में लिखा है कि जीवन दूसरी ओर जा रहा था और कविता दूसरी ओर जा रही थी यानि कि छाती पर अंग्रेजी साम्राज्यवाद चढ़ रहा था और कवि नायिका भेद की कविता कर रहे थे, यह पूरा सच नहीं है मित्रों। आप लोगों में से जिसको फुरसत हो, मैं किताब का नाम और छंद का नाम बता रहा हूँ भूषण के, उनकी किताब है ‘शिवराज भूषण’ उसमें छंद संख्या ११६ और २६१ इन दोनों में अंग्रेजों की चिंता है। ‘शिवाबावनी’ में छंद नं. १५ में अंग्रेजों की चिंता मौजूद है। 

रीतिकाल के आखिरी महत्वपूर्ण कवि थे पद्माकर। मैं आपको पद्माकर का एक पूरा छंद पढ़ कर सुना रहा हूँ और तब आपको मालूम होगा कि रीतिकाल के कवि किस तरह से अंग्रेजों के आने से चिंतित थे। उस समय ग्वालियर का राजा था सिंधिया, बहुत प्रसिद्ध, माना जाता था बहादुर भी था, (माना जाता था इसलिए कह रहा हूँ कि मध्यकाल में बहादुर होने का एक ही अर्थ था कि कौन कहाँ से कितनी औरतों को भगा कर ले गया है, यही बहादुरी का एक प्रमाण था, वहाँ हर लड़ाई में यही होता था, मुझे नहीं मालूम सिंधिया ने यह भी किया था या नहीं, खैर) पद्माकर ने उनको एक चिट्ठी लिखी कविता में, मैं वही चिट्ठी या कविता पढ़ रहा हूँ(कविता से मालूम होगा कि पद्माकर को मालूम था कि अंग्रेज कहाँ कहाँ अपनी जड़ जमा रहे हैं धीरे धीरे): 

“मीनागढ़, बंबई, सुमंद, मंदराज, बंग, 
बंदर को बंद कर बंदर बसाओगे। 
कहैं पद्माकर कसक कश्मीर हूँ को, 
पिंजर सो घेरि के कलिंजर छुड़ाओगे। 
बाका नृप दौलत अलीजा महराज कभौ, 
साजि दल पकड़ फिरंगिन भगाओगे। 
दिल्ली दहपट्टि, पटना हू को झपटि कर, 
कबहूँ लत्ता कलकत्ता की उडाओगे॥ 

यह ललकारा था उन्होंने। पर कवि ललकार ही सकते हैं न। आज कल बहुत सारे कवि मनमोहन सिंह को ललकार रहे हैं। पर उन पर किसी चीज का फर्क नहीं पड़ता। पता नहीं सिंधिया पर कुछ फर्क पड़ा कि नहीं, कुछ किया तो नहीं उन्होंने पर कवि ने अपना काम किया। मैं आपसे यह कह रहा था कि क्या साबित होता है इससे! और भी मेरे पास कविताएं हैं जो सीधे मुगल काल के इतिहास से जुड़ी हुई हैं। मैं उन सब को पढ़ नहीं रहा हूँ। 

यह जो प्रवृत्ति है उससे लगता है कि रीतिकाल के कवि अपने समय के इतिहास से दो तरह से जुड़े थे, पहला तो यह कि सीधे उनका काल मुगल काल था उससे जुड़े हुए थे, उसका चित्रण-वर्नन अपने साहित्य में कर रहे थे और दूसरे आने वाली आफत अंग्रेजी राज की भी आपत्तियों-विपत्तियों को पहचानते थे, उसकी भी चर्चा कर रहे थे। घासीराम नाम के उस जमाने के एक कवि थे, आप गों में से कुछ को मालूम होगा कि उन्हीं के नाम पर विलासपुर में एक विश्वविद्यालय है, घासीराम ने लिखा सो पढ़ रहा हूँ आपसे, छंद का हिस्सा, उनकी किताब है – पथ्यापथ्य। १८३५ ई. की। इसमें लिखा उन्होंने: 

छांड़ि के फिरंगिन को राज में सुधर्म काज 
जहाँ पुण्य होत आज चलो उस देश को। 

यानी, फिरंगियों के राज को छोड़कर वहाँ चलो जहाँ पुण्य का काम होता हो, यहाँ तो सब पाप का काम होता है। 

एक और कवि हैं रीतिकाल के, बहुत लोकप्रिय कवि हैं, आप लोग उन्हें जानते होंगे- दीनदयाल गिरि। बाबा दीनदयाल भी उनको कहा जाता है, उन्होंने लिखा है: 

पराधीनता दुख महा, सुखी जगत स्वाघीन। 
सुखी रमत सुक बन बिसय, कनक पींजरा दीन। 

यह जो दोहा है, यह आधुनिक काल का लगता है। इस तरह की बात आज का कोई कवि कहेगा। जो तोता है, वह बन में तो सुख से रहता है लेकिन सोने के पिंजरे में भी रख दीजिए तो वह दीन हो जाता है। जंगल में स्वतंत्र रहता है। इससे ज्यादा चिन्ता मैथिलीशरण गुप्त के पास भी नहीं थी। स्वाधीनता के महत्व का गान कर रहे थे दीनदयाल गिरि। ऐसी कविता और ऐसे काल को रामचंद्र शुक्ल के कह देने से गरियाने का काम पिछले सौ साल से हो रहा है। ये कवि तो अपनी अंग्रेजी राज की पहचान कर रहे हैं, विरोध कर रहे हैं और रीतिकाल पर लिखी हुई एक किताब में भी क्या मजाल कि यह कहीं मिले। इसलिए मैं यह कह रहा हूँ। अभी दो एक उदाहरण और दूँगा। सीधे इतिहास से संबद्ध। 

एक राजस्थान के कवि हैं, बूंदी में राज कवि थे, सूर्जबल मीसण नाम है। वंश भाष्कर नाम का उनका महान ग्रंथ है। आठ खंडों में साहित्य अकादमी से छपा हुआ है। उसकी भाषा थोड़ी मुश्किल है, उसमें प्राकृत और राजस्थानी मिली-जुली है इसलिए प्रायः आज के छात्रों को समझ में नहीं आएगी। हम लोगों को ही कम ही समझ में आती है। मेहनत करके उसमें से कुछ निकालते हैं। उसमें एक तो बूंदी राज घराने का पूरा इतिहास है। दूसरा औरंगजेब और दारा शिकोह के बीच जो बादशाहत के लिए सारी लड़ाई हुई, उसका इतिहास है उसमें। दारा शिकोह मध्यकाल बड़े ही ट्रैजिक और महान पात्र थे, उनका संदर्भ रीतिकाल की अनेक कविताओं में है। भूषण की अनेक कविताओं में है। इसके साथ ही यह इतनी महत्वपूर्ण किताब है कि एक इतिहासकार हैं कानूनगो, पूरा नाम उनका भूल रहा हू, कानूनगो अंत में आता है, वे दारा शिकोह के इतिहासकार हैं, यदुनाथ सरकार के शिष्य थे, ढाका में प्रोफेसर थे इतिहास के, उन्होंने दारा शिकोह पर एक किताब लिखी है और वंश भाष्कर का उल्लेख किया है। हिन्दी क्षेत्र में क्या है कि साहित्य और इतिहास के सारे संबंध खत्म हो गये हैं। इतिहास वाले साहित्य नहीं जानते। वीर सिंह देव चरित के संबंध में चंद्रबली पाण्डेय ने लिखा है कि अकबर के शासन के बारे में और सलीम के विद्रोह के बारे में बहुत सारी ऐसी बातें केशव दास ने लिखी हैं जो बहुत सारे इतिहासकार को नहीं मालूम। क्योंकि उनके समय के कवि थे। जानते थे, क्योंकि राज दरबारों में रहते थे। पुराने और जो महत्वपूर्ण इतिहासकार थे वे साहित्य भी पढ़ते थे। हिन्दुस्तान में क्या है, साहित्य पढ़ते तो हैं लेकिन केवल वही साहित्य पढ़ते हैं जिस समय का कोई इतिहास नहीं मालूम है। मान लीजिए कि आप वैदिक काल के समाज का इतिहास खोजने चलिए तो ऋगवेद के अलावा कुछ नहीं मिलेगा आपको। ऋगवेद ही पढ़कर काम करेंगे। रोमिला थापर भी यही करती हैं और उनके विरोधी भी यही करते हैं। जब एक जगह आप साहित्य का उपयोग करते हैं तो बाद के दिनों में क्यों नहीं करते। मध्यकाल का इतिहास लिखने वालों को केशव दास को पढ़ना चाहिए। पर कौन समझाए उनको, जब हिन्दी वाले नहीं पढ़ते तो इतिहासकार क्यों पढ़े। इसलिए मित्रों, रीतिकाल पर नये ढ़ंग से सोचने, समझने और विचार करने की जरूरत है। तब आपको मालूम होगा कि रीतिकाल की कविता के बारे में जो प्रायः धारणाएं बनायी गयी हैं उनमें से अनेक गलत हैं। इस कविता का एक गहरा ऐतिहासिक पक्ष है और एक गहरा राजनीतिक पक्ष भी है।
 ______________________________________________________________________बी.डी./8-A
डी.डी.ए. फ्लैट्‌स, मुनीरका
नई दिल्ली - 110067
मो.   9868511770
(प्रस्तुति: अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी)

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

भाषा तिजारती हो गई और लेखक दुकानदार! (LLF'13-Report)

[लखनऊ लिटरेरी फेस्टिवल-१३ के अंतर्गत दिनांक २३ मार्च को ‘समकालीन हिन्दी कविता: लोकप्रियता की चुनौती’ पर एक सत्र रखा गया था। इस कार्यक्रम की रपट यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। इसे जागरूक पत्रकार  और प्रिय मित्र अटल तिवारी ने लिखा है, अस्तु हम आपके आभारी हैं। : संपादक]
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भाषा तिजारती हो गई और लेखक दुकानदार!
*अटल तिवारी

खनऊ के कुछ उत्साही लोगों ने दो दिवसीय लखनऊ लिटरेरी फेस्टिवल का आयोजन किया। इसमें विभिन्न विषयों पर अनेक सत्र रखे। फिल्मी हस्तियों से लेकर हिन्दी, उर्दू, अवधी भाषा के अनेक रचनाकारों ने शिरकत की। इसी में एक सत्र था ‘समकालीन हिन्दी कविता: लोकप्रियता की चुनौती’। इस सत्र में पद्मश्री बेकल उत्साही, कवि नरेश सक्सेना, पंकज श्रीवास्तव, डॊ. अमरेन्द्र त्रिपाठी को वक्ता के रूप में हिस्सा लेना था, लेकिन शायद कवि नरेश सक्सेना ने फेस्टिवल में शिरकत करने से मना कर दिया। वैसे बाहर की छोडि़ए शहर में रहने वाले हिन्दी के बड़े रचनाकार भी फेस्टिवल से दूर रहे। आयोजक उन्हें जोड़ नहीं सके। रही बात पंकज श्रीवास्तव की तो उन्हें उसी समय पर होने वाले दूसरे सत्र में हिस्सा लेना था। ऐसे में कविता वाले सत्र में बेकल उत्साही व जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से आए . अमरेन्द्र त्रिपाठी बतौर वक्ता मौजूद रहे। डाॅ. रामशंकर त्रिपाठी को आरक्षण में खाली रह जाने वाली सीट का लाभ मिला। वह वक्ताओं में शामिल किए गए। बतौर संचालक कथाकार दयानंद पांडेय मंच पर थे। 

दयानंद पांडेय ने कुंवर नारायण को उद्धृत करते हुए इस चिंता के साथ बात शुरू की कि ‘कविता अब उत्पाद बनती जा रही है। सारे सरोकार सोने के निवाले में समाहित हो गए हैं। इसलिए कविता हाशिए पर है। कविता लतीफा हो चुकी है। कवि लतीफेबाज हो गए हैं। लोग हिन्दी कविता और फिल्मी गानों में अंतर तक भूलने लगे हैं।’ उन्होंने हिन्दी को रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही विषय की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए पहले बेकल उत्साही को बोलने के लिए आमंत्रित किया। बेकल साहब ने माइक संभाला तो लोगों ने तालियों से स्वागत किया। उन्होंने कहा कि ‘पहले आप लोग मेरे बारे में जान लीजिए। मैं अपना परिचय दे दूं। मैं एक उजड्ड घराने का हूं। मेरे बाप दस-बारह गांवों के जमींदार थे। बाप मेरे शायरी के शौक से नाखुश रहते थे। कहते थे कि हरामजादा नाचता-गाता फिरता है। हमारा नाम मिटा दिया। शायरी करने की बदौलत अपनी पुश्तैनी जायदाद से मरहूम कर दिया गया। जहां तक शायरी की बात है तो हम सभी को स्कूली दिनों में विषय दिए जाते थे। हम उस पर शायरी-कविता करते थे। पहली बार वसन्त विषय मिला था। इस पर कविता लिखी।’ कविता के जमीनी सरोकार के साथ बात करते हुए बेकल जी ने कहा-‘किसी कविता में जब तक अपनी जमीन नहीं होगी। आसपास के माहौल का तस्करा नहीं होगा। ऐसे में वह जिंदा नहीं रह पाएगी। वह लोकप्रिय तो क्या उसकी चन्द लाइनें तक याद नहीं होंगी। इसलिए भारी-भरकम शब्द लिखने से बात नहीं बनने वाली। हम रोज जो शब्द बोलते हैं। जो सब्जी मंडी और गली कूचे में बोली जाती है। वही हिन्दी है। उसी में लिखना होगा।’ खांचे में बंटे साहित्य पर भी बेकल साहब ने तीर चलाते हुए कहा कि ‘यह प्रगतिशील, रवायत, परंपरावादी नहीं चलेगा। जो लिखना है लिखो। फैसला पाठक पर छोड़ दो। हम अब भी इसी में उलझे हैं कि लिपि बाएं से लिखें कि दाएं से।’ इसी बीच वह अपने कुछ दोहे सुनाते हैं यह बताने के लिए कि इसमें ऐसा कौन सा ऐसा शब्द है जो कठिन है या हम सबके आसपास का नहीं है। उन्होंने पढ़ा-‘धर्म मेरा इस्लाम है, भारत जन्म स्थान, वुजू करूं अजमेर में, काशी में स्नान...।’ लाइन पूरी होती कि हाल तालियों से गूंज उठा। बेकल जी ने कहा कि बात इतनी ही नहीं है। अगला दोहा लिखा तो फतवा जारी हो गया था। दोहा सुनिए-‘मैं तुलसी का वंशधर, अवधपुरी है धाम, सांस-सांस में सीता बसीं, रोम-रोम में राम...।’ कविता की बात करते-करते वह फिल्मी गीत व लेखन पर बात करने लगे। उन्होंने कहा कि ‘शब्दावली हम दे रहे हैं। डाॅयलाग हमारे हैं। गीत हमारे हैं। एक तरह से गद्य व पद्य सब हमारा। गीत हम लिखें तो पांच रुपया...गाने वाले को पांच लाख। यह कौन सा इन्साफ है? अरे, इब्दिता हम करते। मेहनत हम करते। शब्द हम गढ़ते। माल वह काटते।’ 
   
इस सत्र में मौजूद वक्तागण: (बाएं से) डॊ. रामशंकर त्रिपाठी, संचालक दयानंद पाण्डेय, पद्मश्री बेकल उत्साही और  अमरेन्द्र
समकालीन कविता पर बात करने के दौरान बेकल साहब भाषा की उपेक्षा पर नाराज दिखे। कहा-‘हिन्दी की अपनी तहजीब थी। अपनी संस्कृति थी। हमने उसे बेच दिया। हमारे हिन्दी लेखक खुद को बेचने में लगे हैं। यानी भाषा तिजारती हो चुकी है और लेखक दुकानदार। ऐसे में क्वांटिटी ही मिलेगी क्वालिटी नहीं। दो दिन का पूरा सत्र अंग्रेजी में हो रहा है। बातें अंग्रेजी में हो रही हैं। मुजफ्फर अली से भी हमने कहा कि आप सूफी पर अच्छा काम कर रहे हैं। अंग्रेजी में लिख रहे हैं। इस किताब का हिन्दी और उर्दू में अनुवाद कर देते तो हम जैसे गंवार भी पढ़ लेते।’ कविता व शायरी की बात करते हुए कहा कि ‘पहले लिखने वाले जमींदारों और नवाबों की तारीफ करते थे। उसी को शायरी व कविता माना जाता था। एक किस्सा सुनिए, एक बार पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने मुझे कुछ सुनाने के लिए बुलाया गया। मैंने कविता पढ़नी शुरू की। वह जमींदार के खिलाफ थी। उस समय जमींदारों के जुड़ा कुछ मामला चरचा में था। कुछ लोगों ने ऐसी कविता न पढ़ने के लिए रोका। यह बात नेहरू जी ने देख ली। उन्होंने मना करते हुए कहा कि पढ़ने दो। इसके बाद गांव आया तो किसी ने उत्साही कहा। बस...यहीं से नाम पड़ गया बेकल उत्साही।’ हाल में जमा लोग बेकल साहब को सुनने के लिए उतावले थे। यही वजह थी कि संचालक ने अगले वक्ता को मौका देने की कोशिश की तो लोगों ने कहा कि बोलने दीजिए, लेकिन समयाभाव को देखते हुए दयानंद पांडेय ने अपना दायित्व निभाया। कहा-‘उदारीकरण के दौर में सांस्कृतिक संस्थाएं हाशिए पर जा चुकी हैं। वेब मीडिया ने मठों को तोड़ा है, लेकिन बाजार के हवाले हो जाना क्या ठीक है? यह सवाल उठाते हुए उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से आए डाॅ. अमरेन्द्र त्रिपाठी को आमंत्रित किया। 

अमरेन्द्र त्रिपाठी ने बाजार व उसका इस्तेमाल करने वाले एवं उससे दूर रहने वाले रचनाकारों पर विस्तार से बात रखी। एक तरह से उन्होंने बाजार और गुणवत्ता का विरोधाभास बयां किया। कहा-‘अच्छे लेखक बाजार को लेकर उदासीन हैं। बाजार में जो लेखक जा रहे हैं उनका उद्देश्य केवल बिकना है या यूं कहिए कि वह बाजारू हो जाते हैं। वह बैंड भी बजाते हैं। पाठकों के साथ अन्याय करते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि जब आप (अच्छे लेखक) बाजार से परहेज करेंगे तो लोगों तक पहुंचेंगे कैसे? बाजार तो लोकप्रियता का एक माध्यम है। बड़े लेखकों की यह उदासीनता भी अच्छे लेखन को आम लोगों से दूर कर रही है। अच्छे लेखक केवल किताबों व पत्रिकाओं तक सीमित रहते हैं। यही एक प्रमाण है कि वह इस नए बाजार से कटे रहते हैं। ऐसे में सबसे अधिक नुकसान रचना व पाठकों को होता है। इसलिए जरूरी यह है कि प्रमुख रचनाकारों को इस माध्यम को पाॅजिटिव तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए। इससे पाठकों को अच्छी रचनाएं मिलेंगी। साथ ही बाजारू व स्तरहीन लोगों को बढ़ने का मौका नहीं मिलेगा। अगर ऐसा हो जाए तो अच्छी कविता इस माध्यम का इस्तेमाल करने वालों तक पहुंच सकेगी।’ अमरेन्द्र त्रिपाठी के बाद संचालक ने रामशंकर त्रिपाठी को बोलने के लिए आमंत्रित किया। रामशंकर ने कहा-‘हिन्दी मामूली लोगों की भाषा है। देश में जब तक गरीबी थी बाबू घूस नहीं लेता था। नेता ईमानदार थे उस समय तक सब हिन्दी पढ़ते थे। अब अफसरों, नेताओं की पत्नियां और संभ्रान्त घरों की महिलाएं बच्चों को नाश्ता नहीं ब्रेकफास्ट कराती हैं। ऊगल-गूगल, उद्योग, व्यापार सब अंग्रेजी में चल रहा है। ऐसे में उदय प्रकाश को लोग भूल गए हैं। राजेश जोशी बूढ़े हो गए हैं। वागर्थ, हंस, नया ज्ञानोदय में लिखना और पढ़ना वैसा ही है जैसे ऊंट के ब्याह में गधा बाराती। लेखक ही एक-दूसरे को पढ़ और गा रहे हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के यहां से जो चेतना बनी वह आगे तक कायम नहीं रह सकी। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि हिन्दी में अब केवल विधवा विलाप चल रहा है। हिन्दी का कोई नामलेवा नहीं है। अवधी-फवधी, अंजाबी-पंजाबी समेत किसी का कुछ नहीं है। उनका यह प्रलाप जारी था कि कुछ लोगों ने आपत्ति की। इस पर संचालक दयानंद पांडेय ने हस्तक्षेप करते हुए रामशंकर त्रिपाठी की बातों को खारिज करते हुए कहा कि पता नहीं त्रिपाठी जी को हिन्दी की अच्छी चीजें क्यों नहीं दिखतीं? उदय प्रकाश व राजेश जोशी हिन्दी की थाती हैं। अगर आप दूर नहीं जाना चाहते तो कम से कम अपने ही शहर पर नजर डाल लीजिए। कहानीकार अखिलेश समेत अनेक नाम हम हिन्दी वालों के लिए गौरव हैं। संचालक ने उन्हें भाषा को देखने के नजरिए और लेखकों के बारे में ज्ञान बढ़ाने की सलाह दे डाली।

इसी के साथ आयोजकों ने घड़ी की ओर इशारा किया, लेकिन संचालक ने कहा कि बेकल जी मंच पर मौजूद हों और उनके बिना कुछ सुनाए सत्र का समापन हो जाए यह नाइंसाफी होगी। इसी के साथ उनकी ओर माइक बढ़ा दिया। बेकल जी ने पहले अपना रचना ‘यही है मेरा लखनऊ...’ सुनाया। फिर गजल का नम्बर लगा-‘रात जंगल वो आइ गई अंखियां, भोर होतै झुराइ गई अंखियां, जी भरि कइ देखहूं न पाएन, तुमका देखतइ लुकाइ गई अंखियां, अग्नि लगाइ के होलिका होइ गईं, जग जराइ के बुताइ गई अंखियां, चोट लागि नहिं पीड़ा जानिन, जानि कैसे सुवाइ गई अंखियां, सपने के मेले में बेकल, मिलते-मिलते हेराइ गई अंखियां, जानि ना पाइउ उत्साही जी, कैसे बेकल बनाइ गई अंखियां, इसी के साथ सत्र का समापन हो गया। मजेदार बात यह रही कि इस सत्र में विषय पर बात कम ही हुई। संचालक दयानंद पांडेय व डाॅ. अमरेन्द्र त्रिपाठी ने अपने को विषय तक सीमित रखा...लेकिन रामशंकर त्रिपाठी तो विषय के आसपास भी नहीं पहुंचे। फेस्टिवल में अनेक खामियां रहीं। लेकिन इससे अधिक अहम बात यह कि बंजर जमीन में कुछ पौधे उगे। इसलिए बंजर जमीन में कुछ पौधे उगाने के प्रयास के लिए आयोजकों की तारीफ होनी चाहिए।
(फोटो: साभार, लखनऊ सेसाइटी) 

बुधवार, 13 मार्च 2013

‘चौराहे पर पुतला’: कला के स्वधर्म और मनुष्य के बौनेपन की ‘स्ट्रांगर, लांगर और थिकर’ कहानी

[हाल ही में ‘नया ज्ञानोदय’ पत्रिका में प्रकाशित  पुरुषोत्तम अग्रवाल  की कहानी ‘चौराहे पर पुतला’ ने बहुत से सुधी पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस कहानी को पाठकों व समीक्षकों की ओर से बहुविध समझा और परखा जा रहा है। इसी समझन और परखन की प्रक्रिया में आनन्द पाण्डेय द्वारा इस कहानी की समीक्षा काबिलेगौर है। : संपादक]

‘चौराहे पर पुतला’: कला के स्वधर्म और मनुष्य के बौनेपन की ‘स्ट्रांगर, लांगर और थिकर’ कहानी 
फोटो, फ्लिकर से
  
पुरुषोत्तम अग्रवाल की लम्बी कहानी ‘चौराहे पर पुतला’ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उभार के फलस्वरूप कला और मानवता पर आसन्न फासीवादी खतरे की और धर्मनिरपेक्ष राजनीति और प्रगतिशील संस्कृति दृष्टि के पतन की कहानी है। प्रचलित विमर्शों को इस कथा-सूत्र में विलक्षण ढंग से पिरोते हुए पुरुषोत्तम अग्रवाल ने आज के समय और संस्कृति की कॉमिक-व्यंग्यात्मक समीक्षा की है।

अपने समय के भारतीय जीवन के सघन, जटिल और बहुस्तरीय यथार्थ की विविध प्रतिध्वनियों से अनुगूंजित यह कहानी महाकाव्यात्मक प्रभाव छोड़ती है। यह कहानी आज के राजनीतिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन की कॉमिक-व्यंग्यपूर्ण आलोचना है। यह -आद्यांत -सामायिक विमर्शों की हास्यास्पद; और त्रासद भी, विफलता की दास्ताँ है। यह सामयिक भारतीय जीवन की बिडम्बना को बड़े असरदार तरीके से उजागर करती है. इसका सन्दर्भ बहुत व्यापक है, बल्कि वैश्विक है।

एक शहर के समग्र जीवन की कहानी एक पुतले के माध्यम से कही गयी है। बीस साल की कालावधि में फैली इस कहानी का सारांश इसप्रकार है: बीस साल पहले नगरपालिका ने अपने आपको ‘सम्वेदनशील’ और ‘कलाप्रेमी’ सिद्ध करने के लिए नगर के सौन्दर्यीकरण का अभियान चलाया था। अभियान के तहत बड़े-बड़े कलाकारों से ‘मयूर’, ‘नर्तक-नर्तकियों’, के साथ-साथ साँवले संगमरमर से पाँच साल के खड़े-खड़े नहाते हुए बच्चे का एक नग्न पुतला भी बनवाया गया था. पुतले की भाव-भंगिमा लेखक के शब्दों में इसप्रकार थी, “पानी लोटे से गिर, पुतले के सर और शरीर से गुज़रता हुआ नाली से निकल जाता था. पुतले के चेहरे पर, मम्मी की मदद के बिना ख़ुद नहाने का आत्म-गौरव, नहाने से आ रहा ताजापन” था. ‘पुतले की यह बहुलार्थक स्नान-भंगिमा’ जिन ‘सर्जनात्मक तथा वैचारिक उपक्रमों की विषय-वस्तु’ बनी उनमें प्रमुख थी ‘अश्लीलता-संवेदी राडारों’ की सांस्कृतिक प्रतिक्रिया- ‘’कि पुतले के कारण बहू-बेटियों के चरित्र पर चिंतनीय प्रभाव पड़ रहा है.” (“अधिक सच्चे निष्कर्ष को अप्रकाशित रखने में ही बुद्धिमत्ता समझी गयी थी- पुतले के कारण बहन-बेटियों के चरित्र पर चिंतनीय प्रभाव पड़ रहा हो या न पड़ रहा हो, भाई-बापों के आत्म-विश्वास पर सोचनीय प्रभाव निःसंदेह पड़ रहा था.”) इन ‘राडारों’ ने अपनी रिपोर्ट स्थानीय ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादी’ नेता गंगाधरजी को सौंपी. “गंगाधरजी की पार्टी तो जानी ही सांस्कृतिकता के लिए जाती थी.” ‘राजनैतिक तीर्थ-लाभ’ के मकसद से उनकी पार्टी ने पुतले को मीडिया के माध्यम से अश्लीलता फ़ैलाने वाला कहकर उसकी निंदा की और “पार्टी के पार्षदों को निर्देश भी दिया कि नगर-पालिका में पुतले को हटाने का प्रस्ताव फ़ौरन पेश कर दें”। सत्तापक्ष भी इस प्रस्ताव को पास कराना चाहता था। महापौर ने गंगाधरजी को आश्वस्त कर दिया था। लेकिन प्रस्ताव पेश होने के पहले ही मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से महापौर वादे से मुकर गए और प्रस्ताव की कटु निंदा की। पुतले को बनाने वाला कलाकार प्रधानमंत्री का मित्र था इसलिए भी मुख्यमंत्री और महापौर प्रधानमंत्री का कोपभाजन नहीं बनना चाहते थे। गंगाधरजी कुछ नहीं कर सके क्योंकि उनकी पार्टी अल्पमत में थी। इसके बाद से यह मुद्दा धीरे-धीरे स्थानीय से राष्ट्रीय और फिर वैश्विक बन गया। सूचना और प्रसारण-क्रांति के बाद पुतले से जुड़ा विवाद सबके घरों तक में पहुँचने लगा। गंगाधरजी की पार्टी पुतले के पक्ष में खड़े होने वाले कलाकारों और बुद्धिजीवियों के साथ हिंसा और बलप्रयोग करने लगी। बात को बढ़ते देख प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री को तलब किया, पद से हटाने की धमकी दी। इशारों-इशारों में ही प्रधानमंत्री से मिले आदेश का अनुपालन करते हुए मुख्यमंत्री ने पुतला-विवाद पर एक आयोग का गठन कर दिया। अब सब कुछ आयोग की रिपोर्ट पर निर्भर था। और जैसा कि आयोगों की राजनीति होती है-बहुत अधिक समय लेना। इस आयोग ने भी कला की स्वतंत्रता, कला और राजसत्ता, कला और अश्लीलता जैसे गूढ़ प्रश्नों पर जानकारी लेने के लिए दुनियाभर के फिल्म, कला समारोहों में भागादारी की। दुनिया के सारे दर्शनीय स्थलों की यात्राएं कीं। आयोग को कई कार्य-विस्तार भी मिले।
  
पुतले से ‘सांस्कृतिक’ लोग तो परेशान थे ही लेकिन इसके साथ ही रवि सक्सेना नाम के मार्क्सवादी प्रोफेसर भी परेशान थे; निहायत व्यक्तिगत कारणों से। वे काम विकारों से ‘बीमार इंसान’ थे। वे स्ट्रांगर, लांगर और थिकर ‘अंग’ के आत्मविश्वास से वंचित थे। इसलिए उन्हें लगता था कि उनकी पत्नी जया पुतले के ‘अंग’ की कामना करती हैं और उनकी क्षमता से असंतुष्ट हैं। इससे उनके मन ने पुतले को ‘रकीब’ मान लिया और जया को चरित्रहीन। और अब वे भी पुतले के दुश्मन हो गये थे। प्रगतिशील दृष्टि की वजह से वे पुतले को हटा देने की बजाय उसे चड्ढी पहना देने के मौलिक विचार के साथ आये। आयोग की रिपोर्ट आने तक कई मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बदल गये फिर भी सत्ताधारी पार्टी वही रही, गंगाधरजी और रवि सक्सेना तो अपनी जगह पर थे ही। आयोग ने रिपोर्ट में कला की स्वायत्ता को महत्व देते हुए समाज को अश्लीलता से बचाने के लिए पुतले को चड्ढी पहनाने की सिफारिश की। कहानी पुतले के चड्ढी पहनाने के कार्यक्रम के दिन पर ही केन्द्रित है। लेकिन, फ्लैशबैक तकनीकि से पीछे की बातें भी कहती है। पुतले को जब दीवार तोड़कर मुक्त किया गया तब वह लोगों को पच्चीस साल का लगा। चड्ढी तो पाँच साल के लड़के के लिए लाई गई थी। सब लोग ‘हकबका कर चुप हो गए थे।’ कुछ ने इसके लिए कलिकाल को दोषी ठहराया तो रवि सक्सेना ने इसे पुतले की दुष्टई बताया।

यह कहानी देश की राजधानी दिल्ली से दूर राज्य के एक छोटे-से शहर में घटती है. पहली नजर में यह एक पुतले की कहानी है लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो यह कहानी एक शहर में गिरते राजनीतिक-सांस्कृतिक और इसलिए मानवीय मूल्यों और प्रगतिशील जीवन-दृष्टि में आती हुई गिरावट की कहानी है। एक तरह से यह उस शहर के बीस साल के इतिहास का सांस्कृतिक सर्वेक्षण भी है और उसका इतिहास लेखन भी. इतिहास को यह करवट केवल इस शहर में ही नहीं दिलाई जा रही थी बल्कि कहानी प्रधानमंत्री (दिल्ली) से लेकर मुख्यमंत्री (दौलताबाद कह लीजिये) तक के माध्यम से अखिल भारतीय स्तर पर व्याप्त है. जैसे श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ में रुप्पन बाबू को लगता है, “मुझे तो लगता है दादा सारे मुल्क में यह शिवपालगंज ही फैला हुआ है.” वैसे ही यह शहर पूरे मुल्क की कथा और कष्ट समेटे हुए है. पुतले से शहर को ही नहीं ‘सारे देश’ को संताप था, “पिछले बीस सालों से नगर ही नहीं, सारा देश जी संताप झेल रहा था,....”
इस बौने समय में मनुष्यता और कला निर्वासित कर दी गयी है। मनुष्यता और कला का निर्वासन पुरुषोत्तम अग्रवाल के कथा साहित्य के केंद्र में है। यह संयोग नहीं है कि कहानीकार की पहली कहानी ‘चेंग चुई’ भी स्थापत्य कला के एक रूप के अनुसार बने बंगले में निर्वासित अनुभव करते मनुष्य को लेकर लिखी गयी थी। ‘चौराहे पर पुतला’ में मूर्ति कला है। मनुष्य की मूर्ति है- पुतला। यहाँ पुतले के रूप में मनुष्य निर्वासित है। कहानीकार ने आज के मनुष्य के निर्वासन को अधिक स्पष्टता से उजागर करने के लिए ही पुतले का एक इन्सान के रूप में वर्णन किया है अर्थात् पुतले का मानवीकरण किया है। पुतले के मानवीकरण के माध्यम से उसे आज के मनुष्य के निर्वासन की दर्दनाक स्थिति को व्यक्त करने में अधिक सफलता मिली है।

कहानी का नायक एक पुतला है। एक कला-रूप है। पुतले के माध्यम से वे समाज में मनुष्य के लिए बची जगह की पैमाइश भले ही करते हैं लेकिन यह कहानी मूलतः कला के स्वधर्म की रक्षा की चिंता की कहानी है। कला के स्वधर्म के बहाने मानव-धर्म के लिए सिकुड़ती जगह की चिंता कहानी की केन्द्रीय चिंता है। कला का स्वधर्म, मनुष्य का स्वधर्म है। कला के स्वधर्म का विरोध असल में मानव-धर्म का विरोध है। यह कहानी, कला के स्वधर्म के पक्ष में और मानव-विरोधी समय और संस्कृति के परतों को उजागर करने वाले मानवीय विवेक की कहानी है।

‘पुतला’ एक स्वतंत्र, प्रसन्न, आदिम और अनावृत मानवीय व्यक्तित्व, का प्रतीक, है। मनुष्यता विरोधी समय और संस्कृति उसे पचा नहीं पातीं। सभ्यता की परतंत्रता एक आदिम मानवीय रूप को स्वतंत्र और जीवित नहीं रहने देना चाहती। उस सांस्कृतिक विमर्श का बोलबाला है जिसे कलाओं में अभिव्यक्त होने वाला मनुष्य का आदिम और अनावृत रूप अश्लील लगता है। और, जिसका अभिप्रत सेंसर्ड और पराधीन मानवता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की इस मानवता-विरोधी, कला विरोधी राजनीति को कंुठित और स्त्री-विरोधी प्रगतिशील (?) बौद्धिक लोगों का साथ मिलता है। ढुलमुल और नाप-तौल कर चलने वाली राजनीति कला को, मनुष्य को न केवल बचा पाने में असफल होती है बल्कि वह भी उनके साथ हो लेती है - मनुष्यता और कला की स्वतंत्रता के हरण के लिए। उसे सेंसर करने के लिए तीनों में होड़ लग जाती है। फलस्वरूप पुतले को ‘चढ्ढी’ पहनाने के सांस्कृतिक अभियान की विजय होती दिखायी देती है। बहुत दिनों से चारदीवारी में कैद करके निर्वासित की गयी कला - मनुष्यता को सेंसर करने का प्रयास किया जाता है, अर्द्ध-पराधीन कर दिया जाता है।
आज की दुनिया में किसी समुदाय की भावना-आहत होने के और अश्लील होने के आरोप में कलाकृतियों, रचनाओं और फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। कलाकारों-लेखकों को देशनिकाला दे दिया जाता है। मकबूल फिदा हुसैन, सलमान रूश्दी और तस्लीमा नसरीन के साथ जो कुछ हुआ और हो रहा है उससे कौन संवेदनशील हृदय चिंतित नहीं है? ‘चौराहे पर पुतला’ में लेखक ने इन्हीं चिंताओं को व्यापक परिप्रेक्ष्य में वाणी देने की कामयाब कोशिश की है। इसलिए इसे कला के स्वधर्म की रक्षा करने वाली कहानी कहना चाहिए।

प्रतिरोध की आवाजें कहानी में जिस तरह गुम हैं, उससे यह स्पष्ट है कि स्वतंत्र मनुष्य के प्रतीक, कला के स्वधर्म के प्रतीक पुतले को पूर्णतया लुप्त या पराधीन करने की दिशा में चढ्ढी पहनाने की सांस्कृतिक कार्यवाही पहला कदम है। ध्यान रखें, आखिरी नहीं। और वह दिन दूर नहीं जब पुतला हटा दिया जाएगा, जब मनुष्य-धर्म, कला का स्वधर्म विलुप्त कर दिया जाने वाला है। यह कहानी कला के स्वधर्म और मनुष्यता के संकटग्रस्त होने की सूचना और फासीवाद की आसन्न आहटों की ओर ध्यान देने, कान देने के लिए सावधान करती है। यह मानवता विरोधी, कला विरोधी समय में फँसी मनुष्यता, कला को देखने के लिए आँख खोल देने वाली कहानी है।

समय के बौनेपन की इन्तहां यह है कि लोगों को 20 सालों में 5 साल का पुतला 25 साल का लगने लगता है। इस प्रसंग के वर्णन में लेखक ने कुछ-कुछ जादुई यथार्थवादी शैली का सहारा लिया है। जिससे लगता है कि पुतला सचमुच में बढ़ गया है लेकिन, सच तो यह है कि विकास पुतले में नहीं हुआ है बल्कि इसके विपरीत संकुचन आदमी में हुआ है। उसमें संकीर्णता बढ़ी है। सांस्कृतिक राष्ट्रवादी राजनीति और नैतिकतावादी दुराग्रहों के फलस्वरूप 20 सालों में आदमी में बौनापन आया है। जिस अनुपात में यह बौनापन बढ़ा है, उसी अनुपात में निर्जीव पुतले की उम्र अधिक लगती है। जिन आँखों को ’गोल दीवारों में कैद’ पुतला दीवारों को तोड़ने के बाद 25 साल का लगता है, वे आँखें स्वयं ’गोल दीवारों की कैद’ में हैं। सच तो यह है कि पुतले को कैद करने के पहले ये आँखें स्वयं को कैद कर चुकी थीं। इसी कैद से पुतले को कैद करने का विचार प्रसूत हुआ था। और तब से ये आँखें और पुतला दोनों कैद में रहते आये हैं।

बिडम्बना यह है कि इसके लिए राजनीतिक वर्ग में सर्वसम्मति है। आज जिसे पुतले की मुक्ति और ’आँखों’ को संताप से मुक्त करने का सांस्कृतिक-राजनीतिक कार्यक्रम कहा जा रहा था और जिसमें मुख्यमंत्री, प्रतिपक्ष के नेता और प्रगतिशील बुद्धिजीवी के साथ-साथ मीडिया और नगर की जनता शामिल थी, वह असल में सांस्कृतिक पतन के एक चरण पूरे होने का उत्सव था। जिसमें पुतले और संस्कृति की कैद पर वैधानिक, लोकतान्त्रिक, धार्मिक, बौद्धिक और न्यायिक मुलम्मा चढ़ना था। इससे उपजी स्थिति - सांस्कृतिक पतन और उसके सर्वग्रासी रूप की भयावहता- का कहानीकार ने कॉमिक-व्यंग्य शैली में वर्णन किया है। इस जुलूस, जिसमें ’’राजनैतिक जुलूसों वाला छिछोरा जोश नहीं, धार्मिक चल-समारोह सरीखा भावपूर्ण उत्सव था।’’ को देखकर मुक्तिबोध की कहानी ‘अँधेरे में‘ के रात में निकलनेवाले जुलूस की सहज ही याद आ जाती है, जिसमें डोमाजी उस्ताद, राजनेता, कवि, पत्रकार सब शामिल थे। ‘‘चौराहे पर पुतला’ में भी सब मिले हुए हैं, सब एक साथ हैं।

चड्ढी असल में पुतले को नहीं बल्कि मानवीय विवेक को पहनाई गयी है। चड्ढी से पुतले की नग्नता को नहीं ढँका गया है बल्कि इससे समय के बौनेपन को ढँकने की कोशिश की गयी है। कहानीकार की सफलता यह है कि पुतले को चड्ढी पहनाने के बहाने उसने भयावह समय के तहों से पर्दा उठा दिया है। ‘‘गंगाधरजी को समझ नहीं आ रहा था कि इस उलटबाँसी का क्या अर्थ निकालें कि जीवित होने का दावा करने वाले मनुष्य जिस कलिकाल में बौने होते जा रहे हैं, उसी कलिकाल में पत्थर का यह जड़ पुतला अपने कद में बढ़ता चला गया था। जो चड्ढियाँ पुतले को पहनाने के लिए लायी गयी थीं, वे उसकी निर्वस्त्रता के आगे छोटी पड़ गयी थीं, और उसे चड्ढी पहनाने पर आमादा अक्लें उसकी हिमाकत के सामने बौनी हो गयी थीं।’’
बौद्धिक वर्ग के प्रतिनिधि चरित्र रवि सक्सेना के माध्यम से कहानीकार ने बौद्धिक वर्ग की भी आलोचना की है। अवसरवादी, भटका हुआ स्त्री विरोधी बौद्धिक वर्ग कैसे इस पतन में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति के काम आता है, रवि के चरित्र के माध्यम से कहानीकार इस स्थिति को विस्तार से दिखाया है। रवि प्रगतिशील और वामपंथी होने के बावजूद फ्रायडीय चिंताओं से परेशान मर्दवादी हैं। उन्हें लगता था कि पुतला उनके वैवाहिक जीवन को नष्ट किए दे रहा है। वे लगभग कामविकारों के रोगी हो चुके थे इसलिए पुतले को शत्रु मानने लगे थे। ऐसे प्रगतिशीलों के स्त्री विरोधी चरित्र को कहानीकार ने विस्तार से उकेरा है, ‘‘प्रगतिशीलता के चक्कतर में कब तक उस हरामी पुतले को इजाजत देता कि वह मेरी लुगाई को लुभाता रहे .... प्रगतिशील हूँ, वामपंथी हूँ नामर्द तो नहीं।’’ यह एक हास्यास्पद चरित्र है।

इसके अलावा लेखक-कलाकार सब इस स्थिति में इतना ढल गए थे कि वे कला के स्वधर्म की रक्षा के प्रति बेपरवाह हो चुके थे। ‘‘रहे कलाकार, लेखक आदि, सो उनमें से अधिकांश धीरे-धीरे मानने लगे थे कि यार, ‘और भी ग़म हैं, ज़माने में पुतले के सिवा।’’’ कला की स्वायत्तता के लिए वे कलाकार भी अब उदासीन हो गये हैं, जो राजसत्ता से मेल-जोल बनाकर कला का व्यापार करते हैं। बौद्धिक और कलाकार-समुदाय की यह अवसरवादिता और उदासीनता सबसे ज्यादा अखरती है। समय और संस्कृति का बौनापन इतना सर्वग्रासी है कि लेखक, बृद्धिजीवी और कलाकार भी उसमें शामिल दिखायी देते हैं। सबके लिए बहाना यह है कि ‘‘न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान सबको करना ही होगा।’’ कहानीकार ने इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पर चोट की है। एक प्रगतिशील, कला के स्वधर्म के प्रतिबद्ध लोकतांत्रिक मिजाज के बौद्धिक-कलाकार समुदाय की कमी भी स्थिति के बदतर होने के लिए जिम्मेदार है। कहानीकार की अंतर्दृष्टि यही कहती है कि ऐसे सुदृढ़ और गतिशील बौद्धिक-कलाकार समुदाय के बिना स्थिति को बदला नहीं जा सकता है, मनुष्य और कला के लिए जरूरी जगह निर्मित नहीं की जा सकती है। मनुष्य और कला का संघर्ष एक ही है।

जिन ‘बहू-बेटियों’ के चरित्र की रक्षा के नाम पर सारा पुरुषवादी सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व्यापार चलाया जा रहा है, उनका पक्ष सचमुच में अनुपस्थित है। कोई उनका पक्ष जानने की कोशिश नहीं करता है- न बुद्धिजीवी, न राजनीति और न ही न्यायिक आयोग। ऐसे में इस स्थिति का सबसे अधिक शिकार औरतें ही होती हैं। जया के चरित्र के माध्यम से कहानीकार ने पूरे ‘सांस्कृतिक-लोकतांत्रिक-न्यायिक-धार्मिक माहौल’ में स्त्री की पराधीनता और उसके निर्वासन को बड़े मार्मिक ढंग से उजागर किया है। ‘‘जया कभी-कभी सोचती थी कि मुझे तो बस पुतले को देख कर हँसी आई थी, रवि को मेरे गालों पर लाज की लाली कैसे दिख गयी? मैं पुतले को देख कर कम हँसी थी, और रवि के भोल से बुद्धूपन पर अधिक। इस भोलपन को बेवकूफी में किसने बदला? जिस प्यार से मैं हँसी थी, उसे बेतुकी तुलना में किसने बदला? दोस्ती की जिस जमीन पर खड़ी मैं हँस रही थी, उसमें निराधार ईर्ष्या की बारूदी सुरंग किसन लगाई? जया इन प्रश्नों के उत्तर जानती थी, लेकिन जानने का फायदा क्या था?’’ सब कुछ जानते हुए भी वह कुछ बोलने के लिए स्वतंत्र नहीं थी। ‘‘जया के लिए तय करना मुश्किल हो चला था कि वह इस बीमार इंसान पर दया करे या इस कूढ़मगज, जिद्दी पति पर एक हाथ जमा दे।’’ उक्त अंश आज के स्त्री-चेतना और आधुनिकता के दौर में स्त्री की बेबसी और पराधीनता को बड़े कारुणिक ढंग से व्यक्त करते हैं।

कहानी में सामयिक विमर्शों की महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण उपस्थिति है। विविध सामयिक विमर्शाें की भाषा और अनुगँूज पूरी कहानी में व्याप्त है। इसलिए यह कहानी अपनी संरचना में अच्छी-खासी बौद्धिक कहानी है। विभिन्न विमर्शाें को एक साथ रखकर इतनी रचनात्मकता पैदा करना निश्चय ही एक बड़ी संवेदनात्मक और रचनात्मक चुनौती रही होगी। लेकिन, हास-परिहास और व्यंग्य की आद्यांत अंतर्धारा में ये विमर्श उपस्थित होकर भी रचनात्मकता को बाधित नहीं करते हैं। हाँ, यह अवश्य है कि दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियों के आदती के लिए इस कहानी को समझना ज़रा मुश्किल हो सकता है। इस कहानी को समझने के लिए एक निश्चित स्तर की बौद्धिकता जरूरी लगती है।
  
इन विमर्शों की शब्दावली और पद-बंध सीधे-सीध कहानी में प्रयोग किये गये हैं। लेकिन भाषा जिस तरह से खिलंदड़ई करते हुए, पाठक को चकित करते हुए आगे बढ़ती है उसमें ये जरा भी अखरते नहीं हैं। ‘शारीरिक-समीक्षा’, ‘लुगाई-लुभावन’, ‘पधराये रहेंगी’, ‘सांस्कृतिक-ठुकाई’, ‘आनंद-कथा’, ‘बिगूचन-तत्व’, ‘बिटर-बिटर आँखें खोले रहने वाली’ जैसे नये-नये शब्द प्रयोगों और ‘परवारे’, ‘खोंचड़’ जैसे कई विस्मृत हो चुके शब्दों की वापसी से भरी भाषा में विमर्शों की शब्दावली और पद-बंध खप जाते हैं और रचना के भावबोध और विचारलोक को बहुश्रुत और स्तरीय बनाते हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, भारत माता की अवधारणा, दक्षिणपंथ, इतिहास-देवता, फ्रायडवाद, मनोविश्लेषण, राजनीति और साहित्य, पतनशील सामंतवाद, मार्क्सवाद, वर्गच्युत, प्रगतिशील, वामपंथ, मेल शाविनिज़्म, समता, स्वाधीनता, कुंठा, संत्रास, न्यायिक आयोग, निर्वासन, अकेलापन, कला और अश्लीलता, भोक्ता और रचयिता, अस्मिता, कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वाधीनता, राज्य सत्ता और कला, लोकतंत्र, पुरुषवाद, प्रतिक्रियावाद, इंफोटेनमेंट क्रान्ति, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, वैज्ञानिक दृष्टि, आधुनिकतावाद, अनुभव और अनुभूति, इकॉनामी ऑव स्केल, हृदय-परिवर्तन, ऐतिहासिक भूल, वस्तुनिष्ठ ऐतिहासिक आकलन, द्वंद्वात्मक पद्धति, थीसिस-ऐंटी थीसिस, सिन्थेसिस, मध्य-मार्ग, कलावाद, कलात्मक मूल्य, कलाकृति की इयत्ता, कला की स्वायत्तता, कानून का राज, कलियुग, पालिटिकली इनकरेंक्ट, और सार्वजनिक नैतिकता जैसे पद विविध विमर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं। विमर्शों की शब्दावली और पद-बंध कहानी को बहुलार्थी और अर्थसघन बनाते हैं। हिंदी के कई मुहावरों का भी रचनात्मक प्रयोग पाठकों का ध्यान खींचता है।

कोई भी रचना अपने समय के यथार्थ को अभिव्यक्त करती है। लेकिन वह सामयिक घटनाओं और तथ्यों की रपट नहीं होती है। यह कहानी भी यथार्थपरक है। वह यथार्थ जो हमारे राजनीतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवन के अनुभवों की प्रामाणिकता पर आधारित है। इसमें समकालीन घटनाओं, व्यक्तियों और विमर्शों की उपस्थिति है। अपने समय की विभिन्न घटनाओं की अनुगूंज इस कहानी में सुनाई देती है। समकालीन जीवन की न जाने कितनी घटनाओं, व्यक्तियों और विमर्शों की प्रतिध्वनि और रेखांकन कहानी में आपको मिलेगा। यह हर पाठक की अपनी जानकारी और समझदारी पर निर्भर करेगा। फिर भी यह कहानी न समकालीन घटनाओं का रिपोर्ताज है और न ही प्रतिछवि। यह कहानीकार के अपने युगीन यथार्थ की रोचक पुनरर्चना है। यही होता है साहित्य। यही होती है यथार्थपरक कला। 

आनंद पांडेय ने जवाहरलाल नेहरु विश्‍वविद्यालय से उच्‍च शिक्षा प्राप्त की है। यहीं से पीएच.डी. की। लंबे समय तक छात्र-राजनीति से जुड़े रहे। इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य में संलग्न हैं। साहित्यिक और सामाजिक सरोकार के साथ लेखन में सक्रिय हैं। इनसे anandpandeymail@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

इस समय एक खतरा है कविता के साथ, अबूझपन का: मैनेजर पाण्डेय

पेरियार छात्रावास, जे.एन.यू. में पिछले महीने एक कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया था। अनामिका, विद्रोही समेत कई कवियों ने आयोजित गोष्ठी में काव्य-पाठ किया था। काव्य-पाठ के उपरांत वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पाण्डेय द्वारा इन कवियों की कविताओं पर प्रतिक्रिया-स्वरूप कही बातें यहाँ आलेख-रूप में प्रस्तुत हैं। हिन्दी के वर्तमान काव्य-परिदृश्य में हिन्दी कविता का पाठकों से दूर होना एक बड़ा संकट बना हुआ है। प्रस्तुत आलेख में इस संकट के कारणों की छानबीन है और कवियों के लिए कुछ उपयोगी परामर्श हैं। : संपादक
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इस समय एक खतरा है कविता के साथ, अबूझपन का: मैनेजर पाण्डेय 

क बार हजारी प्रसाद द्विवेदी अपने शिष्यों के साथ जा रहे थे, सामने से चंद्रबली पांडेय आ रहे थे। द्विवेदी जी शिष्यों से बोले, रास्ता बदल दो, साक्षात्‌ कुपित ब्रह्मचर्य आ रहा है। बाद में, थोड़ी दूर जाकर एक शिष्य ने पूछा कि पंडित जी कुपित ब्रह्मचर्य क्या होता है? वे बोले कि कुपित ब्रह्मचारी वह होता है जो दिन भर दूसरे से और रात भर खुद से लड़ता है। हिन्दी में भारी संख्या में ऐसे कवि हैं जिनको कुपित ब्रह्मचारी कहा जा सकता है। अपने से ही लड़ते हैं और अपने से ही लड़ने में कविता भी लिखते हैं। आत्मसंघर्ष में जूझे हुए। समाज संघर्ष आना चाहिए। यह देखना जरूरी है कि हमारा समय, आज का समय, कैसा समय है! 

अभी अनामिका ने आशाराम बापू के बारे में कविता पढ़ी। मुझे आशाराम बापू का बयान सुन लेने के बाद तुलसीदास याद आए। तुलसीदास ने लिखा है, ‘बंचक भगत कहाइ राम के / किंकर कंचन कोह काम के।’ ये जो राम के धोखेबाज भक्त हैं, वे धन, क्रोध और काम यानी सेक्स; तीनों चीजों के गुलाम हैं। 

ऐसी कविताएं होनी चाहिए जो पाठक से संवाद बना सकें। जैसे, किसी ने अनुवाद पर कविता सुनाई। किसी को सुनाइये तो वह सोचे कि ये अनुवाद क्या होता है। अनुवाद समझने के लिए तो जे.एन.यू. का छात्र होना पड़ेगा। कविता आप केवल जे.एन.यू. के छात्रों-छात्राओं के लिए तो लिख नहीं रहे हैं। ज्यों आप ऐसा करेंगे त्यों पाठक कविता से दूर होंगे। हिन्दी के एक कवि थे जिन्होंने तीन ऐसी कविताएं लिखीं जिसमें सारा हिन्दी व्याकरण समा गया। कौन कारक है, कौन संज्ञा है, कौन क्रिया है! मैंने उनसे कहा कि ऐसा करो कि इन कविताओं को लिख कर एन.सी.ई.आर.टी. को सौंप दो। भाषा का काम कवि और श्रोता या पाठक के बीच किसी भी स्तर तक संवाद में बाधक बनना नहीं, संवाद में साधक बनने का है। इसलिए ऐसी भाषा से बचना चाहिए।
कविताओं पर प्रतिक्रया के दौरान आलोचक मैनेजर पाण्डेय / photo: Amrendra N. Tripathi
ये जो कुछ कविताएं सुनाई गयी हैं, बढ़िया रहीं, लेकिन जिसमें रवींद्र नाथ टैगोर की प्रेमिका विदेशिनी का जिक्र है वह अर्जेंटाइना की महिला प्रेमिका थी। ज्यों आप कहेंगे आपकी कविता का अर्थ ही बदल जाएगा। आपकी कविता में प्रेमिका उस रूप में नहीं है जिस रूप में रवींद्र नाथ टैगोर की प्रेमिका है। और यह भी ठीक नहीं है, देखिए; रवींद्र नाथ टैगोर महापुरुष थे लेकिन उनका सब कुछ महान ही रहा हो, यह मैं मानने के लिए तैयार नहीं हूँ। न पहले मानने को तैयार था न आज मानने को तैयार हूँ। इसलिए कविता में ऐसा संदर्भ नहीं देना चाहिए जो पाठकों-श्रोताओं को भटकाए। 

इस समय एक खतरा है कविता के साथ, अबूझपन का। उसका परिणाम क्या हुआ है कि कवि पुरस्कृत हो रहे हैं और कविता तिरस्कृत हो रही है। उसी में कुछ लोग, जैसे अशोक वाजपेयी, विलाप करते रहते हैं कि हिन्दी-समाज कविता विरोधी समाज है। ये लोग ये नहीं सोचते कि इनकी कविताएं ही समाज-विरोधी कविताएं हैं। हिन्दी समाज पांच सौ वर्षों से कबीर, तुलसी, सूर और मीरा की कविता केवल पढ़-सुन ही नहीं रहा है, जी भी रहा है। हमारी एक बुआ थीं जो कभी नहीं जाती थीं स्कूल, पर उनकी एक आदत थी कि तुलसीदास के तौर पर चौपाइयां वह अपनी आप गढ़ती थीं। मैं जब बाहर नौकरी करने लगा तो उन्होंने बार-बार कहा भोजपुरी में, ‘जे पूत परदेसी भईले / देवलोक से सबसे गईले।’ यह उनकी गढ़ी हुई है, इसका तुलसीदास से क्या लेना-देना। यहां विश्व साहित्य की अध्येता अनामिका बैठी हैं, मैं कह रहा हूं कि कबीर-सूर-तुलसी इन लोगों की कविता अनपढ़ लोगों को कवि बनाती है। वे अपने मन की दुविधा, अपना द्वंद्व, अपनी खुशी, अपना दुख, अपनी नाराजगी कविता में व्यक्त कर देते हैं। इन सबों की कविता जो यह काम करती है वह मेरी जानकारी में दुनिया की कोई कविता नहीं करती। यह क्षमता किसी बड़े से बड़े कवि में नहीं होगी। ऐसे समाज को आप कविता विरोधी समाज कहते हैं! अरे आप ऐसी कविता ही लिखते हो कि लोग समझ नहीं पाते। समझ नहीं पाने के तीन कारण हैं। पहला, हिन्दी में ऐसे कवियों के बारे में आप जानते ही होंगे, कई मेरे आत्मीय भी हैं, कि उनकी कविता में प्रयुक्त हर शब्द का अर्थ आता है लेकिन पूरी कविता समझ में नहीं आती। कारण, ऐसी संरचना और मानसिकता से वह कविता लिखी जाती है कि सामाय पाठक उससे कोई मेल-जोल बैठा ही नहीं पाता। दूसरी बात है कि कोई साधारण आदमी आपकी कविता पढ़ता है तो चाहता क्या है! वह चाहता है कि कविता उसके दिल-दिमाग की भी कुछ कहे। आप अपने ही दिल दिमाग का कहते रहिए तो उसको इससे क्या लेना देना। इसलिए यह भाव-विचार भी कविता के तिरस्कृत होने का एक कारण है। तीसरा कारण यह है कि हाल फिलहाल की हिन्दी कविता में – हिन्दी के एक बड़े आचार्य के शब्द में कहूँ तो – ‘व्यक्ति वैचित्र्यवाद’ बहुत बढ़ गया है। व्यक्तिगत विचित्रता का कविता में प्रदर्शन। यानी, सौ लोग जैसी लिखते हैं वैसी कविता हम नहीं लिखेंगे, अलग से एक कविता लिखेंगे। जिस पर अकबर इलाहाबादी ने कहा है कि ‘उनका कहा वो आप समझें या खुदा समझे!’ तब लोग कविता से मुंह काहे नहीं मोड़ेंगे। 

एक कविता शुरू में एक कवि ने पढ़ी थी जिसमें कश्मीर का प्रसंग है। उसमें कश्मीर की जगह उत्तर-पूर्व लिख दीजिए तो भी कही अर्थ निकलेगा जो कश्मीर कहने से है। यह हमारे समय की, भारतीय समाज की व्यापक और बड़ी मानवीय त्रासदी है। इसीलिए मैंने शुरू में कहा था कि कविता सार्थक, सजीव और दीर्घजीवी तभी होती है जब वह मानवीय त्रासदी की आवाज बने। 

आखिरी बात मित्रों, यह कहना चाहूंगा कि कभी-कभी कविता में लोकतंत्र भी धोखेबाज हो सकता है। जैसे, अभी अनामिका जी ने कविताएं पढ़ीं। इनकी कविताओं को समझने के लिए श्रोताओं-पाठकों की अपनी ओर से कुछ तैयारी करनी होती है। कार्ल मार्क्स ने कहा था कि संगीत को समझने के लिए संगीत के लिए अभ्यस्त कान चाहिए। मान लीजिए बड़े गुलाम अली खां या मल्लिकार्जुन मंसूर ही क्यों न गा रहे हों और श्रोता यह जानता ही न हो कि ये राग-रागिनी क्या चीज है, तो इन दोनों का गाना ऐसे संगीत-रहित लोगों के सामने लगभग भैंस के आगे बीन बजाने जैसा होगा। बीन बजाने पर हिरण नाचेगी न कि भैस। इसलिए कवि को अपने लिए कुछ रचना भी होता है, पाठक तैयार करना होता है। उसे नया करना होता है, निर्मित करना होता है, लेकिन ऐसा और इस तरह कि आप अपने पाठक तैयार कर सकें, बिदकाएं नहीं उसको।

ये कुछ तत्काल के अनुभव से उपजी व्यावहारिक बातें थीं। हिन्दी कविता की चुनौतियों पर न कोई लंबा-चौड़ा व्याख्यान सोचकर आया था और न ही दिया है। आप लोगों ने भिन्न-भिन्न तरह के कवियों को बुलाया, इसकी मुझे बड़ी प्रसन्नता है। सबको सुनकर मुझे अच्छा लगा।
(प्रस्तुति: अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी)